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CHILDREN'S-नैतिक कहानियां(Moral Stories).
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CHILDREN'S-नैतिक कहानियां(Moral Stories).
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बच्चों के चहुँमुखी विकास के लिए कहानियों की उपयोगिता सदा सेरही
है । छोटी-छोटी कहानियाँ बच्चों में ज्ञान और नीतियों के बीजबोती हैं तथा
बालकों को अच्छे-बुरे, अपने-पराए का बोध कहानियों के माध्यम से हो जाता है ।
बच्चों के व्यक्तित्व विकास एवं संस्कारों के बीजारोपण का सबसे सशक्त
माध्यम कहानियों को माना जाता है । पहले ये कार्य दादी-नानी के द्वारा सहज
होता रहता था, परंतु पाश्चात्य प्रभाव और समया भाव के कारण इस विधा की ओर
लोगों ने ध्यान देना बंद कर दिया है। युग निर्माण योजना ने सचित्र
बाल-कहानियाँ प्रकाशित कर बच्चों को भरपूर मनोरंजन, मार्गदर्शन एवं प्रेरणा
देने का कार्य अपने हाथ में लिया है ।
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वृद्ध अध्यापक की वसीयत
एक वृद्ध रोगी मृत्यु- शय्या पर था ।। सभी परिजन दुःख से त्रस्त, मुँह पर
हवाइयाँ उड़ी हुई।। डॉक्टर परेशान था ।। उसने हर प्रकार की दवाइयाँ और
इंजेक्शन दिए थे, किंतु कोई लाभ न हुआ था ।। रह- रहकर रोगी आँखें खोलता,
विस्फारित नेत्रों से मित्रों और निकट संबंधियों को अपने चारों ओर खड़ा
देखता, पहचानने की कोशिश करता, पर कमजोरी के कारण नेत्र स्वयं मुँद जाते,
जैसे सायंकाल के मुरझाए पुष्प!
जो कुछकर सकते हों, इन्हें बचाने केलिए कीजिए! हम आपको अधिक से अधिक फीस देंगे! उसके संबंधियों ने अनुनय की ।।
चिंतित डॉक्टर ने रोगी का परीक्षण करते हुए कहा- "मैं सब दवाइयाँ और उपचार
करके देख चुका हूँ और भी कर रहा हूँ. .लेकिन रोगी बहुत बूढ़ा है.. जर्जर हो
चुका है, कई दिनों से ताकत की दवाइयों पर जीता रहा है.. .मनुष्य की आयु की
भी एक सीमा है...।"
फिर भी...फिर भी... रोते हुए संबंधी बोले -आप इनके लिए तो कुछ और प्रयत्न कीजिए।। प्राण बचाइए... जब तक साँस तब तक आस... ।
डॉक्टर फिर नया इंजेक्शन देने लगा ।।
सहसा रोगी ने अपने निर्बल हाथों से डॉक्टर का हाथ पकड़ लिया ।। धीमी सी कमजोर ध्वनि में उसने कुछ कहना चाहा ।।
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कहानी और कथा सुनने-पढ़ने की रुचि मनुष्य में स्वभावत: पाई जाती
है । जो शिक्षा या उपदेश निबंध के रूप में पढ़ना और हृदयंगम करना कठिन जान
पड़ता है वही कथा-कहानी के रूप में रुचिपूर्वक पढ़ लिया जाता है और समझ में
भी आ जाता है । कारण यही है कि निबंध या लेख विवेचनात्मक होते हैं, उनका
मर्म ग्रहण करने में बुद्धि को विशेष परिश्रम करना पड़ता है । जिन निबंधों
की भाषा अधिक प्रौढ़ अथवा गूढ़ होती है उनके समझने में प्रयत्न भी अधिक करना
पड़ता है और उसके लायक विद्या, बुद्धि तथा भाषा ज्ञान सब व्यक्तियों के पास
होता भी नहीं ।
पर कहानी की बात इससे भिन्न है । वर्णनात्मक प्रसंग सुनने का क्रम आरंभिक
अवस्था से ही चलने लगता है । छोटे बच्चे भी कहानी सुनने का आग्रह करते हैं
और उसे सुनने के लालच से रात में जगते भी रहते हैं । कम पढ़े व्यक्ति भी
कहानी-किस्सा की पुस्तक शौक से पढ़ या सुन लेते हैं । कारण यही कि कहानी में
जो घटनाएँ कही जाती हैं उनमें से अधिकांश हमको अपने या अन्य परिचित
व्यक्तियों के जीवन में घटी हुई सी जान पड़ती हैं । उन्हें समझ लेने में कुछ
कठिनाई नहीं होती । साथ ही कहानीकार उनमें जो थोड़ी बहुत विचित्र अथवा
कुतूहल की बातें मिला देता है उससे पाठक का मनोरंजन भी हो जाता है ।
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परिश्रम के बिना धनाकाँक्षा प्रकृति को पसंद नही
समुद्र अन्वेषी अंग्रेज कप्तान वैज्ञानिकों का एक दल लेकर सन् १७५८ में
लंबी यात्रा पर था ।। इसमें उसने इंग्लैण्ड से लेकर आस्ट्रेलिया, तक के
लंबे क्षेत्र के प्रामाणिक नक्शे तैयार किए थे, साथ ही उस बहुमूल्य संपदा
का पता लगाने का प्रयत्न किया जो समय- समय पर डूबे हुए जहाजों के कारण
समुद्र तल में डूबी पड़ी है ।। एक तूफान में फँस जाने के कारण सन् १७७० में
ग्रेट वैरियर रीफ के समीप उसने अपने जहाज पर लदी छै: तोपें भी पानी में
फेंक दी थी ।। कप्तान कूक के द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदनों में से कुछ गुम
हो गए है अस्तु उसके कामों का फिर सर्वे करना पड़ रहा है ।। उसने जिस स्थान
पर अपनी तोपें फेंकी थी उसी के नजदीक बहुत- सी संपत्ति समुद्र तल में होने
का संकेत था ।। अस्तु उस स्थान को ढूँढ़ने का प्रयास नए सिरे से करना पडा
।।
पिछले दो सौ वर्षो में एक के बाद एक खोजी दल दस बार उस क्षेत्र में गए, पर
उन तोपों के डुबोए जाने के स्थान का सही पता न लगा सके ।। अब फिलाडेल्फिया
की प्रकृति विज्ञान एकेड़मी के एक खोजी दल ने उस स्थान को ढूँढ़ निकाला और
छहों तोपें सुरक्षित रूप से प्राप्त कर ली गई है ।। अब अगला कदम उन स्थानों
का पता लगाने का है जहाँ बड़ी धनराशि मिलने की संभावना है ।।
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सन् १९०८ की बात है भारतवर्ष का राजनैतिक वातावरण पूरी तरह गर्म
हो रहा था। देश भर में "स्वदेशी आंदोलन" की धूम मची हुई थी। "अंग्रेजी
वस्तुओं का बहिष्कार करो" की ध्वनि से आकाश गूजँ रहा था। भारतवासियों की इस
विद्रोही भावना को देखकर ब्रिटिश अधिकारी भी कुपित होकर दमन पर तुल गये।
देश के सैकड़ों सुप्रसिद्ध नेता और कार्यकर्ता गिरफ्तार किए और ले जाकर
जेलों में बन्द कर दिये गये। स्वदेशी-प्रचार की सभाओं को पुलिस लाठी चलाकर
भंग कर रही थी। अनेक स्थानों में तो "वन्देमातरम्" कहने पर गिरफ्तार कर लिए
जाते थे। इस प्रकार जनता और सरकारी अधिकारियों में भयंकर संघर्ष हो रहा
था। भारतीय नर-नारी अपने जन्मसिद्ध अधिकारों की माँग कर रहे थे और सरकारी
कर्मचारी आंदोलन को कुचल डालना चाहते थे।
सरकार के दमन चक्र का प्रतिकार करने के लिए देश के कुछ नवयुवकों ने
शांतिपूर्ण आंदोलन का मार्ग त्यागकर शस्त्र-बल का आश्रय लेने का निश्चय
किया। खुले तौर पर तो अंग्रेजों की आधुनिक, अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित
सेना का मुकाबला कर सकना मुट्ठी भर व्यक्तियों के लिए संभव न था, इसलिए इन
क्रांतिवादियों ने गुप्त-संगठन बनाये और छिपे तौर पर बम बनाने तथा पिस्तौल
आदि एकत्रित करने का कार्य आरंभ किया। बंगाल के क्रांतिकारी दल ने अपना
सबसे पहला लक्ष्य कलकत्ता के एक मजिस्ट्रेट मि० किंग्सफोर्ड को बनाया। वे
स्वदेशी आंदोलन में पकडे़ जाने वाले व्यक्तियों को कड़ी-कड़ी सजायें दे रहे
थे। एक पंद्रह वर्ष के लड़के को उन्होंने बेंत लगाने की भी सजा दी। इस पर
क्रुद्ध होकर क्रांतिकारी दल ने मि० किंग्सफोर्ड को मारने का आदेश दे दिया।
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मानवरत्न- लाल बहादुर शास्त्री
सन् ११२१, असहयोग आंदोलन का बिगुल बज उठा।। भावनाशील लोग समय की पुकार
सुनकर लाखों की संख्या में रणक्षेत्र में जा कूदे ।। विद्यार्थियों ने
विद्यालय छोड़ दिए कर्मचारियों ने काम करना छोड़ दिया, न्यायालय बंद पड़ गए
किसानों ने लगान देना बंद कर दिया, रेल, तार, डाक सेवा का उपयोग बंद हो गया
।। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया ।।
सोलह वर्ष के एक किशोर की आत्मा भी युग की पुकार सुनकर अधीर हो उठी ।। वह
जानता था कि विद्यालय छोड़ने से उसका ही नहीं उसकी विधवा माँ का भविष्य भी
अंधकार में हो जाएगा ।। पिता जिसे मंझधार में छोड़ गए थे, अब बेटा भी आंदोलन
करने लगा, यह जानकर वह कितनी दुखी होगी ।। रिश्तेदार तो पहले ही उसकी
देशभक्ति को खतरनाक कहते रहे हैं ।। ये विवशताएँ उनके मार्ग में बाधा बनकर
खड़ी थीं।। फिर भी जीत अंतःकरण की आवाज की हुई, वह अध्यापक के सम्मुख जा
खड़ा हुआ ।। 'गुरूजी अब आज्ञा दीजिए ।' अध्यापक इस किशोर की भावनाओं को
समझते थे और घर की स्थिति भी जानते थे ।। उन्होंने समझाया 'बेटा हाईस्कूल
परीक्षा में कुछ ही महीने रहे हैं ।। परिश्रम करके तुम अच्छे डिवीजन से पास
हो जाओगे तो माँ को सहारा हो जाएगा ।' किशोर ने गुरु जी की बात सुनी पर वह
रुक न सका ।। अपने तथा अपनी बेसहारा माँ के हितों को देश हितों पर बलिदान
करके असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाला यही किशोर एक दिन भारत का
प्रधानमंत्री बना ।। अन्य राष्ट्रों के नेताओं ने आश्चर्य से सुना कि भारत
के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पास अपना घर का मकान भी नहीं,
जिन्होंने प्रधानमंत्री बनकर किश्तों पर कार खरीदी ।। महामंत्री चाणक्य
जैसा ही यह एक अनुपम उदाहरण था ।।
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कामना मानव मन की एक सहज स्वाभाविक वृत्ति है ।। यही वह वृत्ति
है जो मनुष्य को निरंतर कर्मशील बनाए रखती है।। यों लौकिक कामनाएँ तो हर
व्यक्ति करता है पर पारमार्थिक पारलौकिक या बहुजन हिताय बहुजनसुखाय के लिए
अपनी योग्यता, प्रतिभा व शक्ति को नियोजित करते हुए एक महान ध्येय को पा
लेने की दैवी अभिलाषाएँ भी कइयों के मन में उठा करती हैं ।। कुछ व्यक्ति उन
भावनाओं, अभिलाषाओं को पूर्ण नहीं पाते और कुछ पूर्ण कर लेते हैं ।। इसके
पीछे उन लोगों की व्यावहारिक सूझ- बूझ व ध्येयनिष्ठा की प्रखरता जुड़ी रहती
है ।। कोई सामान्य जन अपनी सीमित सामर्थ्य में कितना बड़ा काम कर सकता है-
इसके अनुपम उदाहरण आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं ।। पारिवारिक और
सामाजिक दायित्वों को पूरी तरह निभाते हुए भी आचार्य वर ने राष्ट्रभाषा
हिंदी के उन्नयन में जो योगदान दिया उसे सभी जानते हैं ।। उनका काल ही
हिंदी साहित्य के इतिहास में द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है ।।
हिंदी के वरद् पुत्रों में प्रतिभाशाली तो कई हुए हैं ।। उन प्रतिभाओं का
सदुपयोग करने वाले भी अनेक हुए हैं ।। किंतु जहाँ प्रश्न आता है किसी ध्येय
को लेकर श्रम की उपलब्धि- दैवी संपदा के सहारे जिन लोगों ने अपने आप में
प्रतिभा का सृजन, संवर्द्धन किया, ऐसे विरले ही मिलेंगे ।। उन्हीं में से
एक महावीर प्रसाद द्विवेदी भी हैं ।।
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Stories have always been very useful for overall development
of children. Short Stories sow the seeds of knowledge and moral ideas in
their mind. Through these stories children learn to differentiate
between good and bad, friend and foe. Stories are considered to be most
effective medium for personality development of children and for giving
them good sanskars. Previously, grandmothers (dadi & nani) used to
tell inspiring stories to children. But these days this important art is
being neglected. Yug Nirman Yojna has published Picture Books
containing short stories which will entertain, guide and inspire the
children and elders both.
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पुस्तिका में विभिन्न धर्म- सम्प्रदायों में श्रद्धा रखने वाले
छात्र- छात्राओं का विशेष ध्यान रखते हुए प्रार्थना आदि में तथा प्रेरक
प्रसंगों आदि में किन बातों पर ध्यान दिया जाय, आदि टिप्पणियाँ देने का
प्रयास किया गया है। जैसे- प्रार्थना के बाद अपने इष्ट का ध्यान, उनसे ही
सद्बुद्घि माँगने के लिए गायत्री जप, अन्य मंत्र या नाम जप करें। विभिन्न
सम्प्रदायों के श्रेष्ठ पुरुषों के प्रसंग चुने जाएँ। बच्चों से भी उनके
जीवन एवं आदर्शों के बारे में पूछा जा सकता है, उन पर विधेयात्मक समीक्षा
करें, आदि। विभिन्न स्कूलों में जाने वाले बच्चों को गणित, विज्ञान,
अंग्रेजी जैसे विषयों में कोचिंग देने, होमवर्क में सहयोग करने, योग-
व्यायाम सिखाने जैसे आकर्षणों के माध्यम से एकत्रित किया जा सकता है।
सप्ताह में एक बार इस पुस्तिका के आधार पर कक्षा चलाई जा सकती है। प्रति
दिन के क्रम में प्रारंभ में प्रार्थना, अंत में शांतिपाठ जैसे संक्षिप्त
प्रसंग जोड़े जा सकते हैं। पढ़ी- लिखी बहिनें, सृजन कुशल भाई, रिटायर्ड परिजन
इस पुण्य प्रयोजन में लग जाएँ तो प्रत्येक मोहल्ले में ‘बाल संस्कार
शालाओं’ का क्रम चल सकता है। विद्यालय के ‘संस्कृति मंडलों’ में भी यह
प्रयोग बखूबी किया जा सकता है। हमें विश्वास है कि भावनाशील परिजन लोक
मंगल, आत्मनिर्माण एवं राष्ट्र निर्माण का पथ प्रशस्त करने वाले इस पुण्य
कार्य में तत्परता पूर्वक जुट पड़ेंगे।
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अध्यात्म विद्या के वैज्ञानिक ऋषियों ने आहार के सूक्ष्म गुणों का अत्यंत
गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया था और यह पाया था कि प्रत्येक खाद्य- पदार्थ
अपने में सात्विक, राजसिक, तामसिक गुण धारण किए हुए है और उनके खाने से
मनोभूमि का निर्माण भी वैसा ही होता है । साथ ही यह भी शोध की गई थी कि
आहार में निकटवर्ती स्थिति का प्रभाव ग्रहण करने का भी एक विशेष गुण है ।
दुष्ट, दुराचारी, दुर्भावनायुक्त या हीन मनोवृत्ति के लोग यदि भोजन पकावें
या परसे, तो उनके वे दुर्गुण आहार के साथ सम्मिश्रित होकर खाने वाले पर
अपना प्रभाव अवश्य डालेंगे । न्याय और अन्याय से, पाप और पुण्य से कमाए
हुए पैसे से जो आहार खरीदा गया है उससे भी वह प्रभावित रहेगा । अनीति की
कमाई से जो आहार बनेगा वह भी अवश्य ही उसके उपभोक्ता को अपनी बुरी प्रकृति
से प्रभावित करेगा ।
इन बातों पर भली प्रकार विचार करके उपनिषदों के ऋषियों ने साधक को सतोगुणी
आहार ही अपनाने पर बहुत जोर दिया है । मद्य, मांस, प्याज, लहसुन, मसाले,
चटपटे, उत्तेजक, नशीले, गरिष्ठ, बासी, बुसे, तमोगुणी प्रकृति के पदार्थ
त्याग देने ही योग्य हैं । इसी प्रकार दुष्ट प्रकृति के लोगों द्वारा
बनाया हुआ अथवा अनीति से कमाया हुआ आहार भी सर्वथा त्याज्य है । इन बातों
का ध्यान रखते हुए स्वाद के लिए या जीवन रक्षा के लिए जो अन्न औषधि रूप
समझकर, भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया जाएगा
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शहरों में रहने वाले और विशेषतया वे व्यक्ति जिनके घरों में नल
लगे हैं, इस बात को जल्दी नहीं समझ सकते कि पानी के अभाव से भी करोड़ों
लोगों को कितना कष्ट सहन करना पड़ता है । अमेरिका आदि आधुनिक देशों में तो
जिन स्थानों में पानी की कमी होती है, सरकार समुद्र के पानी को मीठा बनाकर
बाहर से पानी लाकर नागरिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है । पर भारत के
लाखों गाँवों में जहाँ कुएँ बहुत कम और गहरे हैं, अथवा गर्मी में जिनका
पानी सूख जाता है, वहाँ के निवासियों को थोड़े से पानी के लिए भी कितना
परिश्रम और प्रयत्न करना पड़ता है, इसको भुक्त-भोगी ही जानते हैं । जहाँ
मुनुष्यों को भी पीने के लिए जल-कष्ट सहन करना पड़ता है, वहाँ गाय, बैल,
घोड़ा आदि पशुओं की क्या दशा होती होगी, इसकी कल्पना से भी मन दुःख से भर
जाता है ।
ऐसा ही दृश्य जब "जानकी मैया" ने महापुरुष विनोबा के साथ बिहार के गाँवों
की पद-यात्रा करते समय देखा, तो उसका हृदय करुणा से ओत-प्रोत हो गया । वह
विचार करने लगी कि कैसे खेद की बात है कि ये गरीब लोग पूरा पानी भी नहीं
पाते, अथवा दो-दो, चार-चार मील से लाकर अपनी प्यास बुझाते हैं जबकि नगरों
में लाखों व्यक्तियों के यहाँ चाय, शर्बत, कोको-कोला की ही भरमार होती रहती
है । उन्होंने यह बात विनोबा जी के सम्मुख प्रकट की । उन्होंने भी इसकी
गंभीरता स्वीकार की और वे इस संबंध में किसी उपाय पर विचार करने लगे ।
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श्री विश्वेश्वरैया जिन दिनों मैसूर के दीवान थे, एक दिन सरकारी
काम से कहीं दौरे पर जा रहे थे।। यह सूचना किसी प्रकार मार्ग में एक स्कूल
में पहुँच गई।। मास्टर इस अवसर को उत्तम समझकर सड़क पर पहुँचकर खड़ा हो गया
और जब श्री विश्वेश्वरैया की कार आई तो उसे रोककर उसने प्रार्थना की कि वे
स्कूल के बच्चों को दर्शन दें ।। यद्यपि उनको जाने की जल्दी थी, पर छोटे
बच्चों के आग्रह को वे टाल न सके और गाड़ी से उतरकर पाँच- सात मिनट के लिये
स्कूल के कमरे में चले गये ।। मास्टर ने कहा- "कृपया बच्चों के दो शब्द कह
दीजिये ।" विश्वेश्वरैया बिना पहले से सोचे- समझे और तैयारी किये कसी
सार्वजनिक संस्था में नहीं बोलते थे, पर बच्चों के प्रेमवश उन्होंने यों ही
दो- चार बातें कह दी ।। बच्चे खुश हो गये और उनको बारंबार धन्यवाद देने
लगे ।। पर विश्वेश्वरैया ने अनुभव किया कि उनका भाषण छात्रों के उपयुक्त न
था ।। इसलिये वे मास्टर को सूचना देकर दो- चार दिन बाद फिर उस स्कूल में
पहुँचे और लड़कों के सामने एक सारगर्भित और शिक्षाप्रद भाषण दिया, जिससे
छात्रवृंद ही नहीं, अपितु समस्त ग्रामवासी बहुत प्रभावित हुये ।। अगर वे यह
सोचकर रह जाते कि छोटे लड़के अच्छे या साधारण भाषण के अंतर को नहीं समझ
सकते तो उनसे कोई कुछ कहने वाला नहीं था।। पर उनका आरंभ से ही यह सिद्धांत
था कि कोई भी काम कभी घटिया ढंग से नहीं करना चाहिए ।। हल्के ढंग से उस
समय काम भले ही चल जाय पर उसमें स्थायित्व नहीं आ सकता ।। इसलिये कैसा भी
अवसर क्यों न हो, मनुष्य को अपना स्तर नहीं घटाना चाहिये ।। ऊँचा स्तर रखने
से उसका प्रभाव अच्छा ही पड़ता है और आज नहीं तो कल लोग उसकी तरफ आकर्षित
होते ही हैं ।।
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