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Monday, 24 April 2017

सरस-सफल जीवन का केंद्रबिन्दु उत्कृष्ट चिंतन

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1229मनुष्य के हृदय भंडार का द्वार खोलने वाली, निम्नता से उच्चता की ओर ले जाने वाली, गुणों का विकास करने वाली, यदि कोई वस्तु है तो प्रसन्नता ही है ।। यही वह साँचा है जिसमें ढलकर मनुष्य अपने जीवन का सर्वतोमुखी विकास कर सकता है ।। जीवन यापन के लिए जहाँ उसे धन, वस्त्र, भोजन एवं जल की आवश्यकता पड़ती है वहाँ उसे हल्का- फुल्का एवं प्रगतिशील बनाने के लिए प्रसन्नता भी आवश्यक है ।। प्रसन्नता मरते हुए मनुष्य में प्राण फूँकने के समान है ।। प्रसन्न और संतुष्ट रहने वाले व्यक्तियों का ही जीवन किरण बनकर दूसरों का मार्ग दर्शन करने में सक्षम होता है ।।

प्रसिद्ध दार्शनिक इमर्सन ने कहा है “ वस्तुत: हास्य एक चतुर किसान है जो मानव जीवन पथ के कांटों, झाड़- झंखाड़ों को उखाड़ कर अलग करता है और सदगुणों के सुरभित वृक्ष लगा देता है जिसमें जीवन यात्रा एक पर्वोत्सव बन जाती है ।। "

जीवन यात्रा के समय में मनुष्य को अनेक कठिनाइयों एवं समस्याओं का सामना करना पड़ता है, किंतु इसी का अमृत का पान कर मनुष्य जीवन संग्राम में हँसते- हँसते विजय प्राप्त कर सकता है ।। इतिहास के पृष्ठों पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि महान व्यक्तियों के संघर्षपूर्ण जीवन की सफलता का रहस्य प्रसन्नता रूपी रसायन का अनवरत सेवन करते रहना ही है ।। 

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सभ्य समाज की अभिनव संरचना में जुटें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=711जिस समाज में लोग एक -दूसरे के दु:ख -दर्द में सम्मिलित रहते हैं , सुख- संपति को बाँटकर रखते हैं और परस्पर स्नेह, सौजन्य का परिचय देते हुए स्वयं कष्ट सहकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं उसे देव समाज कहते हैं। जब जहाँ जनसमूह इस प्रकार पारस्परिक संबंध बनाए रहता है तब वहाँ स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनी रहती हैं ।। पर जब कभी लोग न्याय -अन्याय का, उचित- अनुचित का , कर्त्तव्य -अकर्त्तव्य का विचार छोड़कर उपलब्ध सुविधा या सत्ता का अधिकाधिक प्रयोग स्वार्थ में करने लगते हैं तब क्लेश ,द्वेश और असंतोष की प्रबलता बढ़ ने लगती है। शोषण और उत्पीड़न का बाहुल्य होने से वैमनस्य और संघर्ष के दृश्य दिखाई पड़ने लगते हैं।


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संस्कृति पुरुष हमारे गुरुदेव


http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1281देवसंस्कृति का पुण्य-प्रवाह इन दिनों सारे विश्व को आप्लावित कर रहा है । सभी को लगता है कि यदि कहीं कोई समाधान आज के उपभोक्ता प्रधान युग में जन्मी समस्याओं का है, तो वह मात्र एक ही है-संवेदना मूलक संस्कृति-भारतीय संस्कृति के दिग-दिगन्त तक विस्तार में । यह संस्कृति देवत्व का विस्तार करती रही है, इसीलिए इसे देव संस्कृति कहा गया । इस संस्कृति को एक महामानव ने अपने जीवन में जिया-हर सास में उसे धारण कर जन-जन के समक्ष एक नमूने के रूप में प्रस्तुत किया । वह महापुरुष थे-परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी । गायत्री परिवार के संस्थापक-अधिष्ठाता-युग की दिशा को एक नया मोड़ देने वाले इस प्रज्ञा पुरुष का जीवन बहुआयामी रहा है । उनने न केवल एक संत-मनीषी-ज्ञानी का जीवन जिया, स्नेह संवेदना की प्रतिमूर्त्ति बनकर एक विराट परिवार का संगठन कर उसके अभिभावक भी वे बने । आज के इस भौतिकता प्रधान युग में यदि कहीं कोई शंखनिनाद-घडियाल के स्वर, मंत्रों की ऋचाएँ-यज्ञ धूम्र के साथ उठते समवेत सामगान सुनाई पड़ते हैं, लोगों को अंधेरे में भी कहीं पूर्व की सूर्योदय की उषा लालिमा दिखाई पड़ रही है, तो उसके मूल में हमारे संस्कृति पुरुष ही हैं । 

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वैभव नही महानता का वरण करें

विचार क्रांति के द्रष्टा एवं स्त्रष्टा

Friday, 21 April 2017

विचार क्रांति की आवश्यकता एवं उसका स्वरूप

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=948मनुष्य को आज इतनी अधिक सुविधाएँ और साधन- संपदाएँ प्राप्त हैं कि २०० वर्ष पूर्व का मनुष्य इनकी कल्पना भी नहीं कर सकता था ।। पहले की अपेक्षा उसके साधनों और सुविधाओं में निरंतर वृद्धि ही होती जा रही है ।। इसके उपरांत भी मनुष्य अपने को पहले की तुलना में अभावग्रस्त, रुग्ण, चिंतित और एकाकी ही अनुभव कर रहा है ।। भौतिक सुविधा- साधनों में अभिवृद्धि होने के बाद होना तो यह चाहिए था कि मनुष्य पहले की अपेक्षा अधिक सुखी और अधिक संतुष्ट रहता, किंतु हुआ इसके विपरीत ही है ।। यदि गंभीरतापूर्वक मनुष्य की आंतरिक स्थिति का विश्लेषण किया जाए तो प्रतीत होगा कि वह पहले की तुलना में सुख- संतोष की दृष्टि से और अधिक दीन- दुर्बल हो गया है ।। शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, पारिवारिक सौजन्य, सामाजिक सद्भाव, आर्थिक संतोष और आंतरिक उल्लास की से सभी क्षेत्रों में मनुष्य जाति नई- नई समस्याओं व संकटों से घिर गई है ।।

आज की सुविधा, संपन्नता की प्राचीनकाल की परिस्थितियों से तुलना की जाए और मनुष्य के सुख- संतोष को भी दृष्टिगत रखा जाए तो पिछले जमाने की असुविधा भरी परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति अधिक सुखी और संतुष्ट जान पड़ेंगे ।। इन पंक्तियों में भौतिक प्रगति तथा साधन- सुविधाओं की अभिवृद्धि को व्यर्थ नहीं बताया जा रहा है, न उनकी निंदा की जा रही है ।। कहने का आशय इतना भर है कि परिस्थितियाँ कितनी ही अच्छी और अनुकूल क्यों न हों, यदि मनुष्य के आंतरिक स्तर में कोई भी सुधार नहीं हुआ है तो सुख- शांति किसी भी उपाय से प्राप्त नहीं की जा सकती है ।।

वर्तमान युग की समस्याओं और संकटों के लिए परिस्थितियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता ।। परिस्थितियाँ तो पहले की अपेक्षा अब कहीं अधिक अच्छी, अनुकूल और सहायक हैं ।। 

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विचार परिवर्तन से व्यक्तित्व निर्माण

 

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यह संसार विचारों का ही प्रतिरूप है ।। विचार सूक्ष्म होते हैं ।। संसार की स्थूल वस्तुओं की रचना पहले किए गए विचार के अनुसार ही होती है ।। दर्शनशास्त्र के अनुसार यह समस्त जगत परमात्मा के एक विचार का ही परिणाम है ।। वह विचार था- "एकोऽहं बहुस्यामि" ।। कोई विचार तब ही फलित होता है, जब उसके प्रति सच्ची निष्ठा हो और दृढ़ संकल्प हो ।। संसार में जो उन्नति प्रगति और नए- नए परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं, वे सब विचारों के ही परिणाम हैं ।। मनुष्य यदि झूठी कल्पनाएँ करने के स्थान पर गंभीरतापूर्वक विचार करे और उसे पूरा करने के लिए सच्चे हृदय से प्रयत्न करे तो वह जैसे चाहे, वैसी उन्नति कर सकता है, जितना चाहे ऊँचा उठ सकता है, बड़े- बड़े काम करके दिखा सकता है ।। भिखारियों को सम्राट और साधारण मजदूरों को धन कुबेर बनते विचारों के बल पर ही देखा जा सकता है ।। दृढ़ विचार और हार्दिक संकल्प करके हम अपने व्यक्तित्व को जैसा चाहें बना सकते हैं; आवश्यकता है विचारों के प्रति सच्ची और दृढ़ निष्ठा की ।। 

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वातावरण के परिवर्तन का आध्यात्मिक प्रयोग

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=550युग- परिवर्तन को घड़ी सन्निकट है ।। व्यक्ति में दुष्टता और समाज में भ्रष्टता जिस तूफानी गति से बढ़ रही है, उसे देखते हुए सर्वनाश की विभीषिका सामने खड़ी प्रतीत होती है। किंतु ऐसे ही विषम असंतुलन को समय- समय पर सुधारने संभालने के लिए स्रष्टा की प्रतिज्ञा भी तो है। अपनी इस अनुपम कलाकृति, विश्व वसुधा को नियंता ने बड़े अरमानों के साथ बनाया है। संकटों की घड़ी आने पर उसका अवतरण होता है और असंतुलन फिर संतुलन में बदल जाता है। अधर्म को निरस्त और धर्म को आश्वस्त करने वाली ईश्वरीय सत्ता आज को संकटापन्न विषम वेला में उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए अपनी अवतरण प्रक्रिया को फिर संपन्न करने वाली है ।।

यह आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई ? प्रश्न उठना स्वाभाविक है। उत्तर एक ही है- इन दिनों व्यापक क्षेत्रों में जो असंतुलन उत्पन्न हो रहा है, वह इतना बढ़ गया है कि अब स्रष्टा ही उसे संतुलन में साध और ढाल सकता है ।। यह स्थिति कैसे उत्पन्न हुई ? इसका उत्तर है कि धरती की व्यवस्था सँभालने का उत्तरदायित्व स्रष्टा ने मनुष्य को सौंपा है। साथ ही उसे इतना समर्थ शरीरतंत्र दिया है कि वह न केवल जीवधारियों के लिए सुख- शांति बनाए रहे वरन ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अदृश्य शक्तियों को भी अनुकूल रहने के लिए सहमत रख सके। अपने उस उत्तरदायित्व में व्यतिरेक करके जब मनुष्य अनाचार और उददंडता बरतता है- चिंतन को भ्रष्ट और आचरण को दुष्ट बनाता है तो उसकी प्रतिक्रिया अदृश्य जगत का संतुलन बिगाड़ती है और विपत्तियों का विक्षोभ उत्पन्न करती है। दैवी प्रकोप प्रत्यक्ष में लगते तो ऐसे हैं मानों अदृश्य द्वारा मनमानी की जा रही है। 

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रानी दुर्गावती

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स्वतंत्रता के लिए प्राण अर्पण करने वाली- रानी दुर्गावती

मानव- सभ्यता के आदिकाल से नारी का कार्यक्षेत्र घर माना गया है ।। वही संतान की जननी, पालन करने वाली और संरक्षिका है ।। पुरुष को वह जैसा बनाती है, वह प्राय: वैसा ही बन जाता है ।। इस दृष्टि से यदि उसे मानव जाति की निर्माणकर्त्री कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है ।। वैसे प्रकृति ने नारी को सब प्रकार की शक्तियाँ और प्रतिभाएँ पूर्ण मात्रा में प्रदान की हैं, पर गृह- संचालन की जिम्मेदारी के कारण उसमें मातृत्व और पत्नीत्व के गुणों का ही विकास सर्वाधिक होता है ।। उसको अपने इस क्षेत्र से बाहर निकलने की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है, पर जब आवश्यकता पड़ती है तो वह अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे महानता के कार्य कर दिखाती है कि दुनिया चकित रह जाती है ।।

यद्यपि वर्तमान समय में परिस्थितियों में परिवर्तन हो जाने के कारण स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के पेशों में प्रवेश कर रही हैं और शिक्षा, व्यवसाय, कला, उद्योग- धंधे, सार्वजनिक सेवा आदि अनेक क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में स्त्रियाँ दिखाई पड़ने लगी हैं ।। यद्यपि हमारे देश में अभी यह प्रकृति आरंभिक दशा में है, पर विदेशों में तो करोड़ों स्त्रियाँ सब प्रकार के जीवन- निर्वाह के पेशों में भाग ले रही हैं ।। यदि यह कहा जाए कि इंग्लैंड, अमेरिका, रूस आदि देशों की तीन चौथाई से अधिक स्त्रियाँ गृह- व्यवस्था के अतिरिक्त अर्थोपार्जन और समाज- संचालन के अन्य कार्यो में भी संलग्न हैं, तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता।।

पर एक क्षेत्र ऐसा अवश्य है, जिसमें हमारे देश तथा अन्य देशों की स्त्रियों ने बहुत कम भाग लिया है, वह है, सेना और युद्ध का विभाग ।। 

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युगऋषि चिंतन १

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ऋषि चिंतन के सान्निध्य में परम पूज्य गुरुदेव के मौलिक विचारों का प्रस्तुतीकरण है सद्विचारों के माध्यम से महामानव कैसे किसी समय विशेष में जन समुदाय को एक विशिष्ट लक्ष्य की ओर मोड़ देते हैं इसका परिचय इन छोटे छोटे विचार सार रूपी संदेशों द्वारा मिलता है । अखंड ज्योति पत्रिका के सन १९४० से सन १९६६ तक के प्रकाशित लेखों में से महत्वपूर्ण चिंतनपरक विचारों का संकलन इस ग्रन्थ में किया गया है ।

इस ग्रन्थ के स्वाध्याय से हम अपना, अपने परिवारीजनों का जीवन सफल बनाएं। अपने परिचितों, स्नेहीजनों, रिश्तेदारों एवं अथितियों को सभा सम्मेलनों, विवाह संस्कार, जन्मदिवस किसी पर्व त्यौहार पर भेंट किया जाय, ताकि अपने परिकर में भी समान विचारधारा फैले । हमारा आत्मीय पाठक बंधुओं से निवेदन है कि इस ग्रन्थ की अधिकाधिक प्रतियाँ समाज में फैलाने में अपना हर संभव सहयोग करें । 

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Thursday, 20 April 2017

युग सृजन की दिशा प्रगतिशील लेखन

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=920कला-कौशलों में अधिकांश ऐसे हैं, जो आजीविका उपार्जन, सम्मान अर्जित करने में काम आते हैं, कुछ विनोद-मनोरंजन की आवश्यकता पूर्ण करते हैं । कुछ से निजी प्रतिभा को उभारने का प्रयोजन सधता है । आमतौर से कलाकृतियाँ इसी परिधि में परिभ्रमण करती रहती हैं, पर उनमें से कुछ ऐसी हैं जो उपर्युक्त प्रयोजनों की तो न्यूनाधिक मात्रा में पूर्ति करती ही हैं, बड़ी बात यह है कि यदि सदुपयोग बन पड़े तो विश्वमानव की असाधारण सेवा-साधना करने में भी वे उच्चस्तरीय योगदान देती हैं ।

इस स्तर की कलाओं में दो मूर्द्धन्य हैं-(१) भाषण कला, (२) लेखन कला । संगीत को चाहें तो तीसरे नंबर का कह सकते हैं अथवा उसे वाणी प्रधान होने के कारण भाषण का ही एक अंश भी कह सकते हैं । अभिनय संगीत का सहोदर है । इस प्रकार वाणी के माध्यम से व्यक्त होने वाली कलाकारिता को भाषण, संगीत और अभिनय का समुच्चय भी कह सकते हैं । वर्गीकरण पृथक-पृथक भी हो सकता है । यहाँ प्रसंग एकीकरण या पृथक्करण का नहीं-यह है कि व्यक्ति की गरिमा बढ़ाने वाली और विश्व मानव की सेवा-साधना में उनके सदुपयोग की महती भूमिका होने की जानकारी सभी को है । सभी उसे स्वीकार भी करते हैं । शिक्षितों की तरह वह अशिक्षितों को भी ज्ञान गरिमा के आलोक से लाभान्वित करती है ।

युगांतरीय चेतना को अग्रगामी बनाने में मूर्द्धन्य भूमिका निभाने वाली भाषण कला का व्यापक शिक्षण प्रज्ञा-अभियान के द्वारा अत्यंत उत्साहपूर्वक सुनियोजित ढंग से किया जा रहा है । 

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युग निर्माण का शत सूत्री कार्यक्रम

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=553युग निर्माण योजना का शत- सूत्री कार्यक्रम

युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है- आत्म निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण का उद्देश्य लेकर युग निर्माण योजना नामक एक आध्यात्मिक प्रक्रिया अखण्ड ज्योति के सदस्यों द्वारा जून ११६३ से आरंभ की गई है ।। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की अभिनव रचना का लक्ष्य पूरा करने के लिए तभी से यह आंदोलन सफलतापूर्वक चल और द्रुतगति से आगे बढ़ रहा है ।।

आंदोलन के आरंभ में जनसाधारण को उसका स्वरूप समझाने के लिए जो सूत्र दिये गये थे, उनका समग्र स्वरूप इस पुस्तक में है ।। इसलिए पाठकों को ऐसा प्रतीत होगा, मानो यह कोई विचाराधीन योजना या किसी भावी कार्यक्रम की कल्पना है, पर वस्तुस्थिति ऐसी नहीं ।। विगत कई वर्षो से शत सूत्री योजना के यह सभी कार्यक्रम देश- विदेश के लाखों सदस्यों द्वारा बड़े उत्साहपूर्वक कार्यान्वित किए जा रहे हैं ।। प्रगति जिस आशाजनक और उत्साहपूर्ण ढंग से हो रही है, उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि किसी समय का यह स्वप्न अगले कुछ ही समय में एक विशाल वृक्ष का रूप धारण करने जा रहा है और युग निर्माण की बात जो अत्युक्ति जैसी लगती थी, अगले दिनों एक सुनिश्चित तथ्य के रूप में मूर्तिमान् होने वाली है ।।

नवनिर्माण का यह अभिनव आंदोलन समय की एक अत्यन्त आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण पुकार है ।। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के लिए यह योजना अपनाये जाने योग्य है ।। कारण, आज जिस स्थिति में होकर मनुष्य जाति को गुजरना पड़ रहा है, वह बाहर से उत्थान जैसी दीखते हुए भी वस्तुत: पतन की है ।। दिखावा, शोभा, श्रृंगार का आवरण बढ़ रहा है, पर भीतर ही भीतर सब कुछ खोखला हुआ जा रहा है ।। 

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युग की पुकार अनसुनी न करें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=910हमारे सामने एक नया युग चला आ रहा है, इसमें अब संदेह की कुछ भी गुंजाइश नहीं रह गई है।। संसार में जैसी घोर हलचल मची हुई है, संपत्ति, साधनों और भौतिक ज्ञान की असीम वृद्धि के होते हुए मानव- जीवन जिस प्रकार अधिक अशांत और असंतुष्ट बनता जाता है, “मानव मात्र एक है" के तथ्य को समझते हुए विभिन्न राष्ट्रों और जातियों के मतभेद जिस प्रकार तीव्र होते जाते हैं, उससे विदित होता है कि हमारे भीतर, मनुष्य- समाज के भीतर कोई ऐसी गहरी खराबी पैदा हो गई है, जो हमारे सहयोग- सामंजस्य को एक सूत्र बनने के प्रयत्नों को सफल नहीं होने देती और अनेक विषयों में आश्चर्यजनक प्रगति होते हुए हमें सर्वनाश की विभीषिका के निकट घसीटे लिए जा रही है।।

इस परस्पर विरोधी स्थिति का प्रधान कारण यही है कि हमने भौतिक ज्ञान- विज्ञान में जितनी प्रगति की है, उसके मुकाबले में अध्यात्म- ज्ञान और व्यवहार के क्षेत्र में हम कुछ भी आगे नहीं बढ़े, इतना ही नहीं उलटा पीछे हट गये है ।। इससे हमारे भीतर व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना पूर्वापेक्षा बलवती होती जाती है और नवीन वैज्ञानिक उन्नति से लाभ उठाने के लिए जिस सामूहिक भावना की, भ्रातृत्व की, मनोवृत्ति की आवश्यकता है; उसका उदय होने नहीं पाता ।। यही कारण है कि जिन वैज्ञानिक आविष्कारों से यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती थी, वे ही मानव- सभ्यता को जड़- मूल से नष्ट करने की आशंका उत्पन्न कर रहे हैं ।। 

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यह बोल रहा है महाकाल

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आप अपना लक्ष्य स्थिर कीजिए।। किस आदर्श के लिए अपना जीवन लगाना चाहते हैं, यह निश्चित कीजिए ।। तत्पश्चात उसी की पूर्ति में मन, वचन औंर कर्म से लग जाइए ।। लक्ष्य के प्रति तन्मय रहना मनुष्य की इतनी बड़ी विशेषता, प्रतिष्ठा, सफलता औंर महानता हैं कि उसकी तुलना में अनेकों प्रकार के आकर्षक गुणों को तुच्छ ही कहा जाएगा ।। 

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महाशक्ति की लोकयात्रा (Sanskrit Kavya)

 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1280"महाशक्ति की लोकयात्रा" परम वन्दनीया माताजी के दिव्य जीवन की अमृत कथा है । परात्पर प्रभु जब "सम्भवामि युगे-युगे" के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए मानव कल्याण हेतु धराधाम में अवतरित होते हैं, तब उनके साथ उनकी लीला शक्ति का भी नारी रूप में प्राकट्य होता है । इतिहास-पुराण के अनेक पृष्ठ भगवत्कथा के ऐसे दिव्य प्रसंगों से भरे पड़े हैं । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के साथ माता सीता आईं । भगवान् बुद्ध के साथ यशोधरा, चैतन्य महाप्रभु के साथ देवी विष्णुप्रिया, भगवान् श्रीरामकृष्ण देव के साथ माता शारदा ने अवतार लेकर उनके ईश्वरीय कार्य में सहायता की ।

वर्तमान युग में उसी महाशक्ति ने माता भगवती के रूप में अपनी समस्त कलाओं के साथ इस धरालोक पर अवतार लिया । अपनी इस लोकयात्रा में महाशक्ति ने अपने आराध्य वेदमूर्ति तपोनिष्ठ युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य के ईश्वरीय कार्य में सहायता करने के साथ हम सबके सामने अनेक जीवनादर्श प्रस्तुत किए । आदर्श गृहिणी, आदर्श माता, आदर्श तपस्विनी, आदर्श योग साधिका के साथ उन्होंने योग की उच्चतम दिव्य विभूतियों से सम्पन्न आदर्श गुरु का स्वरूप हम सबके समक्ष प्रकट किया । यही नहीं उन्होंने अपने पवित्र और साधना सम्पन्न जीवन के द्वारा भारतीय नारी की गरिमा को भव्य अभिव्यक्ति दी । 

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Tuesday, 18 April 2017

महाकाल की चेतावनी

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=911यह आत्मावलोकन का समय

वर्तमान समय में क्षेत्रों मे एवं हम सभी कार्यकर्ताओं की अंतरात्मा में उथल- पुथल, आपसी मनोमालिन्य बढ़ते जा रहे हैं ।। गुरुदेव की आकांक्षा के अनुसार मिशन के कार्यक्रम आपसी सामंजस्य से युद्ध स्तर पर मिशन के पाँच संस्थानों से एक रूपता के साथ चलना आवश्यक है ताकि क्षेत्रीय कार्यकर्ता असमंजस में न रहें और युग परिवर्तन की संधि बेला में हम सभी पूज्य गुरुदेव के द्वारा सौंपे गए महान उत्तरदायित्वों का पालन करने में सफल हो सकें ।। इसके लिए हम सभी को पूज्य गुरुदेव के निम्नलिखित विचारों का गंभीरता से आत्म चिंतन करके आचरण में लाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए ।। जहाँ अपनी गलतियाँ हों उन्हें दूर करके समर्पण भाव से, आपसी प्यार- सहकार से कर्तव्य पालन में जुट जाना चाहिए ।। तभी हम सभी पूज्य “गुरुदेव की कृपा से अपने जीवन को सार्थक बनाने में सफल हो सकेंगे एवं युग परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे ।। 

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महाकाल का संदेश जाग्रत आत्माओं के नाम

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युग परिवर्तन जैसे बड़े कार्यों के उत्तरदायित्व और भार सामर्थ्य-सम्पन्न लोग ही सँभाल सकते हैं। युग निर्माण योजना की विचारधारा और क्रियापद्धति विभूति संपन्न लोगों तक पहुँचाई जानी चाहिए। खोज-खोज कर उन्हें प्रभावित किया जाना चाहिए। तथ्यों का प्रस्तुतीकरण ठीक ढंग से किया जाए तो महाकाल का आह्वान वह भली प्रकार समझ सकते हैं और अपना समर्थ योगदान देकर कार्य की प्रगति में कई गुनी गति ला सकते हैं । इसी उद्देश्य से इस पुस्तिका में पूज्य गुरुदेव के ऐसे प्रखर और सशक्त विचार संकलित किए गये हैं, जिनका अध्ययन, चिंतन, मनन यदि एकाग्रता और पूर्ण मनोयोग से किया जाए तो युगधर्म के परिपालन के लिए एकसुनिश्चित प्रेरणा एवं क्रियापद्धति प्राप्त हो जाएगी ।

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मंदिर जन-जागरण के केंद्र बने

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=772भारतवर्ष में लगभग ६ लाख मंदिर हैं, जिनमें पुजारी नियत हैं और नियमित रूप से सेवा- पूजा की व्यवस्था होती है ।। इनमें से सैकड़ों ऐसे हैं ।। जिनमें दर्जनों कर्मचारी विभिन्न प्रयोजनों के लिए रहते हैं, पर हम न्यूनतम औसत निकालने के लिए यह मान लेते हैं कि हर मंदिर के पीछे केवल एक कर्मचारी नियुक्त है ।। यद्यपि हजारों ही मंदिर ऐसे हैं जिनका भोग- प्रसाद, उत्कृष्ट श्रृंगार, सफाई, रोशनी, मरम्मत आदि का खर्च लाखों रुपया मासिक है, न्यूनतम औसत भोगप्रसाद, दीपक, मरम्मत तथा पुजारी का वेतन आदि पर कुल मिलाकर १०० रुपया मासिक मान लिया जाए तो अधिक नहीं वरन् कम से कम ही समझना चाहिए ।। यह अनुमान तो लगा ही लेना चाहिए कि ६ लाख मंदिरों का खर्च १०० रुपया प्रतिमास के हिसाब से ६ करोड़ रुपया मासिक अर्थात् ७२ करोड़ रुपए वार्षिक है ।।

विशाल जन- शक्ति और विपुल धन- शक्ति

भारतवर्ष में ५६७१६९ गाँव और २६९० शहर हैं ।। कुल मिलाकर इनकी संख्या ६ लाख होती है इनमें हर जगह एक मंदिर का हिसाब तो मानना ही चाहिए ।। मामूली गाँवों और कस्बों में कई- कई संप्रदाय के कई देवताओं के कई- कई मंदिर होते हैं ।। बड़े शहरों में तो उनकी संख्या सैकड़ों होती है, फिर भी औसतन हर गाँव के पीछे एक का औसत मान लिया जाए तो इनकी संख्या भी ६ लाख हो जाती है ।।

हर मंदिर के पीछे कई- कई कर्मचारी होते हैं पुजारी, महंत, मुनीम, चौकीदार माली आदि ।। कितने ही बड़े मंदिरों में तो सैकड़ों कर्मचारी काम करते हैं ।। दो- दो तीन- तीन तो हजारों में होंगे फिर भी न्यूनतम एक पुजारी हर मंदिर के पीछे मानना ही होगा ।। इस प्रकार ६ लाख मंदिरों में ६ लाख पुजारी हो गए ।। यह सब गहस्थ होते हैं ।। अन्य उद्योगों में लगे हुए व्यक्तियों के घर वाले भी अपने काम- धंधों में सहायक होते हैं ।। 

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प्रतिगमिता का कुचक्र ऐसे टुटेगा-५९

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=371किसी भी समाज अथवा देश की प्रगति में, स्वस्थ रीति- रिवाजों एवं सत्परम्पराओं का विवेक की कसौटी पर उचित ठहरायी जा सकें, विशेष योगदान होता है।। कई परम्परागत प्रचलन ऐसे हैं जो व्यक्ति व समाज दोनों की प्रगति में आज भी सहायक हैं ।। ऐसे विवेकपूर्ण उपयोगी रीति- रिवाजों या प्रथा- परम्पराओं का अनुकरण तो उचित है किंतु जिनकी न कोई उपयोगिता है, न कोई औचित्य एवं फिर भी वे समाज में जड़ जमाए बैठे हैं -ऐसे प्रचलनों को उखाड़ फेंका जाना चाहिए, यह परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी आग उगलने वाली लेखनी से इतने तर्कों व प्रमाणों के साथ लिखा है कि कहीं भी कोई गुंजाइश उनका समर्थन करने की रह नहीं जाती ।।

युग निर्माण योजना की धुरी निश्चित ही व्यक्ति निर्माण पर टिकी है परंतु वही इकाई तो समूह रूप में मिलकर समाज का निर्माण करती है ।। समाज का नवनिर्माण तब तक संभव नहीं, जब तक कि मान्यताओं, रीति- रिवाजों, परम्पराओं, प्रथाओं- प्रचलनों के क्षेत्र में आमूलचूल क्रान्ति नहीं की जाती ।। राष्ट्र का समग्र विकास तभी संभव है जब वह इन पिछड़ेपन की ओर ले जाने वाली अवैज्ञानिक एवं नितान्त अप्रासंगिक समझी जाने वाली रूढ़िवादी मान्यताओं, अंधविश्वासों से मुक्ति पा सके ।। शिक्षा विस्तार कें साथ बहुसंख्य भारत में छिटपुट स्थानों पर इनका विरोध तो हुआ है पर एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में यह प्रक्रिया उभर कर नहीं आयी ।। यह एक ज्वलन्त मुद्दा बने एवं प्रतिगामिता के कुचक्र से हम सभी मुक्त हों, यही युग- ऋषि ने वाड्मय के इस खण्ड में कूट- कूट कर भरा है ।। 

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पतन निवारण

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मनुष्य जीवन की गरिमा को समझा नहीं जा सका तो उसे सबसे बड़ा दुर्भाग्य कहना चाहिए । सृष्टि के समस्त प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य को जो मिला है उसे अतुलनीय ही कह सकते हैं । परम प्रभु ने अपने बड़े बेटे को जो उत्तराधिकार सौंपा है, उसका प्रत्येक पक्ष अद्भुत है । सामान्य दृष्टि से तो हम भी पेट और प्रजनन में निरंतर व्यस्त अगणित समस्याओं से उलझे और संकटों के दल-दल में फँसे नगण्य जीवधारी भर हैं । अन्य प्राणी निर्वाह और सुरक्षा भर की समस्याएँ अपने पुरुषार्थ से हल करते और चैन से दिन गुजारते हैं । मनुष्य आंतरिक उलझनों, महत्त्वाकांक्षाओं, मनोविकारों और प्रतिकूल परिस्थितियों से इतना उद्विग्न रहता है कि दिन गुजारने भारी पड़ते हैं । जिंदगी की लाश बड़ी कठिनाई से ही ढोना संभव हो पाता है । 

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