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Friday, 27 January 2017
आसन-प्राणायाम से आधि-व्याधि निवारण
यह एक निर्विवाद तथ्य है कि आज की सभ्यता की घुड़दौड़ में मानव
समुदाय शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से जर्जर, दिनोंदिन दुर्बल होता चला जा
रहा है इतना ही नहीं उसका दिन का चैन एवं रात की नींद भी प्रभावित होते
चले जाने से तनाव जन्य रोगों एवं मनोविकारों में बड़ी तेजी से अभिवृद्धि हुई
है ।। सभ्यता की दिशा में प्रगति से आधुनिक विज्ञान ने अनेकानेक- साधन
मनुष्य को उपलब्ध कराए हैं ।। द्रुतगामी वाहन, ऐशो- आराम के साधन जहाँ एक
समुदाय को अकर्मण्य आलसी बनाते चले जा रहे हैं, वहाँ दूसरी ओर स्वास्थ्य के
आहार- विहार संबंधी नियमों की जानकारी के अभाव में एक बहुसंख्यक समुदाय जो
ग्रामों या कस्बों में निवास करता है अपेक्षाकृत अधिक जल्दी रोगी एवं बूढ़ा
होता चला जा रहा है ।।
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प्रसुप्ति से जागृति कि ओर-७
प्रस्तुत वाङ़्मय एक प्रयास है, इस युग के व्यास परमपूज्य
गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवन-दर्शन को जन-जन तक पहुँचाने का।
आज से 85 वर्ष पूर्व आगरा के आँवलखेड़ा ग्राम में जन्मा वेदमूर्ति तपोनिष्ठ
की उपाधि प्राप्त भारतीय संस्कृति के उन्नयन को समर्पित एवं सच्चे अर्थों
में ब्राह्मणत्व को जीवन में उतारने वाला यह राष्ट्र -सन्त अपने अस्सी वर्ष
के आयुष्य में (1911-1990) आठ सौ से अधिक का कार्य कर गया। सादगी की
प्रतिमूर्ति, ममत्व, स्नेह से लबालब अंतःकरण एवं समाज की हर पीड़ा जिनकी
निज की निज की पीड़ा थी, ऐसा जीवन जीने वाले युगदृष्टा ने जीवन भर जो लिखा,
अपनी वाणी से कहा, औरों को प्रेरित कर उनसे जो संपन्न करा लिया, उस सबको
विषयानुसार इस वाङ़्मय के खण्डों में बाँधना एक नितान्त असम्भव कार्य है।
यदि यह सफल बन पड़ा है तो मात्र उस गुरुसत्ता के आशीष से ही, जिनकी हर
श्वाँस गायत्री यज्ञमय थी एवं समिधा की तरह जिनने अपने को संस्कृति -यज्ञ
में होम कर डाला।
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अपरिमित सम्भावना मानवीय व्यक्तित्व-२१
मनुष्य पूज्यवर के शब्दों में एक भटका हुआ देवता है, जिसे यदि
सच्ची राह दिखाई जा सके, उसके देवत्त्व को उभारा जा सके जो आज प्रसुप्त पड़ा
हुआ है, तो उसके व्यक्तित्त्व रूपी समुच्चय में इतनी शक्ति भरी पड़ी है कि
वह जो चाहे वह कर सकता है, असंभव से भी असंभव दीख पड़ने वाले पुरुषार्थ
संपन्न कर सकता है । विडम्बना यही है कि मनुष्य इस प्रसुप्त पड़े भाण्डागार
को जिसमें अपरिमित संभावनाएँ हैं, पहचान नहीं पाता एवं विषम परिस्थितियों
में पड़ ज्यों त्यों कर जिन्दगी गुजारता देखा जाता है । पाश्चात्य वैज्ञानिक
कहते हैं कि मनुष्य मूलत: पशु है व वहाँ से उठकर बंदर की योनि से मनुष्य
बना है । पूज्यवर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की कसौटी पर कसे गए आध्यात्मिक
विकासवाद की दुहाई देते हुए कहते हैं यह नितान्त एक कल्पना है । मनुष्य
मूलत: देवता है, पथ से भटक गया है, यह योनि उसे इसलिए दी है कि वह देवत्त्व
की दिशा में अग्रगमन कर सके । यदि यह संभव हो सका तो वह देवत्त्व को
अर्जित कर स्वयं को क्षमता संपन्न विभूतिवान बना सकता है ।
मानवी व्यक्तित्व को एक कल्पवृक्ष बताते हुए उससे मनोवांछित उपलब्धियाँ पाने की बात कहते हुए गुरुदेव कहते हैं कि यदि मनुष्य चाहे तो अपने को सर्वशक्तिमान बना सकता है। विचारों की शक्ति बड़ी प्रचण्ड है । आत्मसत्ता को जिन विचारों से सम्प्रेषित- अनुप्राणित किया गया है उसी आधार पर इसका बहिरंग का ढाँचा विनिर्मित होगा । अपूर्णता से पूर्णता की ओर चलते चलना व सतत विधेयात्मक चिन्तन बनाए रखना ही मनुष्य के हित में है ।
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प्राण शक्ति एक दिव्य विभूति-१७
प्राण शक्ति को एक प्रकार की सजीव शक्ति कहा जा सकता है जो समस्त
संसार में वायु, आकाश, गर्मी एवं ईथर,-प्लाज्मा की तरह समायी हुई है। यह
तत्व जिस प्राणी में जितना अधिक होता है। वह उतना ही स्फूर्तिवान, तेजस्वी,
साहसी दिखाई पड़ता है। शरीर में संव्यास इसी तत्त्व को जीवनीशक्ति अथवा
‘ओजस’ कहते हैं और मन में व्यक्त होने पर ही तत्त्व प्रतिभा ‘तेजस्’ कहलाता
है। अपनी शक्ति क्षरण के द्वारा बंद कर लेने के कारण शारीरिक एवं मानसिक
ब्रह्मचर्य साधने वाले साधकों को मनस्वी एवं तेजस्वी इसी कारण कहा जाता है।
यह प्राणशक्ति ही है जो कहीं बहिरंग के सौंदर्य में, कहीं वाणी की मृदुलता
व प्रखरता में, कहीं प्रतिभा के रूप में, कहीं कला-कौशल व कहीं भक्ति भाव
के रूप में देखी जाती है। वस्तुतः प्राणशक्ति एक बहुमूल्य विभूति है। यदि
इसे संरक्षित करने का मर्म समझा जा सके तो स्वयं को ऋद्धि-सिद्धि
संपन्न-अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का स्वामी बनाया जा सकता है।
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ब्रह्मचर्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकता
संसार में प्रत्येक व्यक्ति आरोग्य और दीर्घ जीवन की इच्छा रखता
है । चाहे किसी के पास कितना ही सांसारिक वैभव और सुख-सामग्रियाँ क्यों न
हों, पर यदि वह स्वस्थ नहीं है, तो उसके लिए वे सब साधन-सामग्री व्यर्थ ही
हैं । हम अपने ही युग के रॉकफेलर जैसे व्यक्तियों को जानते हैं, जो संसार
के सबसे बड़े धनी कहलाते हुए भी अस्वस्थता के कारण दो रोटी खाने को भीतरसते
थे । इसलिए एक विद्वान के इस कथन को सत्य ही मानना चाहिए धन संसार में
बहुत बड़ी चीज नहीं है, स्वास्थ्य का महत्त्व उससे कहीं ज्यादा है ।
आरोग्यशास्त्र के आचार्यों ने स्वास्थ्य-साधन की मूल चार बातें बतलाई हैं-
आहार, श्रम, विश्राम और संयम । आहार द्वारा प्राणियों की देह का निर्माण और
पोषण होता है । अत: उसका उपयुक्त होना सबसे पहली बात है । दूसरा स्थान
श्रम का है, क्योंकि उसके बिना न तो आहार प्राप्त होता है और न वह खाने के
पश्चात देह में आत्मसात् हो सकता है । विश्राम भी स्वास्थ्य-रक्षका आवश्यक
अंग है, क्योंकि उसके द्वारा शक्ति संग्रह किए बिना कोई लगातार श्रम करते
रहने में समर्थ नहीं हो सकता चौथा संयम है, जो अन्य प्राणियों में तो
प्राकृतिक रूप से पाया जाताहै, पर अपनी बुद्धि द्वारा प्रकृति पर विजय
प्राप्त कर लेने का अभिमान रखने वाले मनुष्य के लिए जिसके उपदेश की नितांत
आवश्यकता है ।
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Thursday, 26 January 2017
उपासना समर्पण योग-३
परमपूज्य गुरुदेव ने उपासना, जो परमात्मा की की जाती है, को
आत्मा की एक अनिवार्य खुराक बताया है । दैनंदिन जीवन की अन्यान्य
आवश्यकताओं की तरह उपासना भी एक ऐसा पुरुषार्थ है जो नित्य की जानी चाहिए ।
रोजमर्रा के जीवन में हमारी आत्मसत्ता पर सूक्ष्मजगत से आ रही प्रदूषणों
की कालिमा का आवरण छाता रहता है । इस कालिमा की नित्य सफाई ही उपासनात्मक
पुरुषार्थ है । श्रीरामकृष्ण परमहंस कहा करते थे-"अपने लोटे को रोज माँजो
अर्थात अपनी आत्मसत्ता की सफाई नित्य नियमित रूप से करते रहें । उसमें कभी
आलस्य या प्रमाद न बरतें । परमपूज्य गुरुदेव ने अनेकानेक उदाहरण देकर
उपासना की महत्ता बताई है । गरम वस्तु के पास रखे पदार्थ गरम हो जाने, पारस
के संपर्क में आकर अनगढ़ लोहे के स्वर्ण बन जाने, वृक्ष का संपर्क पाकर
पाँवों से कुचल जाने वाली बेल के ऊपर आकाश चूमने तथा गंदे नाले के गंगा में
मिलकर गंगा नदी ही कहलाने की उपमाएँ देकर पूज्यवर ने व्याख्या की है कि
यही चमत्कार उपासना से मिल सकता है, यदि व्यक्ति उसका तत्त्वदर्शन विज्ञान
समझकर करें । अनेकानेक भ्रांतियों के शिकार व्यक्ति मर्म न समझकर
बाह्योपचार, बहिरंग के कर्मकांड को ही सब कुछ मान बैठते हैं । उपासना के
साथ जुड़ा हुआ शब्द है समर्पण योग । समर्पण-तादात्म्यता तद्रूपता लाए बिना
उपासना में प्राण कहाँ ? इसीलिए उपासना अधिकांश की सफल नहीं होती क्योंकि
उसमें करुण स्तर की परमात्मसत्ता से एकाकार होने की समर्पण भावना का अभाव
रहता है । जिस दिन यह हो जाता है, उस दिन परमात्मा का, महानता का,
श्रेष्ठता का जीवन में वास्तविक प्रवेश हो जाता है एवं व्यक्तित्त्व
आमूलचूल बदल जाता है ।
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प्राण चिकित्सा विज्ञान
प्राण मनुष्य शरीर की सार वस्तु है । इसके द्वारा न केवल हमजीवन
धारण किए हुए हैं, वरन बाहरी प्रभावों से अपनी रक्षा भी करते हैं और दूसरों
पर असर भी डालते हैं । ये दोनों ही कार्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं ।
डॉक्टर पिच के मतानुसार इस कार्य में एकछोटे-मोटे बिजली घर के बराबर
विद्युत शक्ति खरच होती रहती है ।हम अपनी इस शक्ति के बारे में कुछ अधिक
जानकारी नहीं रखते इसलिए इन बातों को सुनकर आश्चर्य करते हैं । वह शक्ति
हमारे जानने, न जानने की परवाह नहीं करती और जन्म से मृत्यु पर्यंत कम-बढ़
मात्रा में सदैव बनी रहती है । प्राणशक्ति का एक-एक परमाणु अपने अंदर अनंत
शक्ति का भंडार छिपाए बैठा है । इसका उपयोग करके मनुष्य देवताओंजैसे अद्भुत
कार्य कर सकता है । प्राण की रोग निवारक शक्ति प्रसिद्ध है, यदि उसके अंदर
यह गुण न होता, तो इतने विकारों सेभरे हुए संसार में एक क्षण भी नीरोग
रहना कठिन होता । उस शक्तिको यदि ठीक प्रकार से काम में लाने की विधि जान
ली जाए तो नकेवल स्वयं नीरोग रहें, वरन दूसरों को भी रोग मुक्त कर सकते हैं
। इस पुस्तक में कुछ ऐसी ही विधियाँ बताई गई हैं, जिनके द्वारा तुम अपने
पीड़ित भाइयों को रोग मुक्त करके उनकी सेवा-सहायता करते हुए अपने जीवन को
सफल बना सकते हो । जब तुम इनका प्रयोग करोगे, तो हमारी ही तरह इनकी
अव्यर्थता पर श्रद्धा करने लगोगे ।
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The Secret Of A Healthy Life
Good health and ability for proper understanding—both these are the best blessings in life.
Good health is closely related to proper understanding. It is said that a stable mind resides in a healthy body. The mind, thoughts and understanding of a person having indifferent health will never be mature. One can judge a man from the status of his health. People with good moral conduct are healthy, strong and free from diseases. They always have a smiling face. These people have some sort of a magnetism so that everyone wishes to talk to them, make friends with them and always be with them.
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Pragya Yoga For Happy And Healthy Life
Our sagacious ancestors of the Vedic Age had gifted with
precious heritage of the yoga-science of well-being. However, with
changing civilizations and attitudes towards life, in the course of
time, people largely became materialistic and ignored the ancient
sciences. Subsequent single-tracked commercialized civilization and
inclination towards bodily comforts and sensual pressures has raised
several problems in the present times. One is so busy making money and
seeking more and more comforts that one tends to neglect the fact that
the mind-body system is also like a machine, which needs careful
maintenance and "re-charging" of its components and power units. As a
result, one is facing unprecedented threats and challenges on the health
front. Preventive measures and augmentation of stamina and resistance
are crucial if one wants to sustain a healthy and hearty life. Revival
of sound practice of yoga therefore assumes greater relevance and
importance today than ever before. This book introduces the real meaning
and scope of yoga and presents a new method of practicing it for
strengthening and rejuvenation of body and mind. The method named
"Pragya Yoga" is fast and feasible, yet, comprehensive-in-effect. It can
be practiced by people of all age groups without any cost or time
constraints.
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