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Tuesday, 2 May 2017

हम बदलें तो युग बदले

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आज युग-परिवर्तन की चर्चा प्राय: सर्वत्र सुनने में आती है । संसार की राजनैतिक और आर्थिक स्थिति में बहुत अधिक अंतर पड़ जाने से उसका प्रभाव सामाजिक और धार्मिक परंपराओं पर भी दिखलाई दे रहा है । पर ये दोनों ही क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें मनुष्य जल्दी से बदलाव करने को तैयार नहीं होता । खासकर हमारे देश में तो सामान्य सामाजिक प्रथाओं को भी धर्म का अंग मान लिया जाता है, जिसका परिणाम यह होता है कि प्रत्यक्ष में हानिकारक परपराओं को त्यागने या बदलने में लोग आनाकानी करने लगते हैं । वे यह नहीं समझते कि सामाजिक प्रथाएँ मुख्यत: देश-काल पर आधारित होती हैं । उनके लिए यह हठ करना कि वे पूर्व समय से चली आयी हैं और आगे भी ज्यों की त्यों चलती रहनी चाहिए, नासमझी का परिचय देना है ।


इस पुस्तक में बतलाया गया है कि आज सामयिक परिस्थितियों के कारण युग-परिवर्तन की जो विचारधारा जोर पकड़ रही है, उसको देखते हुए हमको अपनी सामाजिक प्रथाओं की अच्छी तरह जाँच करके, उनमें समयानुकूल परिवर्तन करने चाहिए । विशेष रूप से हमारे यहाँ की विवाह और मरणोपरांत की प्रथाएँ इतनी लंबी-चौड़ी और खर्चीली बना दी गई है कि अधिकांश लोगों को वे असह्य भार स्वरूप अनुभव होती हैं, पर जातीय बंधनों के कारण लोग रोते-झींकते, मरते-जीते उनको आगे ढकलते जा रहे है । यह स्थिति शीघ्र से शीघ्र बदलनी चाहिए । तभी हम सुख-शांति के दर्शन कर सकेंगे ।

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संस्कृति की सीता की वापसी


http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=748मित्रो ! संस्कृति की सीता का रावण ने अपहरण कर लिया था, तब भगवान् रामचन्द्र जी राक्षसों समेत रावण को मारकर सीता को वापस लाने में सफल हुए थे। इतिहास की वह पुनरावृत्ति फिर से होनी है। मध्यकाल में हमारी संस्कृति की सीता को वनवास हो गया। साम्प्रदायिकता इस कदर फैली, मत- मतान्तर इस कदर फैले, बाबाजियों ने अपने- अपने नाम के इतने मजहब इस कदर खड़े कर लिए कि हिन्दू समाज का एक रूप ही नहीं रहा। संस्कृति के साथ में अनाचार शामिल हो गया। बुद्ध के जमाने में ऐसा भयंकर समय था कि हमारी संस्कृति उपहास का कारण बन गयी थी। घिनौने उद्देश्यों को संस्कृति के साथ में शामिल कर दिया गया था। पाँच काम बड़े घिनौने माने जाते हैं और इन पाँचों कामों को भी धर्म के साथ जोड़ दिया गया था और संस्कृति को कलंकित कर दिया गया था। ये पाँचों हैं—‘‘मद्यं मांसं तथा मत्स्यो मुद्रा मैथुनमेव च। पञ्चतत्त्वमिदं देवि! निर्वाण मुक्ति हेतवे ॥ ’’ ये पाँचों घिनौने काम संस्कृति के साथ शामिल हो गये।

और मित्रो ! यज्ञ का रूप कैसा घिनौना हो गया था? आपको मालूम नहीं है, तब मनुष्यों को मारकर होम दिया जाता था घोड़ों और गौवों तक को होम दिया जाता था। वह क्या था? वह संस्कृति का वनवास काल था और अब क्या हो गया ? अब बेटे, संस्कृति की सीता रावण के मुँह में (अपसंस्कृति के कब्जे में) चली गयी, जहाँ बेचारी की जान निकल जाने की उम्मीद है और जहाँ से वापस आने का ढंग दिखाई नहीं पड़ता। सीता राक्षसों के मुँह में से कैसे निकलेगी? चारों ओर समुद्र घिरा हुआ है। उस (मूढ़ मान्यताओं अनगढ़ परम्पराओं रूपी) समुद्र को कौन पार करेगा ? रावण कितना जबरदस्त है ? राक्षस (मनुष्य में व्याप्त आसुरी प्रवृत्तियाँ) कितने जबरदस्त हैं? इनसे लोहा कौन लेगा?

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विश्व की महान नारियां -२

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नारियों में अपरिमित शक्ति एवं क्षमताएँ सन्निहित हैं ।। जीवन के प्राय: सभी क्षेत्रों में उन्होंने कीर्तिमान स्थापित किए हैं, अपने अदम्य साहस, अथक संघर्षशीलता, दूरदर्शी बुद्धिमत्ता आदि विविध गुणों का परिचय दिया है ।। मानवीय संवेदना, करुणा, ममत्व और वात्सल्य तो नारी की सामान्य विशेषताएँ हैं ही, परंतु जिन क्षेत्रों में सदियों से पुरुषों ने अपना आधिपत्य जमा रखा था, उनमें भी प्रवेश कर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है, यदि वे चाह लें- एक बार संकल्प कर लें, तो उन क्षेत्रों में भी वे अपनी श्रेष्ठता एवं विशिष्टता सिद्ध कर सकती है ।। 

प्रस्तुत संकलन में हम "युग निर्माण योजना" में प्रकाशित विश्व की ऐसी महान नारियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं जिनसे प्रेरणा लेकर भारतीय नारियों अपने जीवन को सँवार- सजा सकती हैं ।। 

अब समय आ गया है जबकि भारतीय नारियों को घर की चहार दिवारी से बाहर निकलना ही होगा ।। खुले आकाश के तले एक सद्संकल्प लेकर विचरना होगा ।। राष्ट्र निर्माण एवं विश्वशांति के क्षेत्र में अपनी- अपनी भूमिका निश्चित कर अपनी अंतर्निहित शक्तियों एवं क्षमताओं का परिचय देना ही होगा ।। 

परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा का जीवन आदर्श हमारे सामने है ।। भारतीय नारियाँ उनसे प्रेरणा लेकर उनके स्वप्नों को साकार करने में तन- मन से जुट जाएँ- यही उन दिव्य महिमा मंडित शक्तिस्वरूपा के प्रति महिला जगत की सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।। 

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विचारो की सृजनात्मक शक्ति

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जीवन की अन्यान्य बातों की अपेक्षा सोचने की प्रक्रिया पर सामान्यत: कम ध्यान दिया गया है, जबकि मानवी सफलताओं-असफलताओं में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान है । विचारणा की शुरुआत मान्यताओं अथवा धारणा से होती है जिन्हें या तो मनुष्य स्वयं बनाता है अथवा किन्हीं दूसरे से ग्रहण करता है या वे पढ़ने, सुनने और अन्यान्य अनुभवों के आधार पर बनती हैं । अपनी अभिरुचि के अनुरूप विचारों को मानव मस्तिष्क में प्रविष्ट होने देता है जबकि जिन्हें पसंद नहीं करता उन्हें निरस्त भी कर सकता है । जिन विचारों का वह चयन करता है उन्हीं के अनुरूप चिंतन की प्रक्रिया भी चलती है । चयन किए गए विचारों के अनुरूप ही दृष्टिकोण का विकास होता है । जो विश्वास को जन्म देता है, वह परिपक्व होकर पूर्वधारणा बन जाता है । व्यक्तियों की प्रकृति एवं अभिरुचि की भिन्नता के कारण मनुष्य-मनुष्य के विश्वासों, मान्यताओं एवं धारणाओं में भारी अंतर पाया जाता है । चिंतन पद्धति में अर्जित की गई भली-बुरी आदतों की भी भूमिका होती है । स्वभाव-चिंतन को अपने ढर्रे में घुमा भर देने में समर्थ हो जाता है । स्वस्थ और उपयोगी चिंतन के लिए उस स्वभावगत ढर्रे को भी तोड़ना आवश्यक है जो मानवी गरिमा के प्रतिकूल है अथवा आत्मविकास में बाधक है ।

प्राय: अधिकांश व्यक्तियों का ऐसा विश्वास है कि विशिष्ट परिस्थिति में मन द्वारा विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करना मानवी प्रकृति का स्वभाव है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं । अभ्यास द्वारा उस ढर्रे को तोड़ना हर किसी के लिए संभव है । परिस्थिति विशेष में लोग प्राय: जिस ढंग से सोचते एवं दृष्टिकोण अपनाते हैं, उससे भिन्न स्तर का चिंतन करने के लिए भी अपने मन को अभ्यस्त किया जा सकता है । मानसिक विकास के लिए, अभीष्ट दिशा में सोचने के लिए अपनी प्रकृति को मोड़ा भी जा सकता है । 

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Monday, 1 May 2017

वातावरण के परिवर्तन का आध्यात्मिक प्रयोग

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=550युग- परिवर्तन को घड़ी सन्निकट है ।। व्यक्ति में दुष्टता और समाज में भ्रष्टता जिस तूफानी गति से बढ़ रही है, उसे देखते हुए सर्वनाश की विभीषिका सामने खड़ी प्रतीत होती है। किंतु ऐसे ही विषम असंतुलन को समय- समय पर सुधारने संभालने के लिए स्रष्टा की प्रतिज्ञा भी तो है। अपनी इस अनुपम कलाकृति, विश्व वसुधा को नियंता ने बड़े अरमानों के साथ बनाया है। संकटों की घड़ी आने पर उसका अवतरण होता है और असंतुलन फिर संतुलन में बदल जाता है। अधर्म को निरस्त और धर्म को आश्वस्त करने वाली ईश्वरीय सत्ता आज को संकटापन्न विषम वेला में उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए अपनी अवतरण प्रक्रिया को फिर संपन्न करने वाली है ।।

यह आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई ? प्रश्न उठना स्वाभाविक है। उत्तर एक ही है- इन दिनों व्यापक क्षेत्रों में जो असंतुलन उत्पन्न हो रहा है, वह इतना बढ़ गया है कि अब स्रष्टा ही उसे संतुलन में साध और ढाल सकता है ।। यह स्थिति कैसे उत्पन्न हुई ? इसका उत्तर है कि धरती की व्यवस्था सँभालने का उत्तरदायित्व स्रष्टा ने मनुष्य को सौंपा है। साथ ही उसे इतना समर्थ शरीरतंत्र दिया है कि वह न केवल जीवधारियों के लिए सुख- शांति बनाए रहे वरन ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अदृश्य शक्तियों को भी अनुकूल रहने के लिए सहमत रख सके। अपने उस उत्तरदायित्व में व्यतिरेक करके जब मनुष्य अनाचार और उददंडता बरतता है- चिंतन को भ्रष्ट और आचरण को दुष्ट बनाता है तो उसकी प्रतिक्रिया अदृश्य जगत का संतुलन बिगाड़ती है और विपत्तियों का विक्षोभ उत्पन्न करती है। दैवी प्रकोप प्रत्यक्ष में लगते तो ऐसे हैं मानों अदृश्य द्वारा मनमानी की जा रही है। 

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युग परिवर्तन क्यों ? किसलिए

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प्रज्ञावतार का लीला- संदोह एवं परिवर्तन की वेला

इन दिनों प्रगति और चमक- दमक का माहौल है, पर उसकी पन्नी उघाड़ते हो सड़न भरा विषघट प्रकट होता है। विज्ञान, शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र की प्रगति सभी के सामने अपनी चकाचौंध प्रस्तुत करती है। आशा की गई थी कि इस उपलब्धि के आधार पर मनुष्य को अधिक, सुखी ,समुन्नत प्रगतिशील, सुसंपन्न सभ्य, सुसंस्कृत बनने का अवसर मिलेगा ।। हुआ ठीक उलटा। मनुष्य के दृष्टिकोण चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता घुस पड़ने से संकीर्ण स्वार्थपरता और मत्स्य- न्याय जैसी अतिक्रमाणता यह प्रवाह चल पड़ा। मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्ट आदर्शवादिता की उपेक्षा अवमानना और विलास, संचय, पक्षपात, तथा अहंकार का दौर चल पड़ा लोभ, मोह और अहंकार को कभी शत्रु मानने, बचने, छोड़ने की शालीनता अपनाई जाती थी अब उसका अता- पता नहीं दीखता और हर व्यक्ति उन्हें के लिए मरता दीखता है। परंपरा उलटी तो परिणति भी विघातक होनी चाहिए थी, हो भी रही है। शक्ति संपन्नता पक ओर- विनाश दूसरी ओर देखकर हैरानी तो अवश्य होती है, पर यह समझने में भी देर नहीं लगती कि भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण अपनाने पर भौतिक समृद्धि से अपना ही गला कटता है, अपनी ही माचिस से आत्मदाह जैसा उपक्रम बनता है। 

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युग निर्माण क्या संभव है

महाक्रान्ति का शंखनाद

भावी महाभारत

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अविवेक, अज्ञान और अन्याय जो सारे समाज पर छाए हुए है, उसे जड़-मूल से हटा करके ही छोड़े ऐसा एक अंतिम युद्ध होगा, जिसको हम भावी महाभारत कहेंगे । भारत छोटा नहीं रह जायेगा बल्कि एक विश्वव्यापी भारत होगा जिसको हम महान भारत कह सकते हैं ।







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Thursday, 27 April 2017

स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=178मानवीय अंतराल में प्रसुप्त पड़ा विभूतियों का सम्मिश्रण जिस किसी में सघन- विस्तृत रूप में दिखाई पड़ता है, उसे प्रतिभा कहते हैं। जब इसे सदुद्देश्यों के लिये प्रयुक्त किया जाता है तो यह देवस्तर की बन जाती है और अपना परिचय महामानवों जैसा देती है। इसके विपरीत यदि मनुष्य इस संपदा का दुरुपयोग अनुचित कार्यों में करने लगे तो वह दैत्यों जैसा व्यवहार करने लगती है। जो व्यक्ति अपनी प्रतिभा को जगाकर लोकमंगल में लगा देता है, वह दूरदर्शी और विवेकवान् कहलाता है।

आज कुसमय ही है कि चारों तरफ दुर्बुद्धि का साम्राज्य छाया दिखाई देता है। इसी ने मनुष्य को वर्जनाओं को तोड़ने के लिये उद्धत स्वभाव वाला वनमानुष बनाकर रख दिया है। दुर्बुद्धि ने अनास्था को जन्म दिया है एवं ईश्वरीय सत्ता के संबंध में भी नाना प्रकार की भ्रांतियाँ समाज में फैल गई हैं। हम जिस युग में आज रह रहे हैं, वह भारी परिवर्तनों की एक शृंखला से भरा है। इसमें परिष्कृत प्रतिभाओं के उभर आने व आत्मबल उपार्जित कर लोकमानस की भ्रांतियों को मिटाने की प्रक्रिया द्रुतगति से चलेगी। यह सुनिश्चित है कि युग परिवर्तन प्रतिभा ही करेगी। मनस्वी- आत्मबल संपन्न ही अपनी भी औरों की भी नैया खेते देखे जाते हैं। इस तरह सद्बुद्धि का उभार जब होगा तो जन- जन के मन- मस्तिष्क पर छाई दुर्भावनाओं का निराकरण होता चला जाएगा। स्रष्टा की दिव्यचेतना का अवतरण हर परिष्कृत अंत:करण में होगा एवं देखते- देखते युग बदलता जाएगा। यही है प्रखर प्रज्ञारूपी परम प्रसाद जो स्रष्टा- नियंता अगले दिनों सुपात्रों पर लुटाने जा रहे हैं। 

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ध्वंस और सृजन की सुस्पष्ट संभावना

देव संस्कृति व्यापक बनेगी सीमित न रहेगी

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देव संस्कृति व्यापक बनेगी सीमित न रहेगी

भारतीय संस्कृति- देव संस्कृति- भारत मात्र एक राष्ट्र नहीं, मानवी उत्कृष्टता एवं संस्कृति का उद्गम केंद्र है ।। हिमालय के शिखरों पर जमी बरफ जलधारा बनकर बहती है और सुविस्तृत धरातल को सरसता एवं हरीतिमा से भरती है ।। भारत धर्म और अध्यात्म का उदयाचल है,जहाँ से सूर्य उगता और समस्त भूमंडल को आलोक से भरता है ।। एक तरह से यह आलोक- प्रकाश ही जीवन है, जिसके सहारे वनस्पतियाँ उगतीं, घटाएँ बरसतीं और प्राणियों में सजीव हलचलें होती हैं ।।

बीज में वृक्ष की समस्त विशेषताएँ सूक्ष्म रूप में छिपी पड़ी होती हैं ।। परंतु ये स्वत: विकसित नहीं हो पातीं ।। उन्हें अंकुरित, विकसित करके विशाल बनाने के लिए प्रयास करने पड़ते हैं ।। ठीक यही बात मनुष्य के संबंध में है ।। स्रष्टा ने उसे सृजा तो अपने हाथों से है और उसे असीम संवेदनाओं से परिपूर्ण भी बनाया है, पर साथ ही इतनी कमी भी छोड़ी है कि विकास के प्रयत्न बन पड़े तो ही उसे ऊँचा उठाने का अवसर मिलेगा ।। स्पष्ट है कि जिन्हें सुसंस्कारिता का वातावरण मिला, वे प्रगति पथ पर अग्रसर होते चले गए ।। जिन्हें उससे वंचित रहना पड़ा वे अभी भी वन्य प्राणियों की तरह रहते और गयी- बीती परिस्थितियों में समय गुजारते हैं ।। इस प्रगतिशीलता के युग में भी ऐसे वनमानुषों की कमी नहीं, जिन्हें बंदर की औलाद ही नहीं, उसकी प्रत्यक्ष प्रतिकृति भी कहा जा सकता है ।। यह पिछड़ापन और कुछ नहीं, प्रकारांतर से संस्कृति का प्रकाश न पहुँच सकने के कारण उत्पन्न हुआ अभिशाप भर है 

 

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इक्कीसवी सदी का संविधान

Preface

युग निर्माण जिसे लेकर गायत्री परिवार अपनी निष्ठा और तत्परतापूर्वक अग्रसर हो रहा है, उसका बीज सत्संकल्प है । उसी आधार पर हमारी सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम संचालित होते हैं, इसे अपना घोषणा-पत्र भी कहा जा सकता है । हम में से प्रत्येक को एक दैनिक धार्मिक कृत्य की तरह इसे नित्य प्रातःकाल पढ़ना चाहिए और सामूहिक शुभ अवसरों पर एक व्यक्ति उच्चारण करे और शेष लोगों को उसे दुहराने की शैली से पढा़ एवं दुहराया जाना चाहिए ।

संकल्प की शक्ति अपार है । यह विशाल ब्रह्मांड परमात्मा के एक छोटे संकल्प का ही प्रतिफल है । परमात्मा में इच्छा उठी एकोऽहं बहुस्याम मैं अकेला हूँ-बहुत हो जाऊँ, उस संकल्प के फलस्वरूप तीन गुण, पंचतत्त्व उपजे और सारा संसार बनकर तैयार हो गया । मनुष्य के संकल्प द्वारा इस ऊबड़- खाबड़ दुनियाँ को ऐसा सुव्यवस्थित रूप मिला है । यदि ऐसी आकांक्षा न जगी होती, आवश्यकता अनुभव न होती तो कदाचित् मानव प्राणी भी अन्य वन्य पशुओं की भाँति अपनी मौत के दिन पूरे कर रहा होता ।

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सामाजिक नैतिक बोद्धिक क्रान्ति कैसे-६५

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आज का मनुष्य अधिक सुविधा व साधन सम्पन्न है ।। इतना अधिक कि २०० वर्ष पूर्व का मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था ।। वैज्ञानिक क्रान्ति व आर्थिक क्रान्ति ने साधनों के अम्बार जुटा दिये हैं, फिर भी मनुष्य पहले की तुलना में स्वयं को अभावग्रस्त, रुग्ण, चिन्तित व एकाकी ही अनुभव कर रहा है ।। सुख- सन्तोष की दृष्टि से वह पहलें की अपेक्षा और अधिक दीन- दुर्बल हो गया है ।। शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, नैतिक विकास, पारिवारिक सौजन्य, सामाजिक- सद्भाव, आर्थिक संतोष व आंतरिक उल्लास की दृष्टि से मनुष्य जाति समग्र विश्व में नई- नई समस्याओं से घिर गयी है ।। परमपूज्य गुरुदेव इन सभी समस्याओं के मूल में उलटी बुद्धि का नट नृत्य ही देखते हैं ।। दुर्गतिजन्य दुर्गति ही चारों ओर दिखाई देती है एवं यह दुर्बुद्धि भावनात्मक स्तर पर एक विचार क्रान्ति के बिना ठीक होगी नहीं, यह उनका वाड्मय के इस खण्ड में अभिमत है ।।

 

विचारों में अपार शक्ति छिपी पड़ी है ।। विचारशीलता एवं विवेकशीलता विकसित की जा सके तो तथाकथित शिक्षा में प्राण डाले जा सकते हैं एवं व्यक्ति को विद्या रूपी संजीवनी द्वारा मूर्च्छना से उबारा जा सकता है ।। गायत्री परिवार का यही लक्ष्य बताते हुए बारबार युगद्रष्टा आचार्यश्री ने लिखा है कि, बिना एक व्यापकस्तरीय विचार क्रान्ति के इस राष्ट्र का ही नहीं, सारी विश्व- वसुधा का सामाजिक, नैतिक व बौद्धिक स्तर पर नवनिर्माण सम्भव नहीं ।। गायत्री एवं यज्ञ के तत्वदर्शन को इसके लिए अनिवार्य बताते हुए उनने जन- जन तक सद्बुद्धि व सद्कर्म का संदेश पहुँचाने की आवश्यकता का प्रतिपादन किया है ।। 

 

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भव्य समाज का अभिनव निर्माण - 46

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धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियों के अवतरण में समाज व्यवस्था की प्रमुख भूमिका होती है । जनसमाज की मान्यताएँ, गतिविधियाँ, प्रथाएँ जिस स्तर की होती हैं, उसी प्रवाह में सामान्यजन बहते और ढलते जाते हैं । अनुकरणप्रिय मनुष्य का स्तर और रुझान प्राय: सामयिक प्रचलन एवं परिस्थितियों के अनुरूप बनता चला जाता है । यदि उनका स्तर उच्चस्तरीय हो तो व्यक्ति एवं समुदाय का चिन्तन भी उसी के अनुरूप ढलेगा और समाज में स्वर्गीय परिस्थितियाँ पैदा होंगी । जिस समाज में ऐसे लोगों का बाहुल्य होता है, जो परस्पर एक-दूसरे के दु:ख-दर्द में सम्मिलित रहते हैं, दु:खो को बँटाते, सुखों को बाँटते हैं और उदार सहयोग-सहकार का, स्नेह-सौजन्य का, त्याग का परिचय देकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं, उसे "देव समाज" कहते हैं । जब-जब जन-समूह इस प्रकार का सम्बन्ध बनाये रखता है तब -तब स्वर्गीय परिस्थितियाँ वहाँ विद्यमान रहती हैं । परमपूज्य गुरुदेव ने ऐसे ही सभ्य, भव्य एवं अभिनव समाज की परिकल्पना की है और कहा है कि आने वाले दिनों में व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया गतिशील होगी । संकीर्ण स्वार्थपरता-परमार्थ परायणता में बदलेगी और धरती पर स्वर्ग के दर्शन होंगे ।

परमपूज्य गुरुदेव का यह आशावादी चिंतन वाड्मय के इस खण्ड में स्थान-स्थान पर निर्झरित होता हुआ प्रकट हुआ है । "वसुधैव कुटुम्बकम्" के सिद्धान्त के आधार पर "नया संसार बसायेंगे-नया इंसान बनायेंगे!" का उद्घोष करने वाले युग प्रवर्तक एवं महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के सूत्रधार परमपूज्य गुरुदेव ने अन्यान्य अध्यात्मवादी तत्वदर्शकों, चिंतक मनीषियों की तुलना में सशक्त समाज के निर्माण की आवश्यकता को एवं श्रेष्ठ मानकों की भूमिका को स्थान-स्थान पर दुहराया है ।


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गायत्री की युगांतरीय चेतना

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यों मनुष्य के पास प्रत्यक्ष सामर्थ्यों की कमी नहीं है और उनका सदुपयोग करके वह अपने तथा दूसरों के लिए बहुत कुछ करता है, किन्तु उसकी असीम सामर्थ्य को देखना हो तो मानवी चेतना के अन्तराल में प्रवेश करना होगा ।। व्यक्ति की महिमा को बाहर भी देखा जा सकता है पर गरिमा का पता लगाना हो तो अन्तरंग ही टटोलना पड़ेगा ।। इस अन्तरंग को समझने उसे परिष्कृत एवं समर्थ बनाने, जागृत अन्तःसमता का सदुपयोग कर सकने के विज्ञान को ही ब्रह्मविद्या कहते हैं ।। ब्रह्मविद्या के कलेवर का बीज- सूत्र गायत्री को समझा जा सकता है ।। प्रकारान्तर से गायत्री को मानवी गरिमा के अन्तराल में प्रवेश पा सकने वाली और वहाँ जो रहस्यमय है उसे प्रत्यक्ष में उखाड़ लाने की सामर्थ्य को गायत्री कह सकते हैं ।। नवयुग के सृजन में सर्वोपरि उपयोग इसी दिव्य शक्ति का होगा ।। मनुष्य की बहिरंग सत्ता को भी कई तरह की सामर्थ्य प्राप्त है पर वे सभी सीमित होती हैं और अस्थिर भी ।। सामान्यतया सम्पत्ति, बलिष्ठता शिक्षा, प्रतिभा, पदवी अधिकार जैसे साधन ही वैभव में गिने जाते हैं और इन्हीं के सहारे कई तरह की सफलताएँ भी सम्पादित की जाती हैं ।। इतने पर भी इनका परिणाम सीमित ही रहता है और इसके सहारे व्यक्तिगत वैभव सीमित मात्रा में ही उपलब्ध किया जा सकता है ।। भौतिक सफलताएँ मात्र अपने पुरुषार्थ और साधनों के सहारे ही नहीं मिल जाती वरन् उनके लिए दूसरों की सहायता और परिस्थितियों की अनुकूलता पर भी निर्भर रहना पड़ता है ।।

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Listen To Mahakal Call

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The expectation of this eras rishi Read my thoughts" and spread their dynamic sparks among the people. Understand the principles of the realities of life. Come out of imaginary life. Spread my thinking among the near ones. My thoughts are very sharp. My claim that I will turn the world around is not made on the basis of magic powers but on the basis of my powerful thoughts. The whole world is my field of work. For the development of individuals, society, country and the spread of religion and culture and for world-peace, you should make every person read these thoughts. If you do this, then it is my claim that the era will be definitely transformed.


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समयदान ही युग धर्म

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=184—दान अर्थात् देना; ईश्वर प्रदत्त क्षमताओं को जागृत विकसित करना और उससे औरों को भी लाभ पहुँचाना। यही है पुण्य परमार्थ- सेवा स्वर्गीय परिस्थितियाँ इसी आधार पर बनती हैं।

लेना- बटोरना के अधिकार का अपहरण करना, यही पाप है, इसी की प्रतिक्रिया का अलंकारिक प्रतिपादन है नर्क।

— यहाँ समस्त महामानव मात्र एक ही अवलंबन अपनाकर उत्कृष्टता के प्रणेता बन सके हैं, कि उन्होंने संसार में जो पाया, उसे प्रतिफल स्वरूप अनेक गुना करके देने का व्रत निबाहा।

धनदान तो एक प्रतीक मात्र है। उसका तो दुरुपयोग भी हो सकता है, प्रभाव विपरीत भी पड़ सकता है। वास्तविक दान प्रतिभा का है, धन साधन उसी से उपजते हैं। प्रतिभादान- समयदान से ही संभव है। यह ईश्वर प्रदत्त संपदा सबके पास समान रूप से विद्यमान है।

— वस्तुतः: समयदान तभी बन पड़ता है, जब अंतराल की गहराई में, आदर्शों पर चलने के लिए बेचैन करने वाली टीस उठती हो।

— यह असाधारण समय है। तत्काल निर्णय और तीव्र क्रियाशीलता उसी प्रकार आवश्यक है जैसी कि आग बुझाने या ट्रेन छूटने के समय होते है। हनुमान, बुद्ध, समर्थ गुरु रामदास, विवेकानन्द आदि ने समय आने पर शीघ्र निर्णय न लिए होते, तो ये उस गौरव से वंचित ही रह जाते, जो उन्हें प्राप्त हो गया।

— महात्मा ईसा ने ठीक ही कहा है, ‘‘शीघ्र कार्य यदि बाएँ हाथ की पकड़ में आता है तो भी तुरंत पकड़ो। बाएँ से दाएँ का संतुलन बनाने जितने थोड़े- से समय में ही कहीं शैतान बहका न ले ..........। ’’


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युग परिवर्तन इस्लामी दृष्टिकोण

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=103यह युग परिवर्तन का अति महत्वपूर्ण समय है ।। युग परिवर्तन का अर्थ है- ईश्वरीय योजना के अन्तर्गत मनुष्य मात्र के लिये उज्वल भविष्य का निर्माण ।। ऐसा युग जिसे सनातन धर्म में ' सतयुग ' की संज्ञा दी जाती रही है ।। इस सम्बन्ध में सैकड़ों साल पहले महात्मा, सूरदास, फ्रांस के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता नेस्ट्राडेमस, महात्मा वहाउल्ला, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द आदि ने महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं ।। उक्त महापुरुषों के कथन को सार्थक करते हुए युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने इसकी समग्र और व्यवस्थित कार्य योजना घोषित करके इस हेतु एक विश्वव्यापी अभियान ' युग निर्माण ' के नाम से प्रारंभ कर दिया ।। इसमें उन्होंने विश्व समाज के सभी पक्षों की भागीदारी आवश्यक बतलाई


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Wednesday, 26 April 2017

युग की माँग प्रतिभा परिष्कार-भाग २

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=169बड़े कामों को बड़े शक्ति केंद्र ही संपन्न कर सकते हैं। दलदल में फँसे हाथी को बलवान् हाथी ही खींचकर पार करा पाते हैं। पटरी से उतरे इंजन को समर्थ क्रेन ही उठाकर यथास्थान रखती है। उफनते समुद्र में नाव खेना साहसी नाविकों से ही बन पड़ता है। आज के समाज व संसार की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए स्रष्टा को भी वरिष्ठ स्तर की परिष्कृत प्रतिभाओं की आवश्यकता पड़ती है। प्रतिभाएँ ऐसी संपदाएँ हैं, जिनसे न केवल वे स्वयं भरपूर श्रेय अर्जित करते हैं, वरन् अपने क्षेत्र- समुदाय और देश की अति विकट दीखने वाली उलझनों को भी सुलझाने में वे सफल होते हैं। इसी कारण इन्हें देवदूत- देवमानव कहा जाता है।

इन दिनों असंतुलन में बदलने के लिए महाकाल की एक बड़ी योजना बन रही है। यह कार्य आदर्शवादी सहायकों में उमंगों को उभारकर उन्हें एक सूत्र में आबद्ध करने से लेकर नियमित सृजनात्मक गतिविधियों- सत्प्रवृत्तियों का मोरचा अनीति- दुष्प्रवृत्ति के विरुद्ध खड़े करने के रूप में आरंभ हो चुका है। इससे वह महाजागरण की प्रक्रिया होगी जो प्रतिभाओं की मूर्च्छना हटाएगी, उन्हें एकाकी आगे बढ़ाकर अग्रगमन की क्षमता का प्रमाण देने हेतु प्रेरित करेगी। नवयुग का अरुणोदय निकट है। सतयुग की सुनिश्चित संभावनाएँ बन रही हैं। प्रतिभा के धनी ही इस लक्ष्य को पूरा कर दिखाएँगे। 

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