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Monday, 7 November 2016
सेठ जमनालाल बजाज
एक और भामाशाह- श्री जमनालाल बजाज
सन १९२० में नागपुर कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था ।। वर्धा के प्रसिद्ध सेठ जमनालाल जी उस समय रायबहादुर
आनरेरी- मैजिस्ट्रेट भी थे, उसके स्वागताध्यक्ष थे ।। उस अधिवेशन में विशेष रूप से महात्मा गाँधी के असहयोग प्रस्ताव पर विचार किया गया और निश्चय किया गया कि विदेशी सरकार से समस्त प्रकार का संबंध और व्यवहार बंद करके उसे विवश किया जाय कि भारतवर्ष को स्वराज्य अधिकार देने में अधिक विलंब न करे ।। इस प्रस्ताव के पास होने पर जमनालाल जी ने सबसे पहले अपनी रायबहादुरी और आनरेरी मैजिस्ट्रेटी छोड़ने की घोषणा की ।।
इसी अवसर पर उन्होंने महात्मा गांधी से कहा कि यद्यपि आपके चार पुत्र हैं, तो भी मुझे अपने पाँचवे पुत्र के रूप में स्वीकार कर लें! दूसरे शब्दों में इसका अर्थ था कि आप मुझे गोद (दत्तक) ले लें ।। यद्यपि एक ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो आकार और वजन की दृष्टि से गांधी जी की अपेक्षा लगभग डयौढे होंगे, इस प्रकार की गोद लेने की प्रार्थना सुनने वालों को अनौखी जान पडी़ और गांधी जी भी एक बार आश्चर्य में पड़ गये पर उनका आग्रह देखकर इसकी स्वीकृति दे दी ।।
यद्यपि जमनालाल जी चार वर्ष की आयु में वर्धा के सेठ बच्छराज जी द्वारा पोते के रूप में गोद लिये गये थे पर उस समय उनको इस परिवर्तन का कोई ज्ञान न था ।। पर इस बार दत्तक पुत्र होते समय दोनों पक्षों को इस बात के महत्त्व और र्पारेणामों का अच्छी तरह ज्ञान था ।।
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सरोजिनी नायडू
मातृभूमि की सच्ची सेविका- श्रीमती सरोजिनी नायडूलगभग सौ वर्ष पूर्व की बात होगी की इंगलैड की एक निजी "गोष्ठी ने एक १५-१६
वर्ष की भारतीय बाला उस देश के दो- चार प्रसिद्ध साहित्यिकों से वार्तालाप
कर रही थी। अंग्रेजी साहित्य का प्रसिद्ध आलोचक एडमंड गोले भी उनमें से एक
था ।। कुछ सोच- विचार कर उसने अपनी कुछ काव्य- रचनाएँ गोसे के हाथ में दी
और कहा इनके विषय में अपनी सम्मति देने की कृपा करें।"
गोसे ने बड़े ध्यान से उन रचनाओं को पढ़ा, उन पर विचार किया और फिर कहने लगा- शायद मेरी बात आपको बुरी जान पड़े, पर मेरी सच्ची राय यही है कि आप इन सब रचनाओं को रद्दी की टोकरी में डाल दें। इसका आशय यह नहीं कि यह अच्छी नहीं हैं। पर तुम जैसी एक बुद्धिमती भारतीय नारी से, जिसने पश्चिमी भाषा और काव्य- रचना में दक्षता प्राप्त कर ली है, हम योरोप के वातावरण और सभ्यता को लेकर लिखे गये काव्य से तुलना की अपेक्षा नहीं करते। वरन् हम चाहते हैं कि आप हमको ऐसी रचनाएँ दे, जिनसे हम न केवल भारत के वरन् पूरे पूर्व की आत्मा के दर्शन कर सकें।
अपनी रचनाओं की यह आलोचना उस कवयित्री को बहुत हितकर जान पड़ी और उसी दिन से उसने गोसे को अपना गुरु मान लिया। उसके पश्चात् उसने जो काव्य- रचना की, उसने योरोप की नकल करने के बजाय भारत और पूर्व से अंतर्निहित विशेषताओं के दर्शन ही योरोप वालों ने किये और सर्वत्र उनका बड़ा। सम्मान होने लगा ।। यह बाला और कोई नहीं "भारत-कोकिला" के नाम से प्रसिद्ध श्रीमती सरोजिनी नायडू (सन् १८७६ से १६४६) ही थी।
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सन्त सुकरात
ईसा मसीह के जन्म से भी चार सौ वर्ष पहले एथेन्स (यूनान) के
न्यायालय में एक सत्तर वर्षीय वृद्ध मनुष्य खड़ा हुआ था। उसके ऊपर अभियोग
लगाया गया था कि वह नवयुवकों को विपरीत उपदेश देकर गलत रास्ते पर ले जाता
है। दूसरा अभियोग यह भी था कि उसने प्रजातंत्र के अधिकारियों के आदेश की
अवहेलना की है। यह अभियुक्त और कोई नहीं, पश्चिमी संसार का एक अति प्राचीन
दार्शनिक सुकरात था।
पाठक देख सकते हैं कि सुकरात ने ज्ञानी व्यक्ति का जो लक्षण बतलाया, वह हमारे ऋषि-मुनियों के सिद्धांतों से पूर्ण रूप से मिलता हुआ है। हमारे यहाँ कहा गया है कि ज्ञान की कोईसीमा नहीं। सामान्य रूप से ज्ञानी कहा जाने वाला व्यक्ति जितना जानता है, वह संपूर्ण ज्ञानराशि की तुलना में एक घड़े में एक बूंद के समान भी नहीं है। जिनको "महाज्ञानी" कहा जाता है, वे भी कभी यह नहीं कह सकते कि हमने पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लिया है। उदाहरण के लिए सांख्य और वैशेषिक जैसे जगत प्रसिद्ध दर्शनों के रचयिता भी शिल्प, संगीत, काव्य के विषय में अपने को निष्णात नहीं कह सकते। फिर अध्यातम-ईश्वर, जीव, आत्मा, परलोक जैसे सर्वथा अप्रत्यक्ष और अव्यक्त विषय में तो कोई दावे के साथ कुछ कैसे कह सकता है ? इसलिए भारतीय ऋषि-मुनियों ने सब कुछ वर्णन कर देने के बाद भी कहा है – "नेति-नेति" ? अर्थात् जितना हम जानते थे उतना हमने बतला दिया, पर यह इस विषय की अन्तिम सीमा नहीं है। इसके बाद भी जानने की बहुत सी बातें हैं, जिनका पता हमको नहीं, पर संभव है और किसी को हो, अथवा आगे चलकर जिनकी जानकारी हो सके।
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संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे
प्रेमी हृदय का मार्ग
घृणा, विद्वेष, चिड़चिड़ापन, उतावली, अधैर्य, अविश्वास यही सब उसकी संपत्ति थे ।। यों कहिए कि संपूर्ण जीवन ही नारकीय बन चुका था, उसके बौद्धिक जगत में जलन और कुढ़न के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं था ।। सारा शरीर सूखकर काँटा हो गया था ।। पड़ोसी तो क्या पीठ पीछे मित्र भी कहते- स्टीवेन्सन अब एक- दो महीने का मेहमान रहा है; पता नहीं, कब मृत्यु आए और उसे पकड़ ले जाए ?
विश्वविख्यात कवि राबर्ट लुई स्टीवेन्सन के जीवन की तरह आज सैकड़ों- लाखों व्यक्तियों के जीवन मनोविकारग्रस्त हो गए हैं पर कोई सोचता भी नहीं कि यह मनोविकार शरीर की प्रत्येक जीवनदायिनी प्रणाली पर विपरीत प्रभाव डालते हैं ।। रूखा- सूखा बिना विटमिन प्रोटीन और चरबी के भोजन से स्वास्थ्य खराब नहीं होता, यह तो चिंतन, मनन की गंदगी, ऊब और उत्तेजना ही है जो स्वास्थ्य को चौपट कर डालती है शरीर को खा जाती है ।।
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Sunday, 6 November 2016
संत तुकाराम
संसार में सभी मनुष्यों का लक्ष्य धन, संतान और यश बताया गया है।
इन्हीं को विद्वानों ने वित्तैषणा, पुत्रैषणा और लोकैषणा के नाम से पुकारा
है। इन तीनों से विरक्त व्यक्ति ढूँढ़ने से भी कहीं नहीं मिल सकता। संभव है
किसी मनुष्य को धन की लालसा कम हो, पर उसे भी परिवार और नामवरी की प्रबल
आकांक्षा हो सकती है। इसी प्रकार अन्य व्यक्ति ऐसे मिल सकते हैं कि जिनको
धन के मुकाबले में संतान या यश की अधिक चिन्ता न हो। पर इन तीनों इच्छाओं
से मुक्त हो जाने वाला व्यक्ति किसी देश अथवा काल में बहुत ही कम मिल सकता
है।
इस प्रकार विरक्त अवस्था में रहकर उन्होंने भूख, प्यास, निद्रा, आलस्य को जीत लिया। गीता के अनुसार "युक्ताहार विहार" होने से सब इन्द्रियाँ वश में आ गयीं। समय-समय पर वे तीर्थ यात्रा को भी जाते थे, पर वे तीर्थ आस-पास के ही होते थे। अपने पूर्वजों के नियमानुसार आषाढ़ और कार्तिक की पूर्णिमा को पंढरपुर तो जाते ही थे। ज्ञानेश्वर की जन्म भूमि "आलदी" तथा एकनाथ का निवास स्थान "पैठण" उनके गाँव से पास ही थे। फिर एक बार २३-२४ वर्ष की अवस्था में उन्होंने समस्त भारत के तीर्थों की यात्रा करके भारतीय समाज की अवस्था और तत्कालीन समस्यायों की जानकारी प्राप्त की। पर तीर्थों की दशा उस समय भी बहुत त्रुटिपूर्ण हो गयी थी और सब जगह धर्म-जीवियों ने उनको पेट भरने का साधन बना लिया था।
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विश्ववंद्य सन्त वसुधा जिन्हें पाकर धन्य हुई
भक्तिमार्ग के प्रवर्तक प्रसिद्ध धार्मिक संत स्वामी रामानंद
काशी से रामेश्वरम की यात्रा पर निकले थे ।। मार्ग में एक गाँव पड़ता था -
आलंदी ।। स्वामी रामानंद ने वहाँ अपना डेरा डाला और कुछ दिनों तक रुक कर
जन- साधारण को ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी में मज्जित कराते रहे ।।
स्वामी रामानंद एक मारुति मंदिर में ठहरे हुए थे, उसी मंदिर में गाँव की एक
युवती स्त्री भी प्रतिदिन दर्शन और पूजन के लिए आया करती थी ।। संयोग से
एक दिन स्वामीजी का उससे सामना हो गया ।। स्त्री ने रामानंद जी को प्रणाम
किया तो बरबस उनके मुँह से निकल गया पपुत्रवती भव । आशीर्वाद सुनकर युवती
पहले तो हँसी फिर एकाएक चुप हो गई ।। स्वामी जी को कुछ समझ में नहीं आया
उन्होंने पूछा… देवी तुम हँसी क्यों हो ? फिर एकाएक चुप क्यों हो गई ? हैं
उस युवती ने कहा - मेरी हँसी और फिर चुप्पी का कारण यह है कि आप जैसे
महात्मा का आशीर्वाद बिल्कुल निष्फल जाएगा । क्यों बेटी तुम्हारी कोई संतान
नहीं है क्या - माथे पर सिंदूर और हाथों में चूडियाँ देखकर स्वामी जी ने
उसके सधवा होने का अनुमान लगाते हुए कहा ।।
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विज्ञान उपवन के महकते पुष्प
जर्मनी देश का एक शहर ।। बड़ी तेज बारिश हो रही थी ।। एक सभ्य और
प्रतिष्ठित- सा देखने वाला आदमी अपने हैट को कोट के भीतर छुपाकर चला जा रहा
था ।। पास में छाता भी नहीं था ।। रास्ते में चलते हुए कई लोगों ने
नमस्कार किया ।। कुछ परिचित मित्र भी मिले ।। वह व्यक्ति उनसे हँसता- बोलता
अपनी राह पर चला जा रहा था ।। किसी ने पूछा- भाई ! तेज बारिश हो रही है ।। हैट से सिर को ढकने के
बजाए तुम उसे कोट में दबाकर चल रहे हो ।। क्या तुम्हारा सिर नहीं भीग रहा
है ?
भीग तो रहा है परंतु बाद में सूख जाएगा, लेकिन हैट खराब हो गया तो नया खरीदना पड़ेगा ।। नया हैट खरीदने के लिए मुझे समय, धन निकालना पड़ेगा ।। जानते हो जिस काम में लगा हुआ है इससे उसमें कितना व्यवधान होगा। उस व्यक्ति ने कहा ।।
वास्तव में यह व्यक्ति जिस काम में लगा हुआ था बड़ा महत्वपूर्ण था ।। विज्ञान के क्षेत्र में उस प्रतिभाशाली व्यक्ति ने जो खोजें की, सारा संसार उनसे उपकृत है ।। और ऐसी छोटी- छोटी बातों में भी समय और धन लगाने को व्यर्थ समझने वाला वह व्यक्ति था संसार का महानतम वैज्ञानिक- अल्वर्ट आइंस्टीन ।।
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राष्ट्रमाता कस्तूरबा गाँधी
भारतीय नारियों के लिए आदर्श - राष्ट्रमाता कस्तूरबा
यह उस समय की बात है जब महात्मा गांधी भारतवासियों पर किये जाने वाले अत्याचारों के विरुद्ध दक्षिण अफ्रीका में गोरों की सरकार से जूझ रहे थे । सरकार हिंदुस्तानियों को पदावनत और दीन-हीन बनाने के लिए नये-नये कानून बना रही थी और गांधी जी अपने अहिंसात्मक सत्याग्रह से उसके आक्रमण को व्यर्थ करने का प्रयत्न कर रहे थे । उन्हीं दिनों सरकारी अधिकारियों ने एक नियम यह बनाया कि भारतवासियों के अपनी धार्मिक पद्धति के अनुसार किये विवाह गैर कानूनी माने जायेंगे और उनकी स्त्रियाँ पत्नी नहीं रखेल के दर्जे की समझी जायेंगी । गांधी जी तो इसके विरुद्ध सत्याग्रह करने ही वाले थे, पर उन्होंने विचार किया कि इस प्रश्न पर यदि स्त्रियाँ भी सत्याग्रह में भाग लेकर जेल जायें तो ठीक रहेगा । साथ ही वे यह भी जानते थे कि स्त्रियों का जेल जाना खतरे का काम है । इसलिए उन्होंने विचार किया कि सबसे पहले अपनी पत्नी कस्तूरबा को ही इसके लिए तैयार किया जाए । वे जानते थे कि यदि वे बा से जेल जाने को कहेंगे, तो वह इनकार तो नहीं करेगी, पर बाद में उसका कहाँ तक निर्वाह कर सकेगी, इसका निश्चय न था । इसलिए वे ऐसा अवसर खोजने लगे, जब सामान्य बात-चीत करते हुए इसकी चर्चा कर ली जाय ।
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रवीन्द्र नाथ टैगोर
साहित्यिक ऋषि - रवींद्र
इंग्लैंड में जाड़े का मौसम कितना कठिन और कष्टप्रद होता है इसे भुक्तभोगी
जानते हैं ? मोटे- मोटे ऊनी कपड़े लाद लेने पर भी शीत से पीछा नहीं छूटता ।।
ऐसे ही एक दिन में महाकवि रवींद्र लंदन की एक सड़क पर जा रहे थे ।। चलते-
चलते उन्होंने देखा कि मार्ग के पास ही एक व्यक्ति खड़ा है ।। उसके फटे
जूतों में से उसके पैर दिखाई पड़ रहे थे, क्योंकि उसके पास मोजे नहीं थे ।।
कपड़ों की कमी से सीना भी कुछ खुला था ।। इंग्लैंड में भीख माँगना कानूनन
माना जाता है, इसलिए उसने कुछ कहा तो नहीं, पर एक क्षण लिए अर्थपूर्ण से
देखता रहा ।। रवि बाबू का हृदय उसकी दीनता पर द्रवित गया और उसके हाथ पर एक
गिन्नी (स्वर्ण- मुद्रा) रखकर आगे चल दिये ।। एक मिनट बाद ही वह दौड़ता हुआ
इनके पास आया और कहने लगा- महोदय, आपने भूल से मुझे एक गिन्नी दे दी है ।
यह कहकर वह उसे वापस करने लगा ।। जब रवि बाबू ने आश्वासन दिया तब वह उसे
लेकर गया ।।
इस छोटी- सी घटना से जहाँ महाकवि की दयार्द्र प्रकृति का पता लगता है वहाँ
यह भी विदित होता है कि इंग्लैंड जैसे "रुपया परस्त" समझे जाने वाले देश के
निवासी हम संसार को नश्वर कहने वाले लोगों की अपेक्षा कितने अधिक ईमानदार
और सत्य- व्यवहार करने वाले हैं ।। एक गरीब भिखारी की तो बात क्या, यहीं के
अधिकांश सफेदपोश बाबू और धनी व्यक्ति भी भूल से किसी से कुछ अधिक पा जाएँ
तो उसे चुपके से जेब के हवाले करते हैं ।। इतना ही क्यों हमने प्राय: सेठ-
साहूकारों को तरकारी मंडी में सौदा तुल जाने पर छोटी के बदले बड़ी चीज लेने
का प्रयत्न करते देखा है ।। भाव- ताव और लेन- देन में झूठे व्यवहार को यहीं
अधिकांश व्यक्ति एक बुराई के बदले चतुरता समझते हैं ।। इतने पर भी हम अपने
को ससार भर में सबसे अधिक धार्मिक और आदर्शवादी मानते हैं ।। इस दंभ का
कुछ ठिकाना नहीं है ।।
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मानवता को विश्वबंधुत्व का मंत्र देने वाले सृजन शिल्पी
अहिंसा के पुजारी - अफ्रीका के गांधी जोमो केन्याता
स्कॉटलैंड मिशन के एक बुजुर्ग पादरी ने सड़कों पर भटकते और धूल की खाक छानते फिर रहे एक दसवर्षीय बालक को देखा तो उनके मानवीय हृदय में दयार्द्र भाव जाग्रत हो उठा और उन्होंने उसका नाम, ग्राम, पिता, निवास आदि सभी का परिचय पूछा ।। दसवर्षीय बालक के उत्तरों से जो पता चला उससे के पादरी की आत्मा द्रवित हो उठी ।। नाम जो भी कोई पुकारे, गाँव का पता नहीं, पिता का मुँह भी नहीं देख पाया और जहाँ शाम हो जाए वहीं निवास- इस स्थिति का जिस भोलेपन से परिचय दिया और अंतर की पीड़ा अपनी द्रवीभूत कर देने वाली शक्ति के साथ जिस तरह उभर आई, उसे देखते हुए पादरी से यह कहते ही बना- "तुम हमारे साथ रहोगे ।"
खाने को मिलेगा - एक ही शर्त थी उस अफ्रीकी बालक की और इसका सकारात्मक उत्तर देते हुए पादरी ने इतना भर कहा- भर पेट ।।
"तो मैं जरूर आपके साथ रहूँगा और जो भी काम बताएँगे करूँगा ।"
इसी शताब्दी के दूसरे दशक ही घटना है ।। केन्या में धर्मप्रचार और मानव सेवा का कार्य कर रहे एक पादरी तथा एक फटेहाल गरीब और भूखे बालक के बीच हुआ संवाद है यह।। इस संवाद का परिणाम यह हुआ कि पादरी ने उसे अपने फोर्ट हाल मिशन में भरती कर लिया ।। वहाँ पर उसे बढ़ईगीरी का काम सिखाया जाता, निर्धारित घंटों में शिक्षा दी जाती और खाने- पीने का कोई अभाव तो था ही नहीं ।।
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माँ की सीख
बच्चों के चहुँमुखी विकास के लिए कहानियों की उपयोगिता सदा सेरही
है । छोटी-छोटी कहानियाँ बच्चों में ज्ञान और नीतियों के बीजबोती हैं तथा
बालकों को अच्छे-बुरे, अपने-पराए का बोध कहानियों के माध्यम से हो जाता है ।
बच्चों के व्यक्तित्व विकास एवं संस्कारों के बीजारोपण का सबसे सशक्त
माध्यम कहानियों को माना जाता है । पहले ये कार्य दादी-नानी के द्वारा सहज
होता रहता था, परंतु पाश्चात्य प्रभाव और समया भाव के कारण इस विधा की ओर
लोगों ने ध्यान देना बंद कर दिया है। युग निर्माण योजना ने सचित्र
बाल-कहानियाँ प्रकाशित कर बच्चों को भरपूर मनोरंजन, मार्गदर्शन एवं प्रेरणा
देने का कार्य अपने हाथ में लिया है ।
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महात्मा गाँधी
गाँधीजी का वास्तविक जीवन संघर्ष सन् १८९३ से आरम्भ होता है, जब
डेढ़ वर्ष तक बंबई और राजकोट में बैरिस्टरी के धंधे में सफलता प्राप्त न
होने पर वे एक भारतीय व्यापारी के मुकदमे की पैरवी करने दक्षिण अफ्रीका गए।
वहाँ अदालती काम तो उनको थोड़ा ही करना पड़ा, पर भारतवासी होने के कारण
कदम-कदम पर उनको अपमानजनक व्यवहार सहन करना पड़ा, जिससे उनकी आँखें खुल गईं।
वहाँ के गोरे सभी भारतवासियों को कुली-मजदूर मानते थे और इसलिए गाँधीजी को
"कुली बैरिस्टर" के नाम से पुकारते थे।. . . कुछ मित्रों के आग्रह से
उन्होंने वहाँ रहकर इस अन्याय के प्रतिरोध का निश्चय किया।
वर्तमान युग में जबकि संसार के लोग आधिभौतिक (वैज्ञानिक) चमत्कारों पर ही विशेष जोर दे रहे हैं, भारतवर्ष का यह वीर और तपस्वी नेता अपने सात्विक गुणों, स्वार्थ-त्याग और आत्म-शक्ति के कारण ही देश और विदेशों में अत्यधिक सम्मान प्राप्त कर रहा है। जिस समय पाश्चात्य सभ्य राष्ट्र अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए युद्ध के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग जानते ही नहीं, उस समय महात्मा गाँधी अपने राष्ट्रीय आन्दोलन को "अहिंसात्मक असहयोग" के पथ पर चला रहे हैं। वे कहते हैं कि, भारत को रक्तपात से ही स्वराज्य मिल सकता है, तो हम दूसरों के बजाय अपना ही रक्त क्यॊं न बहावें ? हिंसा का आश्रय लेना तो स्पष्टत: आत्मा की दुर्बलता का प्रमाण है। वीर पुरुष तो वही है – जो अपने शत्रु पर भी दया करता है।"
योरोपियन प्रतिनिधियों ने बड़े विनीत भाव से कहा – "आप से भेंट होने को हम अपना बड़ा सौभाग्य समझते हैं। आप जब बोलते हैं तो जान पड़ता है कि वे शब्द "बाइबिल" में से ही चले आ रहे हैं।
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Saturday, 5 November 2016
महर्षि कार्ल मार्क्स
उस समय जर्मन सरकार जन-जाग्रति का दमन करने पर उतारू हो गई थी।
योरोप में क्रान्ति की जो हवा फैल रही थी, वह जर्मनी में भी पहुँच गई थी।
जनता चाहती थी कि देश का शासन सार्वजनिक हित को दृष्टि में रखकर किया जाय
और शासन संस्था में प्रजा के प्रतिनिधियों को उचित स्थान मिले। पर निरंकुश
शासक इस प्रकार की माँग को “छोटे मुँह बड़ी बात” समझते थे और इसलिए जनता के
मुंह को तरह-तरह से बंद करने की कोशिश कर रहे थे।
ऐसे समय में कार्लमार्क्स (सन् १८१८से१८८३) ने सरकार का मुकाबला करने के लिए “राइनिश जीतुंग” नामक अखबार का संपादन ग्रहण किया। उसकी लेखनी ऐसी जोरदार थी और वह सरकार की गलत नीतियों पर ऐसे प्रहार करता था कि कुछ ही समय में उसका नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया। पर साथ ही सरकारी “सेंसर” की क्रूर दृष्टि भी उस पर अधिकाधिक पड़ने लगी और उस पत्र के कार्य में तरह-तरह की विघ्न बाधाएं डाली जाने लगीं। तो भी मार्क्स ऐसे घुमा-फ़िराकर लिखता था कि वह सेंसर के फंदे से बच जाता था। अंत में सरकार ने अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया और “राइनिश जीतुंग” को राज द्रोही बतलाकर जबरदस्ती बंद कर दिया।
जब मार्क्स ने जर्मनी में विद्रोह फैलाने के लिए ऐसा प्रचार कार्य आरम्भ किया, तो वहाँ की सरकार चौकन्नी हो गई और उसने फ्रांस की सरकार से इसकी शिकायत की। फ्रांसीसी सरकार ने मार्क्स को अपने यहाँ से निकल जाने की आज्ञा दे दी। इस पर वह बेलजियम की राजधानी ब्रूसेल्स चला गया। वहाँ पर भी वह मजदूरों के संगठन की चेष्टा करता रहा और “लीग आफ़ जस्ट” (न्याय संघ) नामक संस्था में शामिल होकर, योरोप के समस्त देशों में उसके द्वारा प्रचार कार्य की चेष्टा करने लगा।
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प्रफुल्ल चन्द्र राय
सन् १८८९ का वर्ष था। इंग्लैंड में रसायनशास्त्र की सर्वोच्च
परीक्षा डी० एस-सी० पास करके एक बंगाली तरुण बंगाल के शिक्षा-विभाग के
प्रधान अधिकारी मि० क्राफ़्ट के सामने यह शिकायत करने पहुँचा कि जब उसकी
योग्यता वाले अँग्रेजों को ११००-१२०० वेतन पर नियुक्त किया जाता है, उसको
२५० रुपया मासिक की सहायक प्रोफेसर की जगह ही दी जा रही है। मि० क्रफ़्ट ने
कुछ नाराजगी के साथ कहा – "जिन्दगी में सभी तरह के काम-धन्धे तुम्हारे लिए
खुले हैं। तुम इसी नौकरी को स्वीकार करो, इसके लिए तुम्हारे ऊपर किसी
प्रकार का दबाव तो नहीं डाला जा रहा है। अगर तुम अपनी योग्यता को इतना अधिक
समझते हो तो व्यावहारिक क्षेत्र में कोई स्वतन्त्र कार्य करके उसे प्रकट
करो।” अंग्रेज अफ़सर के यह व्यंगपूर्ण शब्द उसके कलेजे में चुभ गए, पर उस
समय अपनी परिस्थिति को समझकर वह चुप रह गया और उसने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी
कालेज में २५० रु० की नौकरी ही स्वीकार कर ली। पर साथ ही उसने यह भी
स्वीकार कर लिया कि, अवसर पाते ही मैं इनको कोई स्वतंत्र काम करके
दिखलाऊँगा।
इस महत्वपूर्ण संस्था के संस्थापक थे – आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय (१८६१ से १९४४) जो भारतवर्ष में रसायन-विज्ञान के सर्वप्रथम उच्च कोटि के ज्ञाता थे और उनकी योग्यता को अन्त में विदेशी सरकार ने भी स्वीकार करके "सर" की उपाधि प्रदान की थी। यद्यपि उनके पश्चात् और भी कई भारतीयों ने विज्ञान में उल्लेखनीय प्रसिद्धि प्राप्त की थी और उनके समकालीन श्री जे० सी० बोस ने भी ज्ञान-विज्ञान में बहुत अधिक नाम कमाया था, पर प्रफ़ुल्ल बाबू ने इतनी अधिक विद्या और पदवी पाकर, उसको जिस तरह लोक कल्याण के उद्देश्य से उत्सर्ग कर दिया, उसका दूसरा उदाहरण मिलना कठिन है।
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Friday, 4 November 2016
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
राजेन्द्र बाबू (सन् १८८४ से १९६३) का जन्म बिहार और जीरादेयी
गाँव में हुआ था। उनके पिता श्री महादेव सहाय एक सामान्य जमींदार थे, जो
अपनी सेवा और दयालुता के लिए आस-पास बहुत प्रसिद्ध थे। उनको आयुर्वेद तथा
यूनानी चिकित्सा का सामान्य ज्ञान था और वे बहुत तरह की दवाइयाँ बनाकर
लोगों को मुफ्त बाँटा करते थे। उस समय सब जगह सरकारी अस्पताल और औषधालय तो
थे नहीं, इसलिए बाबू महादेव सहाय के स्थान को ही अस्पताल मानकर रोगियों
कीभीड़ लगी रहती थी। उनकी पत्नी भी बड़ी दयावान और सहानुभूति रखने वाली थीं।
वह किसी के कष्ट, पीड़ा को नहीं देख सकती थीं। उनके पास लोग सदैव किसी न
किसी प्रकार की सहायता माँगने आते ही रहते थे।
राजेन्द्र बाबू और मजरुल हक दोनों उन महापुरुषों में से थे, जो जातीय द्वेष की क्षुद्र भावना से बहुत ऊपर रहते थे। भारत के गत ५० वर्षों के इतिहास को देखते हुए हम जानते हैं कि मुसलमानों में मजहबी पक्षपात दूसरी जातियों की अपेक्षा अधिक होता है तो भी व्यक्तिगत रूप से सज्जन पुरुष उनमें भी पाए जाते हैं। इस सम्बन्ध में हमको अपना दृष्टिकोण उदार और संतुलित ही रखना चाहिए।
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जीवट एवं संकल्पशक्ति के धनी पराक्रमी व्यक्तित्व
संसार में महापुरुष अनेक श्रेणियों के होते हैं। हमारे यहाँ के
सामान्य जन तो इतना ही समझते हैं कि लोग एकांत में रहकर तपस्या करते हैं,
कंदमूल, फल या दूध आदि पर निर्वाह करते है दाढ़ी और सर के बालों को बढ़ाए
रहते हैं, अवसर पड़ने पर किसी व्यक्ति को आशीर्वाद देकर उसका द़ुःख दूर कर
सकते हैं, वे ही महात्मा अथवा महापुरुष हैं ।। पर यह धारणा बड़ी संकुचित है
और वर्तमान परिस्थितियों में अपूर्ण भी है। इसमें संदेह नहीं कि किसी युग
में भारत के ऋषि- मुनि जिनमें से अनेक निश्चय ही महापुरुष थे, इसी प्रकार
रहते थे। वह समय ऐसा ही था जबकि देशकाल के अनुसार सभी लोग बहुत सीधा- सादा
और प्राकृतिक जीवन बिताते थे। उस समय समाज एवं व्यक्तियों की सेवा और भलाई
करने की इच्छा रखने वाले महापुरुषों को और भी सरल, अपरिग्रही व तपस्यामय
जीवन बिताना पड़ता था, क्योंकि इन्हीं साधनों से वे दूसरे लोगों का उपकार
करने में समर्थ होते थे।
पर अब समय बहुत अधिक बदल गया हैं। आवागमन, संसार में होने वाली घटनाओं की जानकारी, व्यापार- व्यवसाय, वैज्ञानिक आविष्कार आदि की अभूतपूर्व वृद्धि के कारण मनुष्यों का जीवन वैसा सीधा और स्वाभाविक रह सकना असंभव हो गया है, जैसा कि कुछ हजार वर्ष पहले था, पर इसका यह अर्थ नहीं कि आजकल महापुरुष नहीं होते अथवा वे पुराने समय वालों की अपेक्षा हीन हैं। उस समय जिस प्रकार जटाजूट रखकर लंगोटी से ही काम चला लेने वाले अधिकांश में इस श्रेणी में आते थे, उसी प्रकार आज कोट- पतलून, हैट- बूट धारण करने वाले और होटलों में रहकर डबल रोटी और चाय से पेट भरने वाले भी महापुरुष माने जाते हैं।
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गणेश शंकर विद्यार्थी
त्याग और बलिदान के
आराधक गणेश शंकर विद्यार्थी
सन १९१४- १५ की बात है कि पुलिस का एक बड़ा दल कानपुर के प्रताप प्रेस की तलाशी लेने आ धमका ।। बीसियों पुलिस के सिपाही शहर के कोतवाल खान बहादुर बाकरअली और इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, जो अंग्रेज था, सबने प्रेस को एकाएक घेर लिया और विद्यार्थी जी के कमरे में जा पहुँचे ।। उन दिनों प्रताप का कार्य धनाभाव से बड़ी गरीबी में चलाया जाता था ।। ऑफिस में केवल दो ही कुर्सी थी ।। एक पर संपादक विद्यार्थी जी और दूसरी पर मैनेजर शिवनारायण मिश्र बैठकर काम कर रहे थे ।। कोतवाल को अन्य सरकारी नौकरों की तरह ही अपने अंग्रेज अफसर की बड़ी फिकर थी ।। उनको खड़े देखकर कोतवाल साहब ने विद्यार्थी जी से कुर्सी देने को कहा पर वे तो सरकार के ही विरोधी थे उसके अफसरों की आवभगत वह भी पुलिसवालों की क्यों करने लगे ? इस पर कोतवाल ने विद्यार्थी जी को बदतमीज कह दिया ।। यह सुनते ही विद्यार्थी जी की त्यौरियाँ चढ़ गई और अपने को शहर का कर्ता- धर्ता समझने वाले कोतवाल को डाँटकर जोर से कहा बदतमीज तुम और होंगे तुम्हारे साहब ।। साहब हैं तो मैं क्या करूँ, क्या सिर पर चढ़ा लूँ ? वे पब्लिक सर्वेट हैं, तो उसी तरह रहें ।। आप इस प्रकार रौब किस पर झाड़ते हैं ?' इंस्पेक्टर जनरल इस निर्भीकता और खरी- खरी बातों से स्तंभित रह गये और स्वयं क्षमा माँगने लगे ।।
ऐसी ही दूसरी घटना १९२१ की है, जब विद्यार्थी जी को एक अभियोग में जेल भेजा गया ।। जेल के नियमानुसार जेलर उनको लेकर सुपरिटेंडेंट मेजर बकले के सामने गया।। उस समय वे कुर्सी पर बैठे कुछ कागजात देख रहे थे और असिस्टेंट जेलर आदि कई कर्मचारी उनके पास खड़े थे ।। विद्यार्थी जी देर होते देखकर वही पड़ी कुर्सी पर बैठ गये ।। जेलर ने यह देखा तो वह घबरा उठा ।।
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कर्मयोगी केशवानन्द
साधु- संन्यासियों के लिए आदर्श - कर्मयोगी केशवानंद
भारतवर्ष की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यहाँ के साधु- संन्यासी भी हैं ।। इसमें संदेह नहीं कि यह परंपरा अति प्राचीन काल से चली आई है, पर विभिन्न युगों में इसका इतना अधिक रूपांतर हुआ है कि आज के साधु- सन्यासियों को देखकर प्राचीन काल के साधुओं का किसी भी प्रकार अनुमान नहीं लगाया जा सकता ।। हमको भारतीय- साहित्य में वशिष्ठ, विश्वामित्र, व्यास, गौतम, कपिल, कणाद आदि ऋषियों का जो विवरण मिलता है उससे यह कभी प्रकट नहीं होता कि वे आजकल के साधुओं की तरह बिना कोई समाजोपयोगी कार्य किये दूसरों के परिश्रम की कमाई से पेट भरने वाले जीव थे ।। उनमें से शायद ही कोई गृहत्यागी था ।। वे सच्चे अर्थों में समाज और धर्म के संचालक थे और यदि दान ग्रहण भी करते थे, तो उसका उपयोग अधिकांश में विद्या- प्रचार समाजोत्रति की विविध प्रकार की प्रवृत्तियों में ही करते थे ।। यदि आजकल के अस्सी- नब्बे लाख सा नामधारी व्यक्ति उस परंपरा का कुछ अंशों में भी पालन करते ती आज भारतीय समाज और जाति की दशा वर्तमान से बहुत भिन्न और संतोषजनक हो सकती ।। पर इस समय हम साधुओं की जो गतिविधियाँ देख रहे हैं, उसका परिणाम विपरीत ही देखने में आ रहा है उससे समाज की किसी प्रकार की सेवा या उन्नति होने के बजाय, उसके पतन में ही सहायता मिलती दिखाई पड़ रही है ।।
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ऋषि टाल्सटाय
"एक समय था जब मैं खुले शब्दों में कह दिया करता था कि हमारा
ईसाई धर्म बिल्कुल झूठ है। किन्तु आगे चलकर इसमें परिवर्तन हो गया। तब मैने
संदेह करने में तो कमी कर दी, किन्तु मुझे इस बात का पक्का विश्वास हो
गया, जिस धर्म को हम मान रहे हैं, उसमें पूरी सच्चाई नहीं है। साधारण
मनुष्यों द्वारा माने जाने वाले धर्म में तो वास्तविकता थी, क्योंकि इसमें
लेशमात्र संदेह नहीं कि सच्चाई के बिना जीवित रहना असम्भव है। यह सच्चाई
मुझे मालूम थी और मैं उसी के अनुसार चलाता था। पर इस सच्चाई के साथ भी झूठ
मिला हुआ था। यह ठीक है कि साधारण लोगों के विचारों में पादरी लोगों
(पंडा-पुरोहित) की अपेक्षा अधिक सच्चाई थी, किन्तु वह असत्य से सर्वथा
मुक्त न थे।"
जब धर्म की नींव कमजोर पड़ जाती है और उसका सार-तत्व निकल जाता है, तो मनुष्य का चरित्र भी कायम नहीं रह सकता। ऐसा होने पर भी कुछ लोग तो "धर्म" का नाम लेते रहते हैं और थोड़ा-बहुत दिखावा भी कर देते हैं और कुछ लोग बड़ी शान के साथ अपने को ऐसी "बेवकूफ़ी" की बातों से अलग बतलाने लगते हैं और प्राय: धर्म का मज़ाक उड़ाया करते हैं। इन दोनों ही प्रकार के लोगों का चारित्रिक और नैतिक पतन अनिवार्य होता है। उनकी दृष्टि में खाना, कमाना, भोग करना ही मनुष्य-जीवन का सार रह जाता है और उसी की पूर्ति में वे सदा लगे रहते हैं। इस सम्बन्ध में टाल्सटाय के अनुभव वास्तव में बड़े करुणा-जनक और हृदय-द्रावक हैं। उनका वर्णन करने में उन्होंने जिस स्पष्टता और साहस का परिचय दिया है, वह अद्वितीय है। वे जन्म से ही एक बहुत प्रतिष्ठित और राजवंश से संबन्धित घराने से थे और बाद में भी अपने उद्योग तथा त्याग और तप से जगत्-पूज्य बन गये।. .
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