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Wednesday, 25 January 2017

मसाला वाटिका से घरेलू उपचार

• मसाला वाटिका से घरेलू उपचार
http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=546• राई
• हल्दी
• अदरक
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• मेथी
• जीरा
• मिर्च
• पुदीना
• पिप्पली
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• ग्वारपाठा (घृतकुमारी)
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• दालचीनी


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बिना औषधियों के कायाकल्प

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=544• पीछे की ओर लौटो
• उत्तम स्वास्थ्य के चार सूत्र
• कमजोरी और बीमारी का कारण
• कलपुर्जों की सफाई
• शरीर शुद्धि और कायाकल्प


















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प्रायोगिक वनौषधि-विज्ञान

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=871जिस भोगवादी युग में आज हम जी रहे हैं, मनुष्य का रोगी होना स्वाभाविक है ।। कभी व्यक्ति नैसर्गिक जीवन जीता था, प्रकृति के साहचर्य में परिश्रम से युक्त जीवनचर्या अपनाता था, रोगमुक्त जीवन एक सामान्य बात मानी जाती थी ।। रोजमर्रा की जिन्दगी में तब ऐसे तत्त्वों का समावेश था, जिनसे व्यक्ति के जीवन का उल्लास सहज ही अभिव्यक्त होता था ।। हमारी संस्कृति में प्रत्येक दिन एक पर्व- त्यौहार के रूप में माना जाता रहा है ।। इसी कारण आनंद हर क्षण झरता रहता था ।। यही कारण था कि मानव तनाव ग्रस्त भी नहीं होता था ।। आज की जीवन पद्धति दूषित, असांस्कृतिक कृत्रिम एवं यांत्रिकता से युक्त है ।। जीने की शैली आधुनिकता के साधनों के बाहुल्य के कारण कुछ ऐसी हो गयी है कि उसमें शरीर को श्रम अधिक नहीं करना पड़ता- मन कुछ जरूरत से ज्यादा ही तनाव से युक्त रहता है एवं यह एक वास्तविकता है कि बहुत से व्यक्ति जीवन जीने की कला से परिचित नहीं हैं ।। यही कारण है कि ये अनगढ़ की तरह जीवन जीते देखे जाते हैं एवं अकारण रोगों के शिकार हो संश्लेषित पद्धति पर आधारित आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के शिकार हो कर धन तो गँवाते ही हैं, साथ ही स्वास्थ्य जैसी अमूल्य निधि भी गँवा बैठते हैं ।।

परम पूज्य गुरुदेव ने " आयुर्वेद " को अपने मूल रूप में पुनर्जीवित कर इसे सार्वजनीन - सर्वसुलभ बनाया है ।। आयुर्वेद आयुष्य को नीरोग रूप में दीर्घ बनाए रखने का विज्ञान है।। यह आहार- विहार के नियमों- उपनियमों से लेकर अपनी प्राकृतिक रूप में पायी जाने वाली वनौषधियों द्वारा रोगों के मूल तक पहुँचकर उनकी चिकित्सा करना सिखाता है ।। 

 

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जडी़-बूटियों की व्यवसायिक खेती

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=882युग निर्माण अभियान के जनक वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने किसी संदर्भ में कहा था- “जड़ी-बूटियाँ देश को स्वास्थ्य और सम्पन्नता दोनों दे सकती हैं ।“ उस समय उनके कथन की गहराई भले ही समझ में न आयी हो, वर्तमान परिस्थितियों की समीक्षा करने से यह बात बहुत स्पष्ट रूप से समझ में आने लगी है ।

जैसे-

1.लगता है प्रकृति ने जड़ी-बूटियों के गुणों को नये सिरे से उकेरना-उभारना शुरू कर दिया है । एलोपैथी जैसी स्थापित उपचार पद्धतियों के मुकाबले भी जड़ी-बूटी चिकित्सा अपना महत्त्व स्थापित करती जा रही है ।

2.जन सामान्य से लेकर प्रबुद्धों और सम्पन्नों में जड़ीबूटी आधारित उत्पादों के प्रति अभिरुचि बढ़ रही है । विशेषज्ञ और चिकित्सक वर्ग भी अनेकों शोध-प्रयोग करके जड़ी-बूटी आधारित नये-नये उत्पाद उपलब्ध करा रहा है ।

3.जडी़-बूटियों की बढ़ती निर्विवाद उपयोगिता के कारण उनकी कीमतें राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में काफी ऊँची हो गयी है । 

 

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जडी-बूटियो द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=529जड़ी- बूटी चिकित्सा

युग की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता

आज सभ्यता की घुड़दौड़- आपाधापी ने मनुष्य को स्वास्थ्य के विषय में इस सीमा तक परावलंबी बना दिया है कि वह प्राकृतिक जीवनक्रम ही भुला बैठा है ।। फलत: आए दिन रोग- शोकों के विग्रह खड़े होते रहते हैं व छोटी- छोटी व्याधियों के नाम पर अनाप- शनाप धन नष्ट होता रहता है ।। मनुष्य अंदर से खोखला होता चला जा रहा है ।। जीवनीशक्ति का चारों ओर अभाव नजर आता है ।। मौसम में आए दिन होते रहने वाले परिवर्तन उसे व्याधिग्रस्त कर देते हैं, जबकि यही मनुष्य २५ वर्ष पूर्व तक इन्हीं का सामना भलीभाति कर लेता था ।। आज शताधिकों की संख्या उंगलियों पर गिनने योग्य है ।। जबकि हमारे पूर्वज कई वर्षो तक जीवित रहते थे, उनके पराक्रमों की गाथाएँ सुनकर हम आश्चर्यचकित रह जाते हैं ।।

आहार- विहार में समाविष्ट कृत्रिमता ने जिस प्रकार जिस सीमा तक शरीर के अंग- अवयवों को अपंग- असमर्थ बनाया, उसी प्रकार चिकित्सा क्रम भी बनते चले गए ।। पूर्वकाल में आयुर्वेद ही स्वास्थ्य संरक्षण का एकमात्र माध्यम था ।। धीरे- धीरे वृहत्तर भारत में समाविष्ट अन्य संस्कृतियों के साथ यहाँ अन्य पैथियां भी आई और आज चिकित्सा के नाम पर ढेरों पद्धतियाँ प्रयुक्त होती हैं ।। 

 

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Monday, 23 January 2017

जडी बूटी चिकित्सा एक संदर्शिका

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=530प्रकृति ने मनुष्य के लिए हर वस्तु उत्पन्न की है । औषधि उपचार के लिए जड़ी-बूटियों भी प्रदान की हैं । इस आधार पर चिकित्सा को सर्वसुलभ, प्रतिक्रियाहीन तथा सस्ता बनाया जा सकता है । जड़ी-बूटी चिकित्सा बदनाम इसलिए हुई कि उसकी पहचान भुला दी गई-विज्ञान झुठला दिया गया । सही जड़ी-बूटी उपयुक्त क्षेत्र से, उपयुक्त मौसम में एकत्र की जाए उसे सही ढंग सें रखा और प्रयुक्त किया जाए तो, आज भी उनका चमत्कारी प्रभाव देखा जा सकता है ।

युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य के आशीर्वाद से, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान ने इस दिशा में सफल शोध-प्रयोग किए हैं । गिनी-चुनी जड़ी-बूटियों से लगभग ८० प्रतिशत रोगों का उपचार सहज ही किया जा सकता है । ऐसी सरल, सुगम, सस्ती परंतु प्रभावशाली चिकित्सा-पद्धति जन-जन तक पहुँचाने के लिए यह पुस्तक प्रकाशित की गई है । जड़ी-बूटियों की पहचान, गुण, उपयोग- विधि सभी स्पष्ट रूप से समझाने का प्रयास किया गया है ।

इस पुस्तक में ऐसी जडी़-बूटियों को प्राथमिकता दी गई है, जो भारत में अधिकांश क्षेत्रों में पाई जाती हैं अथवा उगाई जा सकती हैं । आचार्यवर की इच्छा है कि यह विधा विकसित हो और रोग निवारण के साथ-साथ जन-जन को प्राण शक्ति संवर्द्धन का लाभ भी प्राप्त हो । ऋषियों द्वारा विकसित इस विधा का लाभ पुन: जन-जन को मिले । 

 

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आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

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जीवन रोगों के भार और मार से बुरी तरह टूट गया है ।। जब तन के साथ मन भी रोगी हो गया हो, तो इन दोनों के योगफल के रूप में जीवन का यह बुरा हाल भला क्यों न होगा ? ऐसा नहीं है कि चिकित्सा की कोशिशें नहीं हो रही ।। चिकित्सा तंत्र का विस्तार भी बहुत है और चिकित्सकों की भीड़ भी भारी है ।। पर समझ सही नहीं है ।। जो तन को समझते हैं, वे मन के दर्द को दरकिनार करते हैं ।। और जो मन की बात सुनते हैं, उन्हें तन की पीड़ा समझ नहीं आती ।। चिकित्सकों के इसी द्वन्द्व के कारण तन और मन को जोड़ने वाली प्राणों की डोर कमजोर पड़ गयी है ।।

पीड़ा बढ़ती जा रही है, पर कारगर दवा नहीं जुट रही ।। जो दवा ढूँढी जाती है, वही नया दर्द बढ़ा देती है ।। प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में से प्राय: हर एक का यही हाल है ।। यही वजह है कि चिकित्सा की वैकल्पिक विधियों की ओर सभी का ध्यान गया है ।। लेकिन एक बात जिसे चिकित्सा विशेषज्ञों को समझना चाहिए उसे नहीं समझा गया ।। समझदारों की यही नासमझी सारी आफतो- मुसीबतों की जड़ है ।। यह नासमझी की बात सिर्फ इतनी है कि जब तक जिन्दगी को सही तरह से नहीं समझा जाता, तब तक उसकी सम्पूर्ण चिकित्सा भी नहीं की जा सकती ।। 


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स्वस्थ रहना है तो ये खाइए!

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=94हमारे जीवन का आधार जिन बातों पर है, उनमें आहार का स्थान प्रमुख है ।। वैसे हम वायु के बिना पाँच मिनट भी नहीं जी सकते; जल के बिना भी दो- चार दिन तक जीवन धारण कर सकना कठिन हो जाता है, तो भी इनकी प्राप्ति में विशेष प्रयत्न की आवश्यकता न होने से उनके महत्त्व की तरफ हमारा ध्यान प्राय: नहीं जाता ।। पर आहार की स्थिति इससे भिन्न है  ।। यदि यह कहें कि अनेक मनुष्यों का जीवनोद्देश्य केवल आहार प्राप्त करना ही होता है और उनकी समस्त गतिविधियाँ केवल भोजन की व्यवस्था पर ही केंद्रित रहती हैं, तो इसमें कुछ भी गलती नहीं ।। सामान्य मनुष्य के लिए संसार में सबसे प्रथम और सबसे बड़ी आवश्यकता आहार की ही जान पड़ती है और महान से महान व्यक्ति को भी उसकी तरफ कुछ ध्यान देना ही पड़ता है ।। इस प्रकार आहार समस्या से हमारा संबंध बड़ा घनिष्ठ है ।। पर ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय में भी सर्वसाधारण की जानकारी अत्यंत कम है ।। लोग अपनी रुचि का भोजन पा जाने से संतुष्ट हो जाते हैं अथवा परिस्थितिवश जो कुछ खाद्य पदार्थ मिल जाए उसी से काम चलाने का प्रयत्न करते हैं ।। पर वह भोजन हमारे लिए वास्तव में कितना अनुकूल और उपयोगी है? उससे जीवन- तत्त्वों की कहाँ तक उपलब्धि हो सकती है? हमारे देह और मन के विकास के लिए वह कितना लाभदायक है? 

 

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स्वस्थ और सुंदर बनने की विद्या

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=139यह अच्छी तरह अनुभव कर लिया गया है कि खिलखिलाकर हँसने से अच्छी भूख लगती है, पाचनशक्ति बढ़ती है और रक्त का संचार ठीक गति से होता है ।। क्षय जैसे भयंकर रोगों में हँसना अमृत- तुल्य गुणकारी सिद्ध हुआ है ।। खिल- खिलाकर हँसने से मुँह, गरदन, छाती और उदर के बहुत उपयोगी स्नायुओं को आवश्यकीय कसरत करनी पड़ती है, जिससे वे प्रफुल्लित और दृढ़ बनते हैं ।। इसी तरह मांसपेशियों, ज्ञानतंतुओं और दूसरी आवश्यक नाड़ियों को हँसने से बहुत दृढ़ता मिलती है ।। हँसने का मुँह, गाल और जबड़े पर बड़ा अच्छा असर पड़ता है ।। मुँह की मांसपेशियों और नसों का यह सबसे अच्छा व्यायाम है ।। जिन्हें हँसने की आदत होती है, उनके गाल सुंदर, गोल और चमकीले रहते हैं ।। फेफड़ों के छोटे- छोटे भागों में अकसर पुरानी हवा भरी रहती है, आराम की साँस लेने से बहुत- थोड़ी वायु फेफड़ों में जाती है और प्रमुख भागों में ही हवा का आदान- प्रदान होता है, शेष भाग यों ही सुस्त और निकम्मा पड़ा रहता है, जिससे फेफड़े संबंधी कई रोग होने की आशंका रहती है, किंतु जिस समय मनुष्य खिल- खिलाकर हँसता है, उस समय फेफड़ों में भरी हुई पहले की हवा पूरी तरह बाहर निकल जाती है और उसके स्थान पर नई हवा पहुँचती है ।। मुँह की रसवाहिनी गिलटियाँ हँसने से चैतन्य होकर पूरी मात्रा में लार बहाने लगती हैं।। पाठक यह जानते ही होंगे कि भोजन में पूरी मात्रा में लार मिल जाने पर उसका पचना कितना आसान होता है? जो आदमी स्वस्थ रहना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि हँसने की आदत डालें । 

 

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दीर्घ जीवन की प्राप्ति

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=131प्रगति करें, समृद्धि प्राप्त करें किंतु मानसिक शांति, प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता गँवाकर, इसे कैसे बुद्धिमत्ता प्रगतिशीलता कहा जाएगा? साधनों को अत्यधिक महत्त्व देकर साध्य को भुला दिया जाए यह दृष्टिकोण विवेकयुक्त नहीं कहा जा सकता। मन की सुख- शांति प्रगति का वास्तविक लक्ष्य है । यह न पूरा हुआ तो समृद्धि का प्रयोजन क्या रहा? निस्संदेह इसे एक दिशाविहीन अंधी दौड़ कहना ही अधिक उपयुक्त होगा।

इन दिनों वैज्ञानिक एवं आर्थिक क्षेत्रों की प्रगति पर सभी का ध्यान है और उनमें उत्साहवर्द्धक प्रगति भी हो रही है । सभ्यता की भी बहुत चर्चा है । जीवन स्तर बढ़ रहा है । इस बढ़ोत्तरी का तात्पर्य है अधिक सज- धज और सुख- सुविधा के साधनों का विस्तार । विलासी साधनों के नए- नए उपकरण बनते और बढ़ते जा रहे हैं ।

इस प्रगतिशीलता के साथ जुड़ा हुआ एक दु:खदायी पक्ष भी है, जिसे आधि-व्याधियों की अभिवृद्धि कहा जा सकता है। लोग शारीरिक दृष्टि से अस्वस्थ और मानसिक दृष्टि से असंतुलित होते चले जा रहे है और इस दिशा मे प्रगति उन सब क्षेत्रों की तुलना मे कहीं अधिक द्रुतगति से हो रही है, जिन्है अपने समय की सफलताएँ कहकर गर्व किया जाता है। 

 

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श्वास-प्रश्वास-विज्ञान

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=134श्वास सही तरीके से लीजिए

हमारा शरीर पंचतत्त्वों से मिलकर बना है ।। साधारण दृष्टि से देखने पर मिट्टी, जल, वायु आदि तत्त्व सर्वथा जड़ पदार्थ प्रतीत होते हैं, पर इन्हीं के विधिपूर्वक मिला दिए जाने से मानव देह जैसे अद्भुत क्रियाशील और क्षमतायुक्त यंत्र का निर्माण हो जाता है ।। सामान्य रीति से देखने पर हमें लाखों मन मिट्टी के ढेर चारों तरफ पड़े दिखलाई देते हैं, जल की अनंत राशि भी कुएँ तालाब, नदी, समुद्र आदि में भरी हुई है ।। वायु रात- दिन हमारे इर्द- गिर्द छोटे से छोटे स्थान में भी व्याप्त रहती ही है ।। बाह्य रूप में हमको इनमें कोई ऐसी विशेषता या शक्ति नहीं दिखलाई पड़ती कि जिससे यह अनुमान किया जा सके कि हमारा यह महान शक्तियों से संपन्न अस्थि, मांस, रक्त, नाडियाँं, स्नायु पाचनसंस्थान, श्वास यंत्र, मस्तिष्क आदि से युक्त शरीर इन तुच्छ- सा मालूम देने वाले पदार्थों के संयोग से निर्मित हुआ होगा ।। पर वास्तविकता यही है कि मानव शरीर ही नहीं, हाथी जैसे विशाल प्राणी से लेकर चींटी तक की देह की रचना पंचतत्त्वों के संयोग से ही हुई है और जब तक वह जीवित रहते हैं तब तक इन्हीं तत्त्वों से पोषण और शक्ति प्राप्त होती रहती है ।। 

 

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स्वस्थ रहने की कला

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=91मनुष्य की काय संरचना ऐसी है, जिसे यदि तोड़ा-मरोड़ा न जाए, सहज गति से चलने दिया जाए तो वह लंबे समय तक बिना लड़खड़ाए कारगर बनी रह सकती है ।आरोग्य स्वाभाविक है और रोग प्रयत्न पूर्वक आमंत्रित । सृष्टि के सभी प्राणी अपनी सहज आयु का उपभोग करते हैं । मरण तो सभी का निश्चित है, पर वह जीर्णता के चरम बिंदु पर पहुँचनेके उपरांत ही होता है । मात्र दुर्घटनाएँ ही कभी-कभी उसमें व्यवधान उत्पन्न करती हैं । रुग्णता का अस्तित्व उन प्राणियोंमें दृष्टिगोचर नहीं होता, जो प्रकृति की प्रेरणा अपनाकर सहज सरल जीवन जीते हैं । मनुष्य ही इसका अपवाद है । इसी जीवधारी को आए दिन बीमारियों का सामना करना पड़ताहै । बेमौत मरते भी वही देखा जाता है । दुर्बलता, रुग्णता और असामयिक मृत्यु कोई दैवी विपत्तिनहीं है । मनुष्य द्वारा अपनाई गई रहन-सहन संबंधी प्रतिक्रिया मात्र है । आहार-विहार में संयम बरता जा सके और मस्तिष्कको अनावश्यक उत्तेजनाओं से बचाए रखा जा सके, तो लंबी अवधि तक सुखपूर्वक निरोगी जीवन जिया जा सकता है ।आरोग्य की उपलब्धि के लिए बहुमूल्य टॉनिकों या औषध-रसायनों को खोजने की तनिक भी आवश्यकता नहींहै । जो उपलब्ध है उसे बरबाद न करने की सावधानी भरबरती जाए, तो न बीमार पड़ना पड़े, न दुर्बल रहना पड़े औरन असमय बेमौत मरने की आवश्यकता पड़े । चिकित्सकों का द्वार खटखटाने की अपेक्षा आरोग्यार्थी यदि रहन-सहन में सम्मिलित कुचेष्टाओं को निरस्त कर सकें, तो यह उपाय उनकी मनोकामना सहज ही पूरी कर सकता है । 

 

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सूर्य चिकित्सा विज्ञान

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=252इस पुस्तक में सूर्य- किरणों की महत्ता बताई है और सूर्य- सेवन से स्वस्थ रहने पर जोर दिया गया है। साथ ही क्रोमोपैथिक साइंस के आधार पर रंगीन कांचों की सहायता से किरणों में से आवश्यक रंगों का प्रभाव लेकर उनके द्वारा रोग निवारण की विधि बताई गई है। इस चिकित्सा विधि से योरोप तथा अमेरिका में विगत ५० वर्षों से चिकित्सा हो रही है। वहाँ इस चिकित्सा विज्ञान में असाधारण सफलता प्राप्त हुई है। अब इसका प्रचार भारतवर्ष में भी हुआ है। जहँ- जहाँ इस पद्धति के अनुसार चिकित्सा की गई है। आशाजनक लाभ हुआ है।

सूर्यआत्मा जगस्तस्थुषश्च ।। यजु०७/४२

सूर्य संसार की आत्मा है। संसार का संपूर्ण भौतिक विकास सूर्य की सत्ता पर निर्भर है। सूर्य की शक्ति के बिना पौधे उग नहीं सकते, अण्डे नहीं बढ़ सकते, वायु का शोधन नहीं हो सकता, जल की उपलब्धि नहीं हो सकती अर्थात कुछ भी नहीं हो सकता। सूर्य की शक्ति के बिना हमारा जन्म होना तो दूर, इस पृथ्वी का जन्म भी न हुआ होता।

स्वस्थ जीवन बिताने के लिए सूर्य की सहायता लेने की हमें बड़ी आवश्यकता है। इस महत्व को समझ कर हमारे प्राचीन आचार्यों ने सूर्य प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, सूर्य उपासना, सूर्य योग, सूर्य चक्रवेधन, सूर्य यज्ञ आदि अनेक क्रियाओं को धार्मिक स्थान दिया था। डा० सोले कहते हैं कि सूर्य में जितनी रोग नाशक शक्ति मौजूद है, उतनी संसार की किसी वस्तु में नहीं है। कैन्सर,नासूर और भगन्दर जैसे दुस्साध्य रोग जो बिजली और रेडियम के प्रयोग से भी ठीक नहीं किए जा सकते थे, वे सूर्य किरणों का प्रयोग करने से अच्छे हो गए। तपेदिक के डाक्टर हरनिच का कथन है कि पिछले तीस वर्षों में मैने करीब- करीब सभी प्रसिद्ध औषधियों को अपने चिकित्सालय में आए हुए प्राय: २२ हज़ार रोगियों पर अजमा डाला, पर मुझे उनमें से किसी पर भी पूर्ण संतोष न हुआ। 

 

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रोग - औषधि आहार- विहार एवं उपवास

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=140प्राकृतिक आहार- विहार के नियमों का पालन ठीक प्रकार किया जाए तो शरीर को निरोग एवं स्वस्थ बनाए रखा जा सकता है ।। आरोग्य को डगमगाने वाली छोटी- मोटी विकृतियों आती भी हैं तो भी शरीर के विभिन्न तंत्र उनके निष्कासन में समर्थ होते हैं ।। कभी- कभी तो वातावरण में हुए हेर- फेर से शरीर संस्थान में भी शोधन एवं बदली हुई परिस्थितियों से सामंजस्य का क्रम चलता है ।। ऐसे अवसरों पर उभरी हर छोटी- मोटी बीमारी के लिए एलोपैथिक दवाओं की शरण में जाना स्वास्थ्य के लिए अहितकर होता है ।। प्रकट हुए रोग दवाओं के सेवन से दब तो जाते हैं किंतु दूसरे नए प्रकार के रोग प्रतिक्रियास्वरूप परिलक्षित होने लगते हैं ।।

न्यूजीलैंड के एक प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक उलरिक विलियम ने लिखा है- आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और कुछ नहीं, केवल नई बीमारी को पुरानी में बदल देने का, एक को दूसरी में परिणत कर देने का गोरखधंधा है ।। नासमझी के कारण भोले लोग इस जाल में फँस जाते हैं और क्षणिक लाभ का चमत्कार पाने के लालच में चिरस्थायी बीमारियों के शिकार बन जाते हैं ।। 

 

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Sunday, 22 January 2017

निदान चिकित्सा

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=136योग्य द्रव्यों और योग्य क्रमों को अपनाकर चिकित्सा देने पर रोगी रोगमुक्त हो स्वस्थ हो जाता है, अर्थात् चिकित्सा का उद्देश्य पूर्ण हो पाता है ।

चिकित्सक को निदान शास्त्र एवं चिकित्सा विज्ञान का आयुर्वेद परख ज्ञान हो तो आयुर्वेदिक चिकित्सा देने में सरलता हो जाती है । इस उद्देश्य की आंशिक पूर्ति हो सके इस हेतु से, उपर्युक्त सूत्रों को ध्यान में रखते हुए, प्रस्तुत पुस्तक में शरीरस्थं विविध संस्थानों की रचना, क्रिया तथा तज्जन्य मुख्य रोगों का परिचय देते हुए, उनकी चिकित्सा का समयानुरूप संक्षिप्त विवरण देने का प्रयास किया गया है ।

निदान से चिकित्सा के शिखर तक पहुँचाने में यह पुस्तक प्रथम सोपान का काम कर सकेगी, जिससे आगे बढ़ते हुए, भविष्य में चिकित्सा का अंतिम लक्ष्य प्राप्त करने में जिज्ञासु सफल हो सकें ।

इसी आशा और विश्वास से इसका अनुशीलन करने वाले अवश्य लाभान्वित होंगे । योग्य परामर्श की अपेक्षा रखते हुए उन सभी लेखकों का हृदय से आभारी हूँ जिनकी पुस्तकों या लेखों से इन पुस्तक के लेखन कार्य में सहयोग प्राप्त हुआ है ।

 

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तुलसी के चमत्कारी गुण

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=92जब से संसार में सभ्यता का उदय हुआ है, मनुष्य रोग और औषधि इन दोनों शब्दों को सुनते आए हैं । जब हम किसी शारीरिक कष्ट का अनुभव करते हैं तभी हम को औषधि की याद आ जातीहै, पर आजकल औषधि को हम जिस प्रकार टेबलेट , मिक्चर , इंजेक्शन , कैप्सूल आदि नए-नए रूपों में देखते हैं, वैसी बातपुराने समय में न थी । उस समय सामान्य वनस्पतियाँ और कुछ जड़ी-बूटियाँ ही स्वाभाविक रूप में औषधि का काम देती थीं औरउन्हीं से बड़े-बड़े रोग शीघ्र निर्मूल हो जाते थे, तुलसी भी उसी प्रकार की औषधियों में से एक थी ।

जब तुलसी के निरंतर प्रयोग से ऋषियों ने यह अनुभव किया कि यह वनस्पति एक नहीं सैकड़ों छोटे -बड़े रोगों मेंलाभ पहुँचाती है और इसके द्वारा आस पास का वातावरण भी शुद्ध और स्वास्थ्यप्रद रहता है तो उन्होंने विभिन्न प्रकार से इसके प्रचारका प्रयत्न किया। उन्होंने प्रत्येक घर में तुलसी का कम से कमएक पौधा लगाना और अच्छी तरह से देखभाल करते रहना धर्म कर्त्तव्य बतलाया । खास-खास धार्मिक स्थानों पर तुलसी कानन बनाने की भी उन्होंने सलाह दी, जिसका प्रभाव दूर तक के वातावरण पर पड़े ।

धीरे- धीरे तुलसी के स्वास्थ्य प्रदायक गुणों और सात्विक प्रभाव के कारण उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि लोग उसेभक्ति भाव की दृष्टि से देखने लगे, उसे पूज्य माना जाने लगा । 

 

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Old And New Herbal Remedies

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=323Yoga and Herbal Therapy have become subject matters of common curiosity and pursuit for those caring for sustenance of good health by inexpensive and natural means and also for those who have suffered side-effects of antibiotics or in general, the lacunae of modern science of medicine. While a lot of training courses and dedicated schools on yoga are helping people across the globe, the scientific testing and implementation of herbal therapies are still confined to research labs and few pharmaceutical companies. Ayurveda is known to be the origin of herbal therapeutic science. Most importantly, the fact that its prescription is risk-free and does not generate any negative or suppressive effects on other kinds of medicaments or modes of treatments that might be used simultaneously makes it an excellent complementary mode of healing.

More and more people are getting interested these days in knowing about easy but effective modes of herbal remedies these days. Our major objective in presenting this new book on herbal remedies is to provide useful, authentic and innovative information in this direction. The main focus is laid on the use of Himalayan herbal medicines based on first of its land research carried out at the Brahmvarchas Research Center, Shantikunj, Hardwar (India). Thousands of people have been benefited from this therapy and got rid of diseases of different types and severity. Rare knowledge from the scriptures will be presented here. 

 

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Friday, 20 January 2017

स्वस्थ रहने के सरल उपाय

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=132हम खाना क्यों खाते है?

जब से हम जन्म लेते हैं शरीर को शक्ति की आवश्यकता होती है ।। शक्ति के दो प्रमुख स्रोत हैं- १ .नींद २. भोजन

 नींद तो अनिवार्यत: सब को लेनी ही पड़ती है ।। एक दो दिन भी कम हो गई तो शरीर हाथ के हाथ उसको पूरा करने को मजबुर होता है ।।

भोजन हम दो कारणों से करते हैं- १. शक्ति के लिये २. स्वाद के लिये

आरम्भ से ही शक्ति और स्वाद में कुश्ती चलती है और देखा यह गया है कि इस कुश्ती में स्वाद जीतता है और शक्ति पीछे रह जाती है ।। कई चीजें तो हम -केवल इसीलिये खा- पी लेते हैं कि वे स्वादिष्ट लगती हैं चाहे उनमें शक्ति है या नहीं या चाहे वे अंतत: नुकसान ही करें ।

कहने को तो कहते हैं कि ' हम जीने के लिये खाते हैं ' पर वस्तुत: यह पाया जाता है कि ' हम खाने के लिये जीते हैं '।

हम खाना पका कर क्यों खाते हैं?

यों तो हम कहते हैं कि खाने की वस्तुओं में कई कीड़े इत्यादि रहने हैं अत: हम पकाकर खाते हैं, पर मुख्यत: स्वाद के लिए ही पकाकर खाते हैं ।। यद्यपि हम जानते हैं कि पकाने से भोजन की पौष्टिकता निश्चित रूप से कम हो जाती है, फिर भी स्वाद व सुविधा के लिए हम पका कर ही खाना खाते हैं ।। 

 

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सम्रग स्वास्थ्य संवर्द्धन कैसे ?


http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=88अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं ।। संसार के सारे कार्य स्वास्थ्य पर निर्भर हैं ।। जिस काम के करने में किसी प्रकार की तकलीफ न हो, श्रम से जी न उकताए, मन में काम करने के प्रति उत्साह बना रहे और मन प्रसन्न रहे और मुख पर आशा की झलक हो, यही शरीर के स्वाभाविक स्वास्थ्य की पहचान है ।। स्वाभाविक दशा में बिना किसी प्रकार की कठिनाई के साँस ले सके, आँख की ज्योति और श्रवण शक्ति ठीक हो, फेफड़े ठीक- ठीक आँक्सीजन को लेकर कार्बन डाइआक्साइड को बाहर निकालते हों, आदमी के सभी निकास के मार्ग- त्वचा, गुदा, फेफड़े ठीक अपने कार्य को करते हों, वह व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ है ।। हम सभी लोग जानते हैं कि ऐसा आदमी ही बीमार पड़ता है जिसका जीवन नियमित नहीं है और प्रकृति के साथ पूरा- पूरा सहयोग नहीं कर रहा है ।। हमारा सदा सहायक सेवक शरीर है ।। ये चौबीस घंटे सोते- जागते हमारे लिए काम करता है ।। वफादार सेवक को समर्थ निरोग एवं दीर्घजीवी बनाए रखना प्रत्येक विचारशील का कर्त्तव्य है ।। केवल स्वस्थ व्यक्ति ही धनोपार्जन, सामाजिक, नैतिक, वैयक्तिक सब कर्त्तव्यों का पालन कर सकता है ।। जिसका स्वास्थ्य अच्छा है उसमें प्राण शक्ति अधिक होती है जिसके कारण सुख- शांति का अक्षय भंडार उसे प्राप्त होता है ।। स्वास्थ्य लाभ के लिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना आवश्यक होता है ।। आदतों और दिनचर्या का स्वास्थ्य से घनिष्ठ संबंध है ।।


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यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया- 26

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=264यज्ञ- प्रक्रिया को अपने संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में प्रतिपादित कर वाड्मय के इस खण्ड में परमपूज्य गुरुदेव ने बड़े विस्तार से यज्ञोपचार की प्रक्रिया की व्याख्या की है ।। यज्ञ एक सर्वांगपूर्ण उपचार पद्धति है- पर्यावरण संशोधन के लिए, सूक्ष्म जगत में संव्याप्त प्रदूषण मिटाने के लिए तथा मानव की स्थूल- सूक्ष्म हर स्तर पर चिकित्सा करने के लिए ।। सविता देवता की उपासना गायत्री महामंत्र का प्राण है एवं उसी सविता को समर्पित आहुतियाँ किस प्रकार अपनी मंत्र शक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा के समन्वित स्वरूप के माध्यम से होता को लाभ पहुँचाती है, यही यज्ञोपचार प्रक्रिया है ।। आत्मसत्ता पर छाये कषाय- कल्मषों की सफाई से लेकर- गुणसूत्रों, क्रोमोसोम्स जीन्स तक पर यज्ञ प्रक्रिया प्रभाव डालती है एवं इसमें किस प्रकार यज्ञ कुण्ड एक यंत्र की भूमिका निभाकर वृहत सोम के अवतरण द्वारा सोम की- पर्जन्य की वर्षा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, इसका वैज्ञानिक आधार क्या है, ज्यामिती किस प्रकार यज्ञधूम्रों की बहुलीकरण प्रक्रिया को प्रभावित करती है, यह सारा प्रतिपादन इस खण्ड में हुआ है ।।

यज्ञाग्नि व सामान्य अग्नि में अन्तर है ।। परमपूज्य गुरुदेव ने "यज्ञोपैथी" के नाम से एक नूतन चिकित्सा पद्धति जो भविष्य की उपचार पद्धति बनने जा रही है, को जन्म देकर वस्तुत: वैदिक विज्ञान के मूल आधार को पुनर्जीवित किया है ।। यज्ञों से रोग निवारण में समिधाओं, शाकल्य तथा मंत्रों का चयन कैसे किया जाता है, यह पूरी प्रक्रिया अपने में एक समग्र विज्ञान है ।। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि पृथ्वी तत्त्व का पंचभूतों से बनी इस काया में प्राधान्य है तथा पृथ्वी सदा वायु से गंधों का शोषण करती रहती है ।। 

 

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