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Tuesday, 28 March 2017

हम सब एक दूसरे पर निर्भर है

संतुलन और गतिशीलता का एकमात्र आधार


http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=719सृष्टि में चारों ओर, जिधर भी दृष्टि दौड़ाई जाए, एक ही बात दृष्टिगोचर होगी कि सब कुछ शांत, सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध ढ़ंग से चल रहा है ।। इस सुव्यवस्था और क्रमबद्ध गतिशीलता का एक प्रमुख आधार है दूसरों के लिए अपनी सामर्थ्य और विशेषताओं का उपयोग- समर्पण ।। सृष्टि का कण- कण किस प्रकार अपनी विभूतियों का उपयोग दूसरों के लिए करने की छूट दिए हुए है यह पग- पग पर देखा जा सकता है ।। शरीर की व्यवस्था और जीवन चेतना किस प्रकार जीवित बनी रहती है- इसी का अध्ययन किया जाए तो प्रतीत होगा कि स्थूल शरीर के क्रियाकलाप स्वेच्छया संचालित नहीं होते, बल्कि कोई परमार्थ चेतना संपन्न दूसरों के लिए अपना उत्सर्ग करने की प्रवृत्ति वाले कुछ विशिष्ट तत्त्व उसमें अपनी विशिष्ट भूमिका निबाहते हैं ।।

कुछ समय पूर्व यह समझा जाता था कि रक्त - मांस का पिंड शरीर आहार- विहार द्वारा संचालित होता है ।। यह तो पीछे मालूम पड़ा कि आहार शरीर रूपी इंजिन को गरम बनाए रहने के लिए ईंधन मात्र का काम करता है ।। उस आधार पर यह भी पाया गया कि पेट, हृदय और फेफड़ों को संचालक तत्त्व नहीं माना जा सकता ।। शरीर के समस्त क्रियाकलापों का संचालन मूलत: चेतन और अचेतन मस्तिष्कों द्वारा होता है उन्हीं की प्रेरणा से विविध अंग अपना- अपना काम चलाते है ।। अस्तु स्वास्थ्य बल एवं बुद्धिबल को विकसित करने के लिए मस्तिष्क विद्या के गहरे पर्तों का अध्ययन आवश्यक समझा गया है और अभीष्ट परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए उसी क्षेत्र को प्रधानता दी गई ।। पिछले दिनों जीव विज्ञानियों ने शरीर शोध अन्वेषण की ओर से विरत होकर अपना मुँह मनशास्त्र की ऊहापोह पर केंद्रित किया है ।।

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समझदारों की नासमझी

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मनुष्य की प्रधान विशेषता उसकी विचारशीलता है ।। इसी आधार पर उसकी विचारणा, कल्पना, विवेचना, धारणा का विकास होता है ।। अन्य प्राणियों की विचार परिधि पेट प्रजनन, आत्मरक्षा जैसे प्रयोजनों तक सीमित रहती है ।। वे इसके आगे बढ़कर विश्व व्यवस्था, निजी जीवनचर्या, भावी संभावना आदि के संबंध में कुछ सोच नहीं पाते, अधिक सुविधा पाने और प्रतिस्पर्द्धा का आक्रमण करने जैसा आवेश भी यदाकदा उभरते रहते हैं ।। ज्यों- त्यों करके समय बिताते हैं और नियतिक्रम के अनुसार मृत्यु के मुख में चले जाते हैं ।।

मनुष्य को भगवान ने ऐसा विकसित मनःसंस्थान दिया है, जिसके सहारे वह बहुत कुछ सोच सकता है ।। भूतकालीन घटनाओं से अनुभव संपादित करता है, वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भरसक प्रयत्न करता है ।। भविष्य को अधिक सुखद- समुन्नत बनाने के लिए भी प्रयत्न करता है, नीति, धर्म, समाज आदि के संबंध में मर्यादाओं एवं परंपराओं का भी यथा अवसर पालन करता है ।। सहयोग उसका विशेष गुण है, उसी आधार पर वह आदान प्रदान के आधार खड़े करता है और सुविधाएँ संजोने प्रगति के आधार खड़े करने के लिए जो कुछ बन पड़ता है सो करता है ।। इन्हीं मानसिक विशेषताओं के कारण उसमें संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति, साहसिकता, तत्परता आदि विशेषताओं का अभिवर्धन हुआ है वह अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुविकसित बन सका है ।।

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समग्र प्रगति सहकारिता पर निर्भर

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=700आप अकेले नहीं हैं, समाज की एक इकाई हैं ।।

सामाजिक सहयोग से ही मानवी प्रगति संभव हुई है ।। एकाकी श्रम प्रयासों से तो वह अन्न, वस्त्र, निवास, शिक्षा, चिकित्सा, आजीविका जैसी दैनिक जीवन की आवश्यकता तक पूरी नहीं कर सकता ।। निर्वाह से लेकर उल्लास तक की सभी आवश्यकताएँ जिसे सामूहिक सहयोग से उपलब्ध होती हैं, उसमें मनुष्य का यह भी कर्त्तव्य- उत्तरदायित्व है कि समाज को सुखी बनाने वाले परमार्थ प्रयोजनों को भी जीवनक्रम में सम्मिलित रखे ।। परमार्थ की बात सोचे ।। लोक- कल्याण में रुचि ले और उपकारों का ऋण चुकाए ।। जब अपने को असंख्यों का सहयोग मिला है तो कृतज्ञता की अभिव्यक्ति भी आवश्यक है ।। इसके लिए दाँत निपोर देने या शब्द- जंजाल बुन देने से काम नहीं चलेगा, सक्रिय प्रयासों की आवश्यकता पड़ेगी ।। इन्हीं प्रयासों को लोग मंगल की साधना कहते हैं ।। धर्मशास्त्रों में इसी को पुण्य परमार्थ कहा गया है और स्वर्ग मुक्ति का, जीवनलक्ष्य की पूर्ति का आधारभूत कारण माना गया है ।। पूजा- पाठ, स्वाध्याय- सत्संग आदि कृत्यों का उद्देश्य इसी सत्प्रवृत्ति को प्रसुप्ति से उबारकर प्रखर बनाने की भूमिका निभाना है ।।

वस्तुत: भाग्य या किस्मत जैसी चीज न तो कोई मनुष्य लिखा कर आता है और न ही ऐसी कोई सत्ता है जो विधाता के रूप में प्रत्येक मानव- शिशु के कपाल पर उसके सारे जीवन की घटनाएँ लिखती हो ।। मनुष्य प्रयत्नों से ही सफल होता है और पुरुषार्थ के बल पर ही अपने भाग्य का निर्माण करता है ।। लेकिन अपनी मान्यताओं को यहीं तक रखकर दूसरों के हित की उपेक्षा करना या समाज का जरा भी ध्यान न रखना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है ।। 

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सभ्यता का शुभारंभ

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1223आध्यात्मिक और भौतिक उभय पक्षीय प्रगति का बीज तत्व है- "सभ्यता" ।। यह बहिरंग है ।। शिष्टाचार के रूप में यही प्रकट होती है ।। शिष्टाचार से कुछ ऊँची स्थिति है- सदाचार ।। सभ्यता के सूत्र समयानुसार जब अंत: क्षेत्र में उतरते हैं, तो क्रमश: सदाचार और सुसंस्कार के रूप में विकसित होते हैं ।।

सिद्धांत रूप में तो यह भी कहा जा सकता है कि सुसंस्कारिता को हृदयंगम करने के उपरांत सदाचार एवं सभ्यता की रीति- नीति भी व्यवहार में दीखने लगती है, परंतु प्रत्यक्ष अनुभव यह बतलाता है कि सुसंस्कारिता के प्रति उमंग पैदा करने के लिए जन सामान्य को सभ्यता के बहिरंग सूत्रों को ही माध्यम बनाना पड़ता है ।।

सभ्यता प्रत्यक्ष एवं दृश्यमान है ।। क्रिया से चेतना विकसित होती है ।। इसी से संयम जैसे आध्यात्मिक निर्धारणों को अभ्यास में उतारा जाता है ।। संस्कृति के सूत्रों के आधार पर आत्मनिर्माण करने वाला सांसारिक सहयोग और दैवी अनुदानों का सच्चा अधिकारी बन जाता है ।। सभ्यता का अनुसरण करते- करते साधक संस्कृति के भावनात्मक उच्चस्तर तक पहुँच जाता है ।। 

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Sunday, 26 March 2017

सदाचरण और मर्यादा पालन

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1224परमात्मा ने हर मनुष्य की अन्तरात्मा में एक मार्गदर्शक चेतना की प्रतिष्ठा की है, जो उसे उचित कर्म करने की प्रेरणा देती एवं अनुचित करने पर भर्त्सना करती रहती है ।। सदाचरण, कर्तव्यपालन के कार्य धर्म या पुण्य कहलाते हैं, उनके करते ही तत्क्षण करने वाले को प्रसन्नता एवं शांति का अनुभव होता है ।। इसके विपरीत यदि स्वेच्छाचार बरता गया है, धर्म मर्यादाओं को तोड़ा गया है, स्वार्थ के लिए अनीति का आचरण किया गया है, तो अन्तरात्मा में लज्जा, संकोच, पश्चात्ताप, भय और ग्लानि का भाव उत्पन्न होगा ।। भीतर अशांति रहेगी और ऐसा लगेगा मानों अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कार रही है ।। 

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मानव प्रगति एवं पर्यावरण

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=636• भौतिकी प्रगति की दिशाधारा विहंगावलोकन
• प्रगति बनाम पर्यावरण से खिलवाड़
• भौतिक प्रगति, पर्यावरण की क्षति, मानव की दुर्गति
• वैज्ञानिक प्रगति का उपहार युग विभीषिका
• भोगवाद यानी विनाश की ओर बढ़ते कदम









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मानव जीवन की गरिमा

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1239मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता- मनुष्य जीवन इस सृष्टि की सबसे श्रेष्ठ रचना है । लगता है भगवान ने अपनी सारी कारीगरी को समेटकर इसे बनाया है । जिन गुणों और विशेषताओं के साथ इसे भेजा गया है, वे अन्य किसी प्राणी को प्राप्त नहीं हैं । इस कथन में भगवान पर पक्षपाती होने का आरोप लग सकता है, किंतु बात ऐसी है नहीं । भगवान तो सबका पालनहार पिता है, उसे अपनी सभी संतानें एक समान प्रिय हैं और वह न्यायप्रिय है । सभी प्राणियों को उसने जीने लायक आवश्यक सुविधाओं को देकर भेजा है । स्वयं निराकार होने के कारण उसने मनुष्य को अपना मुख्य प्रतिनिधि बनाकर सृष्टि की देख-रेख के लिए भेजा है । उसे उसकी आवश्यकता से अधिक सुविधाएँ और शक्तियाँ इसलिए दी गई हैं, ताकि वह उसके विश्व-उद्यान को सुंदर, सभ्य और खुशहाल बनाने में अपनी जिम्मेदारी को ठीक ढंग से निभा सके ।

शारीरिक दृष्टि से मनुष्य की स्थिति अन्य प्राणियों से बेहतर नहीं है । पक्षियों की तरह हवा में उड़ना, मछलियों की भाँति जल में तैरना उसे नहीं आता । बंदर के समान पेड़ पर उछल-कूद वह नहीं कर सकता, शेर की तरह अपना पराक्रम-बल भी नहीं दिखा सकता । हाथी के सामने वह बौना सा दिखता है । इंद्रिय क्षमताओं में भी अन्य प्राणी उससे श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं । सूँघने की शक्ति में कुत्ता, सुनने में उल्लू और देखने में बाज मनुष्य से बहुत कुशल ही सिद्ध होते हैं । कुछ जीवधारी तो भूकंप, बारिश, तूफान आदि का पहले से ही अनुमान भी लगा लेते हैं और समय रहते अपना बचाव कर लेते हैं, किंतु मनुष्य अपनी बुद्धि और पुरुषार्थ की क्षमता में सभी प्राणियों पर भारी पड़ता है । अपने से अधिक शक्ति शाली, खतरनाक और भारी भरकम शेर, चीता व हाथी जैसे वनप्राणियों को वह अपने बुद्धि कौशल और मानसिक बल से हरा देता है । 

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Friday, 24 March 2017

मनुष्य गिरा हुआ देवता या उठा हुआ पशु ?

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=713प्रकृति का भंडार इतना विशाल है कि उसे जितना खोजा जा सके उतना ही कम है। भौतिक विज्ञान से बढ़कर चेतना विज्ञान है। जड़ शक्तियों की तुलना में चेतना शक्तियों की क्षमता एवं उत्कृष्टता का बाहुल्य स्वीकार करना ही पड़ेगा

मनुष्य का कर्तव्य उसकी सफलताओं का कारण है, यह तथ्य सर्वविदित है। पर मान्यता भी एक अंश तक ही सही है। इसके साथ एक काऱण और भी जुड़ा हुआ प्रतीत होता है-निर्धारित नियति। भले ही वह अपने ही पूर्व संचित कर्मों का फल ही हो, या उसका संचालन किसी अदृश्य से सम्बन्धित हो। प्रकृति के अद्भुत रहस्यों में से कुछ को मनुष्य ने एक सीमा तक ही जाना है। अभी बहुत बड़ा क्षेत्र अनजाना और अछूता पड़ा है। 

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मनुष्य की दुर्बुद्धि और भावी विनाश

हम बढ़ रहे हैं, मगर किस दिशा में ?

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=552प्रकृति की व्यवस्थाएँ इतनी सर्वांण पूर्ण हैं कि उसे ही परमात्मा के रूप में मान लिया जाए तो कुछ अनुचित नहीं होगा ।। शिशु जन्म से पूर्व ही माँ के स्तनों में ठीक उस नन्हें बालक की प्रकृति के अनुरूप दूध की व्यवस्था, हर प्राणी के अनुरूप खाद्य व्यवस्था बना कर जगत में सुव्यवस्था और संतुलन बनाए रखने वाली उसकी कठोर नियम व्यवस्था भी सुविदित है ।। इस व्यवस्था को जो कोई तोड़ता है, उसे दंड का भागी बनना पड़ता है ।।

इन दिनों मनुष्य ने अपनी बुद्धि का उपयोग कर अनेकानेक साधन सुविधाएँ विकसित और अर्जित कर ली हैं ।। वह निरंतर प्रगति करता जा रहा है, उत्पादन पर ध्यान केंद्रित किया है ।। मानवी रुचि में अधिकाधिक उपयोग की ललक उत्पन्न की जा रही है ताकि अनावश्यक किंतु आकर्षक वस्तुओं की खपत बड़े और उससे निहित स्वार्थों को अधिकाधिक लाभ कमाने का अवसर मिलता चला जाए ।। इसी एकांगी घुड़दौड़ ने यह भुला दिया है कि इस तथाकथित प्रगति और तथाकथित सभ्यता का सृष्टि संतुलन पर क्या असर पड़ेगा ।। इकलॉजिकल बेलेंस गँवा कर मनुष्य सुविधा और लाभ प्राप्त करने के स्थान पर ऐसी सर्प विभीषिका को गले में लपेट लेगा जो इसके लिए विनाश का संदेश ही सिद्ध होगी ।। 

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ब्राह्मण जागें साधु चेतें

ब्राह्मण जागे- साधु चेतें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=730ब्राह्मण को शारत्रों में "भू-सुर" कहा गया हैं ।। भूसुर का अर्थ है पृथ्वी का देवता ।। एक देवता वे होते हैं, जो स्वर्ग में रहते हैं और अदृश्य रुप से मनुष्यों की सेवा सहायता करते है। उनका कृपा- पात्र बनने के लिए लोग तरह- तरह के पूजा उपचार करते हैं ताकि देवता प्रसन्न एवं परितुष्ट रहें और अपने अनुग्रह की वर्षा इस धरती के लोगों पर करते रहे ।। लगभग ऐसी ही स्थिति भूसुरों की भी हैं, इन पृथ्वी के देवता, ब्राहाणों की समुचित पूजा हिन्दू समाज में होती हैं ।। उन्हें अन्य वर्णो से ऊँचा माना जाता है ।। कम आयु के ब्राह्मण को भी बड़ी आयु के अन्य लोग प्रणाम करते हैं ।। यह इसलिए किया जाता हैं कि अन्तरिक्ष में रहने वाले अदृश्य देवताओं की तरह यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले, भू- लोक वासो ब्राह्मण देवता भी हमारी श्रद्धा, भावना, दान- दक्षिणा आदि से परितुष्ट होकर हमारे कल्याण का आयोजन करेंगे |

समाज- पुरुष का शीर्ष -ब्राह्मण ब्राह्मणों का स्वरुप ही ऐसा हैं ।। शासनों में उनके कर्तव्य ऐसे कठोर बताए गये है जिनका पालन करने वाले को देवता ही कहना पड़ेगा ।। जो ब्राह्मण की कसौटी पर खरा उतरता हैं, उसे देवता नहीं तो और क्या कहेंगे ? आस्तिकता के महान आदशों के प्रति निष्ठावान बने रहने के लिए भावनापूर्ण ईंश्वर उपासना, व्यक्तित्व को उत्कृष्ट स्तर का बनाने के लिए आत्म- निर्माण की कठोर जीवन साधना और जनमानस में सत्प्रवृत्तियों विकसित करने के लिए अनवरत- श्रम, यह तीन कार्यक्रम जिन्होंने अपने लिए निर्धारित कर लिए हैं और जो इसी राजमार्ग पर निरन्तर चलते रहकर अपना ही नहीं समस्त संसार का कल्याण करते हैं, उनके चरणों पर सभी का मस्तिष्क झुक जाना स्वाभाविक हैं ।। 

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परिष्कृत व्यक्तित्व एक सिद्धि एक उपलब्धि

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=994उच्चशिक्षा, चतुरता या शरीर सौष्ठव भर से कोई व्यक्ति न तो आत्म- संतोष पा सकता है और न लोक सम्मान ।। इन सबसे महत्त्वपूर्ण है परिष्कृत व्यक्तित्व।। प्रतिभाशील और उन्नतिशील बनने का अवसर इसी आधार पर मिलता है ।।

समग्र व्यक्तित्व के विकास को विज्ञान की भाषा में "बौडी इमेज" कहा जाता है ।। जिनने इस दिशा में अपने को विकसित कर लिया, उनने दूसरों को प्रभावित करने की विशिष्टता को उपलब्ध कर लिया ।। ऐसे ही व्यक्तित्व प्रामाणिक और क्रिया कुशल माने जाते हैं ।। उनकी माँग सर्वत्र रहती है ।। वे न तो हीन समझे जाते हैं और न अपने कामों में असफल रहते हैं ।। "बौडी इमेज" से तात्पर्य सौंदर्य, सज्जा या चतुरता से नहीं, वरन व्यक्तित्व की उस विशिष्टता से है जिसके आधार पर किसी की वरिष्ठता एवं विशिष्टता को स्वीकार किया जाता है ।। यह किसी के विश्वस्त, क्रियाकुशल एवं प्रामाणिक होने की स्थिति है ।। जिसके पास यह संचय है समझना चाहिए उसके पास बहुत कुछ है ।। जो इस क्षेत्र में पिछड़ गया, समझना चाहिए उसे तिरस्कार का भाजन बनना पड़ेगा ।। 

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धन बल से मनुष्यता रौंदी न जाए

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=565पैसे में रचनात्मक शक्ति है, उसके द्वारा कितने ही उपयोगी कार्य हो सकते हैं और सदुद्देश्यों की पूर्ति में सहायता मिल सकती है । पर साथ ही यह भी न भूल जाना चाहिए कि उसकी मारक शक्ति उससे भी बढ़ी-चढ़ी है ।

धन का महत्त्व तभी है जब वह नीतिपूर्वक कमाया गया हो और सदुद्देश्यों के लिए उचित मात्रा में खर्च किया गया हो । अनीति से कमाया तो जा सकता है, जिन लोगों के द्वारा वह कमाया गया है, जिनका शोषण या उत्पीड़न हुआ है, उनका विक्षोभ सारी मानव सभ्यता के लिए घातक परिणाम उत्पन्न करता है । शोषित एवं उत्पीड़ित व्यक्ति जब देखते हैं कि उन्हें ठगा या सताया गया है और जिसने सताया या ठगा है वह मौज कर रहा है तो उनका मन आस्तिकता एवं नैतिकता के प्रति विद्रोह भावना से भर जाता है ।

यह विक्षोभ धर्म और ईश्वर पर से विश्वास डिगा सकता है और उस स्थिति में पड़ा हुआ मनुष्य अपने ढंग से, अपने से छोटों के साथ दुर्व्यवहार आरंभ कर सकता है । इस प्रकार बुराई की बेल बढ़ती है और उसके विषैले फल संसार में अनेकों प्रकार के दुष्परिणाम पैदा करते हैं । इस प्रकार फली हुई दुष्प्रवृत्तियों का कोई परिणाम उस पर भी हो सकता है, जिसने अनीतिपूर्वक किसी का शोषण किया था । बुराई से केवल बुराई बढ़ती है । धन यदि बुरे माध्यम से कमाया गया है तो उसका खरच भी उचित रीति से नहीं हो सकता । 

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जीवन की श्रेष्ठता और सदुपयोग्

क्या मनुष्य सचमुच सर्वश्रेष्ठ प्राणी है ?

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=702वह क्षण निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण रहा होगा जब मनुष्य ने अपने आपको सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार पाल लिया ।। क्योंकि इस स्थिति में मनुष्य ने विश्व- वसुधा के, सृष्टि- परिवार के अन्यान्य प्राणियों को हीन और हेय मान लिया ।। सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी समझने की अहमन्यता मनुष्य में किसी भी कारण से विकसित हुई हो, लेकिन यह सत्य है कि उसने अपने इस पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर निरीह प्राणियों का शोषण और मनचाहा उत्पीड़न किया ।। अपनी अहंमन्यता को उसने संसार के दूसरे प्राणियों पर जिस ढंग से थोपा उनकी प्रतिक्रिया- परिणति स्वय उसके लिये ही उलटा सिद्ध हुआ है।। जो दाँव उसने मनुष्येतर प्राणियों पर चलाया था, वह धीरे- धीरे उसके स्वभाव का अंग बन गया और अब वह यही प्रयोग अपनी जाति पर भी अपनाने लगा है ।। परिणाम यह हो रहा है कि मानवीय संवेदना धीरे- धीरे घटती जा रही है तथा वैयक्तिक सुख- स्वार्थ के लिए शोषण और अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं ।। इस स्थिति को व्यक्ति- व्यक्ति के बीच परिवार- परिवार के बीच जातियों, समुदायों और विभिन्न राष्ट्रों के बीच खींचतान के रुप में स्पष्ट देखा जा सकता है ।।

होना यह चाहिए था कि मनुष्य अपनी सर्वश्रेष्ठता की अहंमन्यता नहीं पालता और सभी प्राणियों को जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखता ।। उनकी अनंत क्षमताओं से कुछ सीखने का प्रयत्न करता ।। कदाचित् ऐसा हुआ होता तो स्थिति कुछ और ही होती ।। वह अपने सहचर पशु पक्षियों को देखता, यह जानता कि प्रकृति ने उन्हें भी कितने लाड़- दुलार से सजाया संवारा है तो उसका हृदय और भी विशाल बनता तथा चेतना का स्तर और ऊँचा उठता ।। इस स्थिति में प्रतीत होता कि अभागे कहे जाने वाले इन जीवों को भी प्रकृति से कम नहीं, मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक ही उपहार मिले हैं ।। 

 

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वर्तमान चुनौतियाँ युवावर्ग

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=99हमारे युवाओं में कभी भी प्रतिभा क्षमता कीकमी नहीं रही है । आज भी उनके समक्ष अपार संभावनाएँ हैं । कुछ भी असंभव नहीं है । समस्या केवल यही है कि उन्हें अनेकानेक विकट एवं विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है । समाज में अनेक केकड़ा प्रवृतिके लोग उनकी टांग खीच कर नीचे गिराने हर समय तत्पर रहते हैं । यदि वे अपने मानव जीवन के उद्देश्य को भलीभाँति पहचान कर उचित पुरुषार्थ करेंगे तो वे अवश्यही इस काजल की कोठरी से बेदाग बाहर निकलने में सफलहो जाएंगे । इस पुस्तक के द्वारा युवावर्ग को यही संदेश देने का प्रयास किया गया है । थोडी़ सी समझदारी उनके जीवनको सफलता की स्वर्णिम आभा से आलोकित कर देगी । इस प्रकाश को अधिक से अधिक युवाओं तक अवश्य पहुँचाएँ । 

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रामचरितमानस की प्रगतिशील प्रेरणा

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=10भारतीय संस्कृति के आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में मूर्तिमान करने वाले चौबीस अथवा दस अवतारों की श्रृंखला में भगवान राम और कृष्ण का विशिष्ट स्थान है। उन्हें भारतीय धर्म के आकाश में चमकने वाले सूर्य और चंद्र कहा जा सकता है। उन्होंने व्यक्ति और समाज के उत्कृष्ट स्वरूप को अक्षुण्ण रखने एवं विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए, इसे अपने पुण्य-चरित्रों द्वारा जन साधारण के सामने प्रस्तुत किया है।ठोस शिक्षा की पद्धति भी यही है कि जो कहना हो, जो सिखाना हो, जो करना हो, उसे वाणी से कम और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने वाले आत्म-चरित्र द्वारा अधिक व्यक्त किया जाय। यों सभी अवतारों के अवतरण का प्रयोजन यही रहा है, पर भगवान राम और भगवान कृष्ण ने उसे अपने दिव्य चरित्रों द्वारा और भी अधिक स्पष्ट एवं प्रखर रूप में बहुमुखी धाराओं सहित प्रस्तुत किया है।

राम और कृष्ण की लीलाओं का कथन तथा श्रवण पुण्य माना जाता है। रामायण के रूप में रामचरित्र और भागवत के रूप में कृष्ण चरित्र प्रख्यात है। यों इन ग्रंथों के अतिरिक्त भी अन्य पुराणों में उनकी कथाएँ आती हैं। उनके घटनाक्रमों में भिन्नता एवं विविधता भी भी है। इनमें से किसी कथानक का कौन सा प्रसंग आज की परिस्थिति में अधिक प्रेरक है यह शोध और विवेचन का विषय है। यहाँ तो इतना जानना ही पर्याप्त है कि उपरोक्त दोनों ग्रंथ दोनों भगवानों के चरित्र की दृष्टि से अधिक प्रख्यात और लोकप्रिय हैं। उन्हीं में वर्णित कथाक्रम की लोगों को अधिक जानकारी है। 

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मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य -16

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=273भारतीय संस्कृति में मानवीय काया को एक सराय की एवं आत्मा को एक पथिक की उपमा दी गयी है। यह पंचतत्त्वों से बनी काया तो क्षणभंगुर है, एक दिन इसे नष्ट ही होना है किन्तु आत्मा नश्वर है। यह कभी नष्ट नहीं होती। गीताकार ने बड़ा स्पष्ट इस सम्बन्ध में लिखते हुए जन-जन का मार्गदर्शन किया है-

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे।

अर्थात् ‘‘यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योकि यह अजन्मा, नित्य सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।’’ 

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Thursday, 23 March 2017

The Astonishing Power Of Bio-Physical And Subtle Energies Of Human Body

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=187Human body is a wonderful creation of the supreme natural power. It is endowed with all the physical and conscious energy forms existing in the universe. The living system of human body can be identified as a grand magnet or as a moving electric powerhouse. The human-magnet through its vital energy can affect and get affected by others. An in-depth study and controlled utilization of such effects at (bio)physical and subtle levels offers challenging and important research problems in advanced science. The source of biomagnetism in our body gains energy from the earths gravitation similar to what the latter gains from the Sun. All the universal magnetic forces affect the biomagnetism of the human body. Vital energy levels of a person vary according to the biomagnetism of his/her body. The visible effects of reduction in this magnetic power are: dullness in eyes, spiritless face, dry skin and lethargic body. Feelings of oblivion, illusion and fatigue are common in people with weak biomagnetism. Elevated levels of biomagnetism on the other hand, give rise to corresponding increase in the general activeness, charm, enthusiasm, sound memory and intellect. Persons having more powerful biomagnetism naturally attract and influence the weaker ones. The reception of cosmic radiations by human-psyche is also characterized by the latters biomagnetic quality. The north pole of the human magnet is said to reside in the human brain. The formation of an aura (halo of light) around this vital organ is a result of an upward bioelectric flow near the subtle pole. The south pole of the human-magnet is situated near the genital organs. The sexual activities are controlled by the vital energy through this pole. Excessive stimulation of this pole results in severe loss of the vital energy 

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विश्व वसुधा जिनकि ऋणि रहेगी-५२

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=399परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से वाड्मय के इस खंड में इसी तरह के महामानवों के जीवन- प्रसंगों को लिया गया है ।। महामनीषी कल्लट, खलील जिब्रान, रवींद्रनाथ टैगोर, विष्णु शर्मा, दांते, बाबू गुलाब राय से लेकर शोपेन हॉवर, विलियम शेक्सपीयर, पियर्सन, रूसो, टॉल्स्टॉय आदि तक विश्व के मूर्द्धन्य दार्शनिक चिंतक मनीषी एवं विचार- क्रांति के द्रष्टा महामानवों के जीवन- चरित्रों को प्रथम अध्याय में स्थान दिया गया है ।। जन जागृति के प्रणेता युग मनीषियों को दूसरे अध्याय में लिया गया है ।। मानवी चिंतन चेतना को जाग्रत कर उसे निश्चित दिशा एवं गति प्रदान करने का कार्य जिन महामानवों ने किया है, उनमें से अधिकांश के हृदयोद्गार कविता की निर्झरिणी के रूप में प्रस्कुटित हुए हैं ।। महाकवि कालिदास, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई आदि से लेकर दांते, चंदवरदायी एवं निराला तक समय के पृष्ठों पर अग्नि- काव्य लिखने वाले साहित्यसाधको के व्यक्तित्व एवं कृतित्व आज भी जनमानस में रचे बसे हैं और उन्हें अनुप्राणित- उद्देलित करते रहते हैं ।। अर्नेस्ट जोन्स, पुश्किन, जाइगेर, इलियट, पाब्लोनेरूदा जैसे पाश्चात्य सद्ज्ञान साधकों के जीवन- प्रसंग भी जन- जाग्रति के प्रणेताओं में अग्रणी हैं ।।

परमपूज्य गुरुदेव का सदैव यही उद्देश्य रहा है कि सार्वभौम एकता एवं वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श साहित्य तक ही सीमित रहने से आगे बढ़कर जन- जन के व्यवहार में उतारा जाय और उसी एकता के आधार पर बाह्य एवं आंतरिक जीवन की सुख- शांति को उपलब्ध किया जाय ।। यही कारण है कि भारतीय समाज के प्राय समस्त धर्मग्रंथों- वेदों से लेकर पुराणों तक अंतकरण को झकझोरकर रख देने वाली मर्मस्पर्शी, सरल भाषा शैली में अनुवादित और प्रकाशित किए गए हैं ।। 

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मित्रभाव बढाने की कला

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=107मनुष्य सामाजिक प्राणी है । उसने इतना अधिक बौद्धिक एवं भौतिक विकास किया है, इसका कारण उसकी सामाजिकता ही है । साथ-साथ प्रेम पूर्वक रहने से आपस में सहयोग करने की भावना उत्पन्न होती है एवं मनुष्य अकेला के वल अपने बल-बूते पर कुछ अधिक उन्नति नहीं कर सकता, दूसरों का सहयोग मिलने से शक्ति की आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है, जिसके सहारे उन्नति साधन बहुत ही प्रशस्त हो जाते हैं । मैत्री से मनुष्यों का बल बढ़ता है । आगे बढ़ने का, ऊँचेउठने का, क्षेत्र विस्तृत हो जाता है । आपत्तियों और आशंकाओं का मैत्री के द्वारा आसानी से निराकरण किया जा सकता है । आंतरिक उद्वेगों का समाधान करने में संधि-मित्रता से बढ़कर और कोई दवानहीं है । आत्मा का स्वाभाविक गुण प्रेम है, प्रेम को परमेश्वर कहा जाता है । प्रेम के बिना जीवन में सरसता नहीं आती । यह संभव है जहाँ सुदृढ़ मैत्री हो । स्वास्थ्य, धन और विद्या के समान मैत्री भी आवश्यक है । परंतु दुःख की बात है कि बहुत से मनुष्य न तो मैत्री का महत्व समझते है और न उसके जमाने, मजबूत करने एवं स्थायी रखने के नियम जानते है । उन्हें जीवन भर में एक भी सच्चा मित्र नही मिलता । यह पुस्तक इसी उद्देश्य को लेकर लिखी गई है कि लोग मैत्री के महत्त्व को समझें, उसे सुदृढ़ बनायें तथा स्थाई रखने की कला को जानें और मित्रता से प्राप्त होने वाले लाभों के द्वारा अपने को सुसंपन्न बनाएँ । हमारा विश्वास है कि इस पुस्तक से जनता को लाभ होगा । 

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