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Saturday, 18 March 2017
श्रम है सुख का सेतु
मानव- जीवन का सबसे बड़ा आधार श्रम ही है ।। हमारी सबसे प्रधान
आवश्यकताओं- भोजन, वस्त्र, निवास स्थान की पूर्ति किसी न किसी के श्रम
द्वारा ही होती है ।। अन्न के मिल जाने पर उसको खाने के लायक रोटी के रूप
में परिवर्तित करने में भी श्रम करना पड़ता है और बिना श्रम के वह ठीक तौर
से हजम होकर शरीर में रस- रक्त के रूप में बदल भी नहीं सकती ।। यह सब देखते
हुए भी मनुष्य श्रम से बचने की चेष्टा करते रहते है ।। इसके लिए वे अपना
कार्य- भार दूसरों पर लादने की कोशिश ही नहीं करते, वरन् तरह- तरह के
आविष्कार करके, यंत्र बनाकर भी अपने हाथ- पैरों का कार्य उनसे पूरा कराने
का प्रयत्न करते हैं ।। परिणाम यह होता है कि चाहे मनुष्य की दिमागी
शक्तियाँ बढ़ रही हों, पर शारीरिक शक्तियाँ क्षीण होती जाती है और उसका जीवन
कृत्रिम तथा परावलम्बी होता चला जाता है ।। चाहे नकली बातों को महत्व देने
वाले और विचारशून्य इन बातों में भी गौरव और शान समझते हों पर जीवन-
संघर्ष में इसके कारण विपत्तियाँ ही सहन करनी पड़ती है ।। इस सम्बन्ध में एक
लेखक ने बहुत ठीक कहा है -
"पता नहीं कहाँ से यह गलत ख्याल लोगों में आ गया है कि परिश्रम से बचने में कोई सुख नहीं है ।। परिश्रम करने से कुछ थकावट आती है, पर श्रम न करने से तो शक्ति का स्रोत ही सूख जाता है ।। मेरी समझ से तो बेकार रहने से अधिक " श्रमसाध्य " और कोई काम नहीं है ।। कुछ काम न करना मानो जीते जी मर जाना है ।"
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विवाहित जीवन का अलौकिक आनंद
आश्रम व्यवस्था हमारी देवोपम भारतीय संस्कृति का मूल आधार है ।
प्राचीन ऋषियों-मनीषियों ने गहन चिंतन-मनन के उपरांत मानवीय जीवन का चार
भागों में विभाजन किया था । सौ वर्ष के आदर्श जीवन काल को २५-२५ वर्ष के
चार खंडों में, चार आश्रमों में बांट दिया था । पहला ब्रह्मचर्य फिर गृहस्थ
और पचास वर्ष की आयु पर वानप्रस्थ तथा अंतिम संन्यास आश्रम की व्यवस्था की
गई थी । इसके अनुसार पहले २५ वर्षो में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए
शारीरिक एवं मानसिक रूप से अपने को परिपुष्ट बनाया जाता था । इसके बाद
गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके परिवार, समाज व राष्ट्र की सेवा करने का विधान
था । वानप्रस्थ व संन्यास आश्रमों में लोक कल्याण की साधना करते हुए समाज
में चतुर्दिक सुख-शांति का वातावरण निर्मित करने के सतत प्रयास में मानव
जी-जान से जुटा रहता था ।
इस व्यवस्था पर यदि गंभीरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों आश्रमों का उद्देश्य यही है कि गृहस्थाश्रम को सुचारु रूप से: व्यवस्थित समुत्रत और सुख शांति से परिपूर्ण बनाया जाए । इसका एक पक्ष यह भी है कि गृहस्थाश्रम के ऊपर ही शेष तीनों आश्रमों के समुचित पालन-पोषण करने का दायित्व भी है । इसी कारण गृहस्थाश्रम को चारों में सबसे महत्वपूर्ण कहा गया है ।
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Tuesday, 14 March 2017
परदोष दर्शन और अहंकार से बचें
यह सारा संसार गुण- दोषमय है।। संसार की कोई भी वस्तु तथा वाणी
सर्वथा गुणसंपन्न अथवा दोषमुक्त नहीं है ।। सभी में कुछ न कुछ गुण और कुछ न
कुछ दोष मिलेगा ।। परमात्मा ही अकेला पूर्ण और दोषरहित है ।। अन्य सब कुछ
गुण- दोषमय एवं अपूर्ण है ।।
सामान्यत: मनुष्यों में दोष- दर्शन का भाव रहा करता है ।। इसी दोष के कारण वे अच्छी से अच्छी वस्तु में, यहाँ तक कि परमात्मा में भी दोष निकाल लेते हैं ।। दोष- दर्शन करते रहने वाला व्यक्ति संसार में किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता ।। उसकी सारी शक्ति और सारा समय दूसरों के दोष देखने तथा उनकी खोज करने में लगे रहते हैं ।। दूसरों की आलोचना करना, उनके कार्यों तथा व्यक्तित्व पर टीका- टिप्पणी करना, उनके दोषों की गणना करना, उसका एक व्यसन बन जाता है ।। दोषदर्शी व्यक्ति निस्संदेह बड़े घाटे में रहता है ।।
छिद्रान्वेषक व्यक्ति को संसार में कुरूपता के सिवाय और कुछ दीखता ही नहीं ।। किसी बात में सौंदर्य देख सकना उनके भाग्य में होता ही नहीं ।। उसे अच्छी से अच्छी पुस्तक पढ़ने को दीजिए और उसके बारे में पूछिए तो वह बड़े अनमने मन से यही कहेगा- हाँ पुस्तक को अच्छा कह लीजिए किंतु वास्तव में वह श्रेष्ठ पुस्तकों की सूची में रखने योग्य नहीं है ।। इसकी भाषा अच्छी है पर विचार निम्न कोटि के हैं ।। विचार अच्छे हैं तो भाषा शिथिल है ।। भाषा तथा विचार दोनों अच्छे हैं तो विषय योग्य नहीं है और यदि ये तीनों बातें अच्छी हैं, तो पुस्तक बड़ी है उसका मेकअप, गेटअप अच्छा नहीं है ।।
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पत्नि का सम्मान गृहस्थ का उत्थान
"महिला जागृति अभियान' वंदनीया माता जी के संपादकत्व में अनेक
वर्षों तक प्रकाशित होती रही है ।। इस पत्रिका के माध्यम से आत्म विस्मृति
के गर्त में पड़ी नारियों को उबारने और पुरुषों को उनकी गरिमा व महिमा
समझाने का वे निरंतर प्रयास करती रही हैं ।। उनके इन लेखों की उपयोगिता और
महत्त्व आज भी उतना ही अधिक है जितना कि तब था ।। आज हमारे बीच उनके सशरीर
न रहने के कारण उनके ये लेख नारी जागृति एवं उत्थान की दिशा में हमें
विशेष रूप से प्रेरणा एवं उत्साह प्रदान करेंगे ।।
महिला जागरण एवं उन्हें, उनके बलात् अपहृत किए गए गरिमामय सिंहासन पर पुन:
प्रतिष्ठित करना वंदनीया माताजी का स्वप्न रहा है और जीवन ध्येय भी ।। इसी
तथ्य को ध्यान में रखकर हम इस श्रद्धांजलि वर्ष में "महिला जागृति अभियान'
में प्रकाशित उनके लेखों को संकलित कर निम्नलिखित तीन पुस्तकों के रूप में
प्रकाशित कर रहे हैं ।।
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निर्भय बनें, शान्त रहें
कितना ही प्रयत्न करने पर भी, कितनी ही सावधानी बरतने पर भी, ऐसा
संभव नहीं कि मनुष्य के जीवन में अप्रिय परिस्थितियाँ प्रस्तुत न हों ।।
यहाँ सीधा और सरल जीवन किसी का भी नहीं है ।। अपनी तरफ से मनुष्य शांत,
संतोषी और संयमी रहे, किसी से कुछ भी न कहे, कुछ न चाहे, तो भी दूसरे लोग
उसे शांतिपूर्वक समय काट ही लेने देंगे- इसका कोई निश्चय नहीं ।। कई बार तो
सीधे और सरल व्यक्तियों से अधिक लाभ उठाने के लिए दुष्ट, दुर्जनों की
लालसा और भी तीव्र हो उठती है ।। कठिन प्रतिरोध की संभावना न देखकर सरल
व्यक्तियों को सताने में दुर्जन कुछ न कुछ लाभ ही सोचते हैं ।। सताने पर
कुछ न कुछ वस्तुएँ मिल जाती हैं और दूसरों को आतंकित करने, डराने का एक
उदाहरण उनके हाथ लग जाता है ।।
हम सब के शरीर अब जैसे कुछ बन गए हैं उनमें पग- पग पर कोई बीमारी उठ खड़ी होने की आशंका रहती है ।। प्रकृति का संतुलन एटम- बमों के परीक्षणों से, वृक्ष- वनस्पतियों के नष्ट हो जाने से, कारखानों के धुएँ से हवा गंदी होते रहने से बिगड़ता चला जा रहा है ।। उसके कारण दैवी विपत्ति की तरह कई बार बीमारियों फूट पड़ती हैं और संयमी लोग भी अपना स्वास्थ्य खो बैठते हैं ।। खाद्य पदार्थों का अशुद्ध स्वरूप में प्राप्त होना, उनमें पोषक तत्त्व घटते जाना, आहार- विहार की अप्राकृतिक परंपरा के साथ घसीटते चलने की विवशता आदि कितने ही कारण ऐसे हैं जो संयमी लोगों को भी बीमारी की ओर घसीट ले जाते हैं ।।
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घर के वातावरण में स्वर्ग का अवतरण
भारतीय संस्कृति में पारिवारिक जीवन को एक उच्चस्तरीय योगाभ्यास
कहा है ।। योग साधना का अर्थ है- अपने सीमित और संकुचित अहं को असीम और
विराट चेतना से एकाकार कर देना ।। गृहस्थाश्रम सीमित से असीम की ओर अग्रसर
होने के लिए क्रमश: आगे बढ़ने का अभ्यास करने के लिए ऋषि प्रणीत एक
प्रयोगशाला है ।। प्राचीनकाल में अधिकांश ऋषि विवाहित ही होते थे ।।
आश्रमों में ऋषि- मुनि ऋषिकुमारों को पढ़ाते थे, तो उनकी पत्नियाँ ऋषि
कन्याओं को शिक्षा देती थीं ।। हमारी संस्कृति के अनुसार विवाह एक पवित्र
बंधन और प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक धर्मकृत्य है ।।
इस धर्मकृत्य को संपन्न करते हुए ही कोई व्यक्ति अपने "अहं" का विस्तार आरंभ करता था और परिवार के अन्य सदस्यों तक अपनी आत्मभावना की परिधि को व्यापक बनाता था ।। स्वाभाविक ही है कि विवाह के उपरांत पुरुष या स्त्री की आत्मीयता का क्षेत्र और व्यापक बन जाता है तथा उसमें स्त्री, पति, संतान, स्वजन, सगे- संबंधी, पड़ोसी और घर के पशु- पक्षी तक सम्मिलित हो जाते हैं ।। इस प्रकार विवाहित स्त्री या पुरुष यदि विवाह- बंधन के मर्म को समझें तो क्रमश: अपनी उन्नति की ओर बढ़ते चलते हैं ।। दूसरों के लिए अपने को भूल जाने की, अपने स्वार्थ को कम करने तथा परिवारीजनों की हित चिंता को महत्त्व देने की अभ्यास साधना से ही गृहस्थ साधक आगे बढ़ सकते हैं और शनैशनै: तुच्छता को महानता में, संकीर्णता को उदारता में परिणत करते चल सकते हैं ।।
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Saturday, 11 March 2017
प्रेरणाप्रद दृष्टांत-६७
कथा-कहानी के अनेक रूप हैं । हजारों पन्नों के विशालकाय उपन्यास
और दस-बीस पंक्तियों के दृष्टांत सबकी गणना उसी विभाग में होती है ।
पुराणों की कथाएँ उपाख्यान आदि की रचना भी इसी उद्देश्य से की गई है । जो
लोग वेद, उपनिषद् दर्शन, स्मृतियों में वर्णित धार्मिक उपदेशों को नहीं समझ
सकते, वे उनको कथाओं के माध्यम से रुचिपूर्वक सुन लेते हैं और कुछ लाभ भी
उठा सकते हैं ।
मनोरंजन में अक्सर धूर्तता, अंधविश्वास और अवांछनीयता तक का समर्थन रहता है । प्रचलित कहानियों में से नैतिक चेतना की प्रेरणा देने वाली कितनी हैं, यदि इसकी तलाश की जाए तो उनमें से खरी नहीं, खोटी ही सिद्ध होंगी । उन्हें सुनने- सुनाने से मनोरंजन तो हो जाता है, पर परोक्ष रूप से मस्तिष्क को अनैतिक एवं अवांछनीय तृष्णा ही प्राप्त होती है ।
इस दृष्टिकोण को सामने रखकर परमपूज्य गुरुदेव ने ऐसे छोटे-छोटे दृष्टांतों, लघु कथाओं का निर्माण किया है, जिनको लोग दस-पाँच मिनट में पढ़कर हृदयंगम कर सकें और उनमें से हर कोई उपयोगी शिक्षा ग्रहण कर सकें । ऐसी रचनाएँ भावनात्मक एवं घटनाप्रधान होने के कारण बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती हैं, क्योंकि जब पढ़ने वाला देखता है कि इस स्वार्थी और शोषण प्रवृत्ति की प्रधानता वाले जमाने में भी कुछ लोग परोपकार, कर्त्तव्यपरायणता एवं सिद्धातनिष्ठा के लिए इस प्रकार तन, मन, धन निछावर करने को सर्वस्व उत्सर्ग करने को उद्यत हो जाते हैं, तो उनके मन पर निश्चित रूप से गहरा प्रभाव पड़ता है और अगर उसी दिशा में बढ़ते रहा जाए तो धीरे- धीरे स्थायी भी हो सकता है ।
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महापुरुष-ईसा
मानव-समाज की प्रगति का इतिहास, उत्थान और पतन के युगों की एक
दीर्घ श्रृंखला की तरह है । ऐसा उदाहरण एक भी नहीं मिल सकता, जब कोई जाति
या देश निरंतर उन्नति ही करता रहा हो, जिसकी अवस्था सदा वैभव-संपन्न और
सुखी ही रही हो । ऐसा होना प्रकृति के काल-चक्र के नियमों के प्रतिकूल है ।
जब तक कोई जाति कठिनाइयों का विषम परिस्थितियों का सामना नहीं करती-तब तक
उसमें दृढ़ता ,साहस, धैर्य, सहयोग, अध्यवसाय आदि ऐसे गुणों का प्रादुर्भाव
नहीं होता, जिनके द्वारा संसार में वास्तविक अभ्युदय हो सकना और उसकी रक्षा
कर सकना संभव होता है । प्राय: ऐसा भी देखने में आता है कि जब कोई जाति
परिश्रम, अध्यवसाय और अनुकूल अवसर पा जाने से धन, सत्ता, वैभव की स्वामिनी
हो जाती है तो कुछ समय बाद उसमें मद, अहंकार और पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष का
भाव उत्पन्न हो जाता है और तब धीरे-धीरे वह जाति पतन की ओर अग्रसर होने लग
जाती है ।
हमारे भारतवर्ष के इतिहास में इस प्रकार उत्थान और पतन के न मालूम कितने युग आ चुके है ? कभी चक्रवर्ती सम्राटों का आविर्भाव होकर यह संसार की संपत्ति, सभ्यता, सत्ता का केंद्र बन गया और कभी विदेशी, विजातीय लोगों के आक्रमणों से पददलित होकर अन्याय, अपहरण और दीनता का शिकार हुआ । यह समझना कि भारतवर्ष पर गत एक हजार वर्षो में केवल मुसलमानों और ईसाइयों के ही आक्रमण हुए .हैं, यह सही नहीं है । हम पौराणिक-साहित्य में जो दैत्यों. राक्षसों और असुरों के संग्रामों की कथाएँ पढ़ते हैं, उनमें से कितने ही ऐसे विदेशी आक्रमणकारी ही थे ।
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मरणोत्तर जीवन और उसकी सच्चाई
घास-पात की तरह मनुष्य भी माता के पेट से जन्म लेता
है,पेडू-पौधों की तरह बढ़ता है और पतझड़ के पीले पत्तों की तरहजरा-जीर्ण होकर
मौत के मुँह में चला जाता है । देखने में तो मानवी सत्ता का यही आदि-अंत
है । प्रत्यक्षवाद की सचाई वहीं तक सीमितहै, जहाँ तक इंद्रियों या उपकरणों
से किसी पदार्थ को देखा-नापा जासके । इसलिए पदार्थ विज्ञानी जीवन का
प्रारंभ व समाप्ति रासायनिक संयोगों एवं वियोगों के साथ जोड़ते हैं और कहते
हैं कि मनुष्य एक चलता-फिरता पेड़-पादप भर है । लोक-परलोक उतना ही है जितना
कि काया का अस्तित्व । मरण के साथ ही आत्मा अथवा कायासदा-सर्वदा के लिए
समाप्त हो जाती है । बात दार्शनिक प्रतिपादन या वैज्ञानिक विवेचन भर की
होती तो उसे भी अन्यान्य उलझनों की तरह पहेली, बुझौवल समझा जासकता था और
समय आने पर उसके सुलझने की प्रतीक्षा की जासकती थी । किंतु प्रसंग ऐसा है
जिसका मानवी दृष्टिकोण औरसमाज के गठन, विधान और अनुशासन पर सीधा प्रभाव
पड़ता है ।यदि जीवन का आदि- अंत-जन्म-मरण तक ही सीमित है, तो फिर इस अवधि
में जिस भी प्रकार जितना भी मौज-मजा उड़ाया जा सकता हो, क्यों न उड़ाया जाए ?
दुष्कृत्यों के फल से यदि चतुरता पूर्वक बचा जा सकता है, तो पीछे कभी उसका
दंड भुगतना पड़ेगा, ऐसा क्यों सोचा जाए ? अनास्था की इस मनोदशा में
पुण्य-परमार्थ का, स्नेह-सहयोग का भी कोई आधार नहीं रह जाता ।
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पूज्यवर की अमृतवाणी-६८
इस खंड में दी जा रही अमृतवाणी के प्रमुख विषय हैं-मानव में
देवत्व का उदय, धरती पर स्वर्ग का अवतरण, देव-संस्कृति के दो आधार-गायत्री
और यज्ञ, आध्यात्मिक कायाकल्प के सूत्र और सिद्धांत, साधना से सिद्धि तथा
महाकाल की प्रज्ञा-परिजनों से अपेक्षाएँ व उनका नवसृजन हेतु आह्वान ।
मनुष्य देवता कैसे बन सकता है इसके लिए उसे अपनी तैयारी कैसे करनी होगी,
संधिकाल में सभी को किस प्रकार अपनी मनोभूमि बनानी होगी ? यह सारा पक्ष
पूज्यवर की वाणी से सुस्पष्ट उदाहरणों के माध्यम से इसमें आया है । जीवन
जीने की कला के रूप में अध्यात्म को परिभाषित करने वाले पूज्य गुरुदेव
संजीवनी विद्या को बडा स्पष्ट समझाते हैं । अपने ब्राह्मणत्व को स्वयं
पूज्य गुरुदेव ने किस प्रकार जिंदा रखा, ब्राहाण ही वस्तुत: देवत्व का
जागरण है, यह समग्र विवेचन इसमें समझा जा सकता है, यह उनकी वाणी का चमत्कार
है कि जन-जन के बीच आसानी से समझ में आने वाले उदाहरणों के द्वारा उनकी
वन्दता इतनी रोचक बन गई है कि पढ़ने वाले को कथा का आनंद आने लगता है व बात
सीधे हृदय तक पहुँच जाती है ।
अगले प्रकरण में गुरुसत्ता ने गायत्री मंत्र को समग्र धर्मशास्त्र के रूप में, देव संस्कृति के बीजमंत्र के रूप में समझाया है । उनकी ओजस्वी वाणी में प्राणों का त्राण करने वाली गायत्री की स्पष्ट व्याख्या ऐसी हृदयंगम होती चली गई है- कि पाठक के मन के सारे असमंजस निकल जाते हैं । त्रिपदा गायत्री के श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा, आस्तिकता, धार्मिकता एवं कर्तव्यपरायणता रूपी तीन चरणों की स्पष्ट व्याख्या इन प्रवचनों में पाठकगण पढ़ व समझ सकते हैं ।
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पितर हमारे अदृश्य सहायक

• परोक्ष जगत से सम्पर्क हर दृष्टि से लाभकारी
• सहयोग-सहकार भरी दिव्य आत्माएँ
• पितर : हमारे शुभचिन्तक, सच्चे मार्गदर्शक
• अनीति की अवरोधक परोक्ष शक्तियाँ
• पितरों के प्रति श्रद्धा-कृतज्ञता की अभिव्यक्ति
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Thursday, 9 March 2017
बडे़ आदमी नहीं महामानव बनें
न जाने किस कारण लोगों के मन में यह भ्रम पैदा हो गया है कि
ईमानदारी और नीति निष्ठा अपनाकर घाटा और नुकसान ही हाथ लगता है । संभवत:
इसका कारण यह है कि लोग बेईमानी अपनाकर छल-बल से, धूर्तता और चालाकी
द्वारा जल्दी-जल्दी धन बटोरते देखेजाते हैं । तेजी से बढ़ती संपन्नता देखकर
देखने वालों के मन में भीवैसा ही वैभव अर्जित करने की आकांक्षा उत्पन्न
होती है । वे देखते हैंकि वैभव संपन्न लोगों का रौब और दबदबा रहता है ।
किंतु ऐसा सोचते समय वे यह भूल जाते है कि बेईमानी और चालाकी से अर्जित किए
गए वैभव का रौब और दबदबा बालू की दीवार हीहोता है, जो थोड़ी-सी हवा बहने पर
ढह जाता है तथा यह भी कि वह प्रतिष्ठा दिखावा, छलावा मात्र होती है
क्योंकि स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से कतिपय लोग उनके मुँह पर उनकी
प्रशंसा अवश्य करदेते हैं, परंतु हृदय में उनके भी आदर भाव नहीं होता ।
इसके विपरीत ईमानदारी और मेहनत से काम करने वाले,नैतिक मूल्यों को अपनाकर नीति निष्ठ जीवन व्यतीत करने वाले भले ही धीमी गति से प्रगति करते हों परंतु उनकी प्रगति ठोस होती है तथा उनका सुयश देश काल की सीमाओं को लांघकर विश्वव्यापी और अमर हो जाता है । अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार जार्ज बर्नार्डशॉ को कौन नहीं जानता । उन्होंने अपना जीवन प्रापर्टी डीलर के यहाँ उसके कार्यालय में क्लर्क की नौकरी से प्रारंभ किया था ।
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गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना
गायत्री मंत्र से आत्मिक कायाकल्प हो जाता है । इस महामंत्र की
उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आन्तरिक क्षेत्र
में एक नई हलचल एवं रद्दोबदल आरम्भ हो गई है । सतोगुणी तत्त्वों की
अभिवृद्धि होने, दुर्गुण, कुविचार, दुःस्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्भ हो
जाते हैं और संयम, नम्रता, पवित्रता, उत्साह, स्कूर्ति, श्रमशीलता, मधुरता,
ईमानदारी, सत्य-निष्ठा, उदारता, प्रेम, सन्तोष, शान्ति, सेवा-भाव,
आत्मीयता आदि सद्गुणों की मात्रा दिन-दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है ।
फलस्वरूप लोग उनके स्वभाव एवं आचरण से सन्तुष्ट होकर बदले में प्रशंसा,
कृतज्ञता, श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं और समय-समय पर उसकी अनेक
प्रकार से सहायता करते हैं । इसके अतिरिक्त ये सद्गुण स्वयं मधुर होते हैं,
जिस हृदय में इनका निवास होगा, वहाँ आत्म-संतोष की परम शान्तिदायक शीतल
निर्झरणी सदा बहती रहेगी ।
गायत्री साधना से साधक के मन: क्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है । विवेक, तत्त्वज्ञान और ऋतम्भरा बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञान-जन्य दुःखो का निवारण हो जाता है । प्रारब्धवश अनिवार्य कर्मफल के कारण कष्टसाध्य परिस्थितियाँ हर एक के जीवन में आती रहती हैं । हानि, शोक, वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण, विरोध, आघात आदि की विभिन्न परिस्थितियों में जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग मृत्युतुल्य कष्ट पाते हैं, वहाँ आत्मबल सम्पन्न गायत्री साधक अपने विवेक, ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा, धैर्य, संयम, ईश्वर-विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते-हँसते आसानी से काट लेता है । बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी अपने आनन्द का मार्ग ढूँढ निकालता है और मस्ती एवं प्रसन्नता का जीवन बिताता है ।
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गहना कर्मणोगति (कर्मफल का सुनिश्चित सिद्धांत्)
निःसंदेह कर्म की गति बड़ी गहन है । धर्मात्माओं को दुःखपापियों
को सुख, आलसियों को सफलता, उधोगशीलों को असफलता, विवेकवानों पर विपत्ति,
के यहाँ संपत्ति, दंभियोंको प्रतिष्ठा, सत्यनिष्ठों को तिरस्कार प्राप्त
होने के अनेक उदाहरण इस दुनियाँ में देखे जाते हैं कोई जन्म से ही वैभव
लेकर पैदा होते हैं, किन्हीं को जीवन भर दुःख ही दुःख भोगने पड़ते हैं? सुख
और सफलता के जो नियम निर्धारित हैं, वेसर्वाश पूरे नहीं उतरते ।
इन सब बातों को देखकर भाग्य, ईश्वर की मर्जी, कर्म कीगीत के संबंध में नाना प्रकार के प्रश्न और संदेहों की झड़ी लगजाती है । इन संदेहों और प्रश्नों का जो समाधान प्राचीन पुस्तकों में मिलता है, उससे आज के तर्कशील युग में ठीक प्रकार समाधान नहीं होता । फलस्वरूप नई पीढी, उन पाश्वात्य सिद्धांतोंकी ओर झुकती जाती है, जिनके द्वारा ईश्वर और धर्म को ढोंग और मनुष्य को पंचतत्त्व निर्मित बताया जाता है एवं आत्मा के अस्तित्व से इंकार किया जाता है कर्म फल देने की शक्ति राज्यशक्ति के अतिरिक्त और किसी में नहीं है ईश्वर और भाग्य कोई वस्तु नहीं है आदि नास्तिक विचार हमारी पीढ़ी में घर करते जा रहे हैं|
इस पुस्तक में वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण से कर्मकी गहन गति पर विचार किया गया है और बताया गया है किजो कुछ भी फल प्राप्त होता है, वह अपने कर्म के कारण ही है । हमारा विचार है कि पुस्तक कर्मफल संबंधी जिज्ञासाओं का किसी हद तक समाधान अवश्य करेगी |
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Support Is Needed For Self Evolution
The credit for higher qualifications is generally given to the
students own hard Endeavour, though factually, the success also depends
indirectly on the extraordinary role played by guardians dedication and
expertise and hard work of teachers. It is true that welfare of a
person and development of personality are by and large related to
persons own thinking, character, behavior, strong determination and
courage. Nevertheless, in this process, some indirect paranormal
influences and divine grace too take part, a communication with which is
established through the medium of the spiritual guide known as Guru.
The latter builds up the foundation for strengthening power of faith and
devotion (shraddha) in the disciple. It is this attribute of Shraddha
with the help of which the disciple is able to achieve his spiritual
goal without difficulty.
In this element of shraddha are hidden infinite possibilities. Profound faith of Meera had compelled the deity Girdhar Gopal to live with her in human form. When Dronacharya had declined to accept Eklavya as his disciple, the latter had sculptured it clay-model of his person and visualizing it as Guru by virtue of shraddha had derived greater expertise from it than Dronacharya himself was capable of imparting. With his shraddha Ramkrishna Paramhans was this to…..
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Wednesday, 8 March 2017
Loose Not Your Heart
Before looking at the faults of others, find your own faults.
Before exposing others evils, see if you have any evils. If so, first
remove them. The time you spend in censuring others, better spend in
your self-development. You will agree that instead of increasing ill
will due to ensuring others, you are proceeding on the path of eternal
pleasure.
Oh men! Who want to conquer the whole world, first try to conquer yourself? If you are able to do it, then one day you will fulfil your dream of conquering the world. Being the master of your senses, you will be able to guide all the living beings. None will be your opponent in this world.
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Health, Wealth And Spirituality
Diagnose, Cure And Empower Yourself By Currents Of Breath
Swara Yoga refers to an Independent and complete in Itself
branch of yoga. It deals with the physiological, psychological and
spiritual aspects of the rhythmic notes of breathing and the associated
flow of bio-electrical currents and prana (vital spiritual energy). The
preeminent science (swara-vijnana) of this powerful yoga was derived by
the Vedic Sages, whose enlightened acumen had a reach into the deepest
depths of perceivable and sublime components of Nature and the diverse
forms of life manifested in it…..
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