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मनुष्य की काय संरचना ऐसी है, जिसे यदि तोड़ा-मरोड़ा न जाए, सहज
गति से चलने दिया जाए तो वह लंबे समय तक बिना लड़खड़ाए कारगर बनी रह सकती है
।आरोग्य स्वाभाविक है और रोग प्रयत्न पूर्वक आमंत्रित । सृष्टि के सभी
प्राणी अपनी सहज आयु का उपभोग करते हैं । मरण तो सभी का निश्चित है, पर वह
जीर्णता के चरम बिंदु पर पहुँचनेके उपरांत ही होता है । मात्र दुर्घटनाएँ
ही कभी-कभी उसमें व्यवधान उत्पन्न करती हैं । रुग्णता का अस्तित्व उन
प्राणियोंमें दृष्टिगोचर नहीं होता, जो प्रकृति की प्रेरणा अपनाकर सहज सरल
जीवन जीते हैं । मनुष्य ही इसका अपवाद है । इसी जीवधारी को आए दिन
बीमारियों का सामना करना पड़ताहै । बेमौत मरते भी वही देखा जाता है ।
दुर्बलता, रुग्णता और असामयिक मृत्यु कोई दैवी विपत्तिनहीं है । मनुष्य
द्वारा अपनाई गई रहन-सहन संबंधी प्रतिक्रिया मात्र है । आहार-विहार में
संयम बरता जा सके और मस्तिष्कको अनावश्यक उत्तेजनाओं से बचाए रखा जा सके,
तो लंबी अवधि तक सुखपूर्वक निरोगी जीवन जिया जा सकता है ।आरोग्य की उपलब्धि
के लिए बहुमूल्य टॉनिकों या औषध-रसायनों को खोजने की तनिक भी आवश्यकता
नहींहै । जो उपलब्ध है उसे बरबाद न करने की सावधानी भरबरती जाए, तो न बीमार
पड़ना पड़े, न दुर्बल रहना पड़े औरन असमय बेमौत मरने की आवश्यकता पड़े ।
चिकित्सकों का द्वार खटखटाने की अपेक्षा आरोग्यार्थी यदि रहन-सहन में
सम्मिलित कुचेष्टाओं को निरस्त कर सकें, तो यह उपाय उनकी मनोकामना सहज ही
पूरी कर सकता है ।
यह अच्छी तरह अनुभव कर लिया गया है कि खिलखिलाकर हँसने से अच्छी
भूख लगती है, पाचनशक्ति बढ़ती है और रक्त का संचार ठीक गति से होता है ।।
क्षय जैसे भयंकर रोगों में हँसना अमृत- तुल्य गुणकारी सिद्ध हुआ है ।। खिल-
खिलाकर हँसने से मुँह, गरदन, छाती और उदर के बहुत उपयोगी स्नायुओं को
आवश्यकीय कसरत करनी पड़ती है, जिससे वे प्रफुल्लित और दृढ़ बनते हैं ।। इसी
तरह मांसपेशियों, ज्ञानतंतुओं और दूसरी आवश्यक नाड़ियों को हँसने से बहुत
दृढ़ता मिलती है ।। हँसने का मुँह, गाल और जबड़े पर बड़ा अच्छा असर पड़ता है ।।
मुँह की मांसपेशियों और नसों का यह सबसे अच्छा व्यायाम है ।। जिन्हें
हँसने की आदत होती है, उनके गाल सुंदर, गोल और चमकीले रहते हैं ।। फेफड़ों
के छोटे- छोटे भागों में अकसर पुरानी हवा भरी रहती है, आराम की साँस लेने
से बहुत- थोड़ी वायु फेफड़ों में जाती है और प्रमुख भागों में ही हवा का
आदान- प्रदान होता है, शेष भाग यों ही सुस्त और निकम्मा पड़ा रहता है, जिससे
फेफड़े संबंधी कई रोग होने की आशंका रहती है, किंतु जिस समय मनुष्य खिल-
खिलाकर हँसता है, उस समय फेफड़ों में भरी हुई पहले की हवा पूरी तरह बाहर
निकल जाती है और उसके स्थान पर नई हवा पहुँचती है ।। मुँह की रसवाहिनी
गिलटियाँ हँसने से चैतन्य होकर पूरी मात्रा में लार बहाने लगती हैं।। पाठक
यह जानते ही होंगे कि भोजन में पूरी मात्रा में लार मिल जाने पर उसका पचना
कितना आसान होता है? जो आदमी स्वस्थ रहना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि
हँसने की आदत डालें ।
आयुर्वद अथवा किसी भी चिकित्सा शास्त्र के अध्ययन के लिए शरीर
रचना का ज्ञान नितान्त आवश्यक है। चिकित्सा में निपुणता प्राप्त करने के
लिए प्रथम और आवश्यक सोपान शरीर विज्ञान है। इस ज्ञान के बिना चिकित्सा,
शल्य, शालाक्य, कौमारभृत्य आदि किसी भी आयुर्वेद के अंग का अध्ययन संभव
नहीं। चिकित्सा के प्रमुख दो वर्ग है-