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Tuesday, 7 February 2017

स्वास्थ्य रक्षा प्रकृति के अनुसरण से ही संभव

 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=542प्राकृतिक जीवन हर दृष्टि से निरापद

मानवी काया प्रकृति की सर्वोत्तम रचना है ।। इतना समर्थ और अद्भुत स्वसंचालित यंत्र संसार में दूसरा कोई नहीं हो सकता ।। अनावश्यक छेड़- छाड़ न की जाए स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आहार विहार के नियमों का ठीक प्रकार पालन भर कर लिया जाए तो इतने मात्र से शरीर को जीवन पर्यत स्वस्थ और निरोग रखा जा सकता है ।। मौसम में होने वाले हेर- फेर से कभी- कभी शरीर- संस्थान में भी व्यतिक्रम दिखाई पड़ता है ।। परिवर्तित परिस्थितियों से समायोजन स्थापित करने के लिए शरीर सचेष्ट होता है, सामाजिक शारीरिक असंतुलन इसलिए परिलक्षित होते हैं ।। शरीर- संस्थान में प्रविष्ट हुए विजातीय तत्त्वों के निष्कासन एवं परिशोधन के लिए भीतर की जीवनी शक्ति निरंतर प्रयत्नशील रहती है ।। इस शोधन- प्रक्रिया में कभी- कभी विभिन्न प्रकार के रोग भी उभरते हैं ।। ऐसे समय में हड- बडा कर तेज दवाओं की शरण में जाने की अपेक्षा थोड़ा धैर्य रखा जा सके, खान- पान में संयम बरता जा सके और प्रकृति को अपना काम स्वतंत्रता से करने दिया जाए तो कुछ ही समय में रुग्णता से छुटकारा मिल सकता है ।। आपत्तिकालीन परिस्थितियों की बात और है ।। जरूरी हो तो ही हल्की- फुल्की दवाएँ सामयिक राहत के लिए ली जा सकती हैं पर स्थायी उपचार की बात सोचनी हो तथा स्वस्थ एवं निरोग जीवन अभीष्ट हो तो प्रकृति के नियमों का ही परिपालन करना होगा ।।

प्रकृति संसार का सर्वोत्तम चिकित्सक है ।। विश्व के मूर्धन्य शरीरशास्त्रियो ने इस तथ्य को स्वीकार किया है ।। आधुनिक सभ्यता एवं कृत्रिम जीवनक्रम से जो प्राणी जितने दूर है, वे उतने ही स्वस्थ और निरोग हैं ।। 

 

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सात्विक जीवनचर्या और दीर्घायुष्य

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=541स्वास्थ्य रक्षा के नियमों में सभी सरल और स्वाभाविक हैं। उनमें न कोई कठोर है और न कष्ट साध्य। कठिन तो दुष्कर्म होते हैं। चोरी, उठाईगीरी, छल आदि दुष्कर्म करने के लिए असाधारण चतुरता और कुशलता की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु सच्चाई, ईमानदारी की राह पर चलना किसी अल्प बुद्धि वाले के लिए भी सरल है। इसी प्रकार प्रकृति प्रेरणा के अनुरूप जीवन- यापन पशु- पक्षी भी कर लेते हैं और आजीवन निरोग बने रहते हैं। सृष्टि के सभी जीवधारी जन्मते, बढ़ते, वृद्ध होते और मरते हैं, पर बीमार कोई नहीं पड़ता। अन्य पशु- पक्षियों में कदाचित ही कभी कोई रोगी देखा गया हो। संसार में एक ही मूर्ख प्राणी है, जो आए दिन बीमार पड़ता है, वह है -मनुष्य। उसके चंगुल में फँसे हुए पालतू पशु भी बीमार होते पाए जाते हैं। मनुष्य ही है जो स्वयं बीमार पड़ता है और अपने संपर्क अधिकार के अन्य प्राणियों को बीमार करता है। यह अभिशाप असंयम का- प्रकृति प्रेरणा के विपरीत आचरण करने का है। यदि कुचाल चलने की मूर्खता को छोड़ दिया जाय, तो सृष्टि के अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य के लिए सभी सक्षम और निरोग जीवनयापन नितांत सरल एवं संभव हो सकता है।

जब वह (कार्नेरी) मर रहा था, तो उसके ओंठ बुदबुदाए।

“आपका अन्तिम संदेश क्या है ?”

अटक-अटक कर लड़खड़ाते शब्दों में वे बोले- “जो मनुष्य मेरे आत्म अनुभूत जीवन के सात मूल मंत्रों के अनुसार जीवन संचालित करेगा, मेरा आशीर्वाद है कि वह कम से कम सौ साल की स्वस्थ्य जिन्दगी भोग कर सुखपूर्वक संसार से विदा होगा।

"आपके सात अनुभूत महामंत्र क्या हैं ?”

वे बोले - गिन लो और इन्हें भूलो मत । १. निसर्ग सामंजस्य, २. समय का संयम, ३. युक्त आहार , ४. परिष्कृत विचार, ५. पवित्र आचार , ६. पुरुषार्थ और ७. परोपकार ।

 

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संयम-हमारी एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता

संयम- हमारी एक आवश्यकता http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=749
राम- रावण का युद्ध का प्रथम दौर आरंभ हुआ ।। रावण ने अपने सर्वोच्च सेनापति मेघनाद को ही सबसे पहले लड़ने भेजा ।। वह मेघनाद जिस पर रावण के युद्ध का, उसकी विजय का पूरा- पूरा दारोमदार था ।। मेघनाद को आता देख राम पीछे हट गए और बोले, लक्ष्मण, तुम्हें ही मेघनाद से युद्ध करना है ।

कैसी विचित्र बात थी! अपार शक्तिशाली राम को पीछे क्यों हटना पड़ा मेघनाद से और अकेले लक्ष्मण को ही क्यों उसका सामना करने भेजा ? इसका स्पष्टीकरण करते हुए राम ने ही कहा है, "लक्ष्मण, मेघनाद बारह वर्ष से तप कर रहा है, ब्रह्मचारी है और तुमने चौदह वर्षों से स्त्री का मुँह तक नहीं देखा ।। मेरे साथ रहकर तपस्वी, संयमी जीवन बिताया ।। इसलिए तुम ही मेघनाद को हरा सकते हो ।। मैं तो गृहस्थ हूँ।" और सचमुच लक्ष्मण ही उसे हरा सके ।। मेघनाद को इंद्रजीत कहा जाता है ।। इसका तात्पर्य वस्तुत: अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने से है ।।

पितामह भीष्म के बारे में कौन हिंदू जानता न होगा ।। महाभारत का वह घनघोर युद्ध जिसमें श्रीकृष्ण को भी अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी, उनके समक्ष ।। हनुमान से लेकर महर्षि दयानंद, विवेकानंद तथा बहुत से महापुरुष संसार में जो कुछ कार्य कर सके, उसका मूल आधार उनका संयमी ब्रह्मचर्यपूर्ण जीवन ही था।। स्वयं महात्मा गांधी का जीवन उस समय से प्रकाश में आया, जब से उन्होंने अखंड संयम, ब्रह्मचर्य की धारणा की ।।

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मद्यपान असमय मृत्यु का कारण

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=806शराब का घूंट हलक से नीचे उतरते ही आमाशय की श्लेष्मा झिल्ली से छेड़छाड़ करती है और खून में मिलकर मस्तिष्क तक पहुंच जाती है । मस्तिष्क में पहुंचने के लिए पांच मिनट से भी कम समय लगता है और वहां पहुंचते ही वह मस्तिष्क के उन भागों को निष्किय कर देती है जो विचार, विश्लेषण और निर्णय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाहते हैं । मदिरा का जो अंश मस्तिष्क को चेतना शून्य बनाता और नशा देता है, उसे इथाइल अल्कोहल कहते हैं । यह विशुद्ध रूप से बेहोश करने वाला तत्व है । जब शराब के माध्यम से अल्कोहल मस्तिष्क में पहुंचता है और उसे विचार तथा विवेकशून्य बना देता है । 

 

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बाल रोगों की चिकित्सा

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=875यों तो इस जमाने में घर- घर बीमारियों की धूम है परंतु बीमारों में अधिक संख्या बालकों की ही देखी जाती है।। बड़ी आयु का मनुष्य तो रोगों के धक्कों को किसी हद तक बरदाश्त कर लेता और उनसे सामर्थ्य भर लड़कर अपने स्वास्थ्य की रक्षा भी करता है, पर छोटे बालक अपनी कमजोरी के कारण इतना सब नहीं कर पाते, जिससे वे आसानी से रोगग्रस्त हो जाते हैं।। फिर उनमें शक्ति भी नहीं होती कि रोग के आक्रमण से संघर्ष करके बीमारी को दूर भगा सकें ।। इसलिए बालक अकसर बीमार पड़ते हैं और अनेक बार उन्हें जीवन से हाथ धोना पड़ता है ।।

जहाँ वैद्य, डॉक्टरों की आसानी से पहुँच नहीं हो पाती, उन लोगों की सुविधा के लिए इस पुस्तक में कुछ ऐसे नुसखे संग्रहीत किए हैं जो बीमार बालकों को निरोग बनाने में सहायता दे सकें ।। रोग को और बालक की शक्ति देखकर यदि इस पुस्तक के आधार पर चिकित्सा की जावे, तो हमारा विश्वास है कि स्वल्प साधन संपन्न व्यक्ति भी अपने बालकों को बीमारी के चंगुल से छुड़ा सकते हैं ।।

जो लोग चिकित्सा व्यवसाय करते हैं, उनके लिए भी इस पुस्तक में अच्छी जानकारी है।। वे इन नुसखों के आधार पर अपनी सेवा- प्रणाली को अधिक सूक्ष्म बना सकेंगे ।। हमारी धारणा है कि यह पुस्तक बालकों के लिए एक अच्छे अभिभावक की भांति उपयोगी सिद्ध होगी ।। 

 

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Sunday, 5 February 2017

प्रायोगिक वनौषधि-विज्ञान

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=871जिस भोगवादी युग में आज हम जी रहे हैं, मनुष्य का रोगी होना स्वाभाविक है ।। कभी व्यक्ति नैसर्गिक जीवन जीता था, प्रकृति के साहचर्य में परिश्रम से युक्त जीवनचर्या अपनाता था, रोगमुक्त जीवन एक सामान्य बात मानी जाती थी ।। रोजमर्रा की जिन्दगी में तब ऐसे तत्त्वों का समावेश था, जिनसे व्यक्ति के जीवन का उल्लास सहज ही अभिव्यक्त होता था ।। हमारी संस्कृति में प्रत्येक दिन एक पर्व- त्यौहार के रूप में माना जाता रहा है ।। इसी कारण आनंद हर क्षण झरता रहता था ।। यही कारण था कि मानव तनाव ग्रस्त भी नहीं होता था ।। आज की जीवन पद्धति दूषित, असांस्कृतिक कृत्रिम एवं यांत्रिकता से युक्त है ।। जीने की शैली आधुनिकता के साधनों के बाहुल्य के कारण कुछ ऐसी हो गयी है कि उसमें शरीर को श्रम अधिक नहीं करना पड़ता- मन कुछ जरूरत से ज्यादा ही तनाव से युक्त रहता है एवं यह एक वास्तविकता है कि बहुत से व्यक्ति जीवन जीने की कला से परिचित नहीं हैं ।। यही कारण है कि ये अनगढ़ की तरह जीवन जीते देखे जाते हैं एवं अकारण रोगों के शिकार हो संश्लेषित पद्धति पर आधारित आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के शिकार हो कर धन तो गँवाते ही हैं, साथ ही स्वास्थ्य जैसी अमूल्य निधि भी गँवा बैठते हैं ।।

परम पूज्य गुरुदेव ने " आयुर्वेद " को अपने मूल रूप में पुनर्जीवित कर इसे सार्वजनीन - सर्वसुलभ बनाया है ।। आयुर्वेद आयुष्य को नीरोग रूप में दीर्घ बनाए रखने का विज्ञान है।। यह आहार- विहार के नियमों- उपनियमों से लेकर अपनी प्राकृतिक रूप में पायी जाने वाली वनौषधियों द्वारा रोगों के मूल तक पहुँचकर उनकी चिकित्सा करना सिखाता है।। 

 

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पंच तत्वों द्वारा संपूर्ण रोगों का निवारण

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• पंचतत्वों द्वारा-संपूर्ण रोगों का निवारण
• मिट्टी का उपयोग
• अग्नि द्वारा आरोग्य
• वाष्प चिकित्सा
• शारीरिक ताप द्वारा सेंक
• अग्नि उपासना
• जल चिकित्सा
• वायु चिकित्सा
• आकाश-चिकित्सा
• ' भावना मंत्र '
• पंचतत्वों की दैनिक साधना
• पंचतत्व चिकित्सा का समन्वय






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जडी बूटी चिकित्सा एक संदर्शिका

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=530प्रकृति ने मनुष्य के लिए हर वस्तु उत्पन्न की है । औषधि उपचार के लिए जड़ी-बूटियों भी प्रदान की हैं । इस आधार पर चिकित्सा को सर्वसुलभ, प्रतिक्रियाहीन तथा सस्ता बनाया जा सकता है । जड़ी-बूटी चिकित्सा बदनाम इसलिए हुई कि उसकी पहचान भुला दी गई-विज्ञान झुठला दिया गया । सही जड़ी-बूटी उपयुक्त क्षेत्र से, उपयुक्त मौसम में एकत्र की जाए उसे सही ढंग सें रखा और प्रयुक्त किया जाए तो, आज भी उनका चमत्कारी प्रभाव देखा जा सकता है ।

युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य के आशीर्वाद से, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान ने इस दिशा में सफल शोध-प्रयोग किए हैं । गिनी-चुनी जड़ी-बूटियों से लगभग ८० प्रतिशत रोगों का उपचार सहज ही किया जा सकता है । ऐसी सरल, सुगम, सस्ती परंतु प्रभावशाली चिकित्सा-पद्धति जन-जन तक पहुँचाने के लिए यह पुस्तक प्रकाशित की गई है । जड़ी-बूटियों की पहचान, गुण, उपयोग- विधि सभी स्पष्ट रूप से समझाने का प्रयास किया गया है ।

इस पुस्तक में ऐसी जडी़-बूटियों को प्राथमिकता दी गई है, जो भारत में अधिकांश क्षेत्रों में पाई जाती हैं अथवा उगाई जा सकती हैं । आचार्यवर की इच्छा है कि यह विधा विकसित हो और रोग निवारण के साथ-साथ जन-जन को प्राण शक्ति संवर्द्धन का लाभ भी प्राप्त हो । ऋषियों द्वारा विकसित इस विधा का लाभ पुन: जन-जन को मिले । 

 

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गमलों में स्वास्थ्य

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=872आयुर्वेद का पुनरुद्धार शांतिकुंज हरिद्वार के तत्त्वावधान में संचालित ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का एक अभिनव प्रयास है ।। ऋषि युग्म पं० श्रीराम शर्मा आचार्य एवं वंदनीया माताजी के सूक्ष्म संरक्षण में संचालित इस अभियान का एकमात्र उद्देश्य जनमानस को नैसर्गिक जीवन की मुख्य धारा से जोड़ना है ।। इस मुख्य धारा से जुड़े स्वस्थ नागरिक ही वर्तमान विभीषिकाओं से मोर्चा लेकर "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" के नीति वाक्यों को व्यावहारिक जीवन में चरितार्थ कर सकने में समर्थ हो पाएँगे ।। ऐसी स्थिति में जीवनी शक्तिवर्धक इस विधा से जनसामान्य का परिचित होना नितांत आवश्यक है ।।

हमारा ऋषितंत्र प्राचीनकाल से ही वृक्ष- वनस्पतियों में अंतर्निहित तत्त्वों के माध्यम से जनमानस को समग्र स्वास्थ्य के राजमार्ग पर अग्रसर करता रहा है ।। कालांतर में बृहत्तर भारत में समाविष्ट अन्यान्य संस्कृतियों के साथ- साथ विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों का प्रचलन भी स्वाभाविक रूप से जनसमाज का एक अभिन्न अंग बन गया ।।

समाज के विकास के साथ- साथ मनुष्य की बौद्धिक क्षमता में वृद्धि हुई, निदान के अत्याधुनिक उपाय भी खोज लिए गए ।। मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव डालने वाले जीवाणुओं- विषाणुओं की तत्काल पहचान कर उनके त्वरित निराकरण की पद्धतियाँ भी ढूँढ़ निकाली गयीं, परंतु स्वास्थ्य लाभ की आवेशपूर्ण जल्दबाजी ने मानव समाज को आधुनिक औषधियों का गुलाम बनाकर हमारे चिंतन में दूरगामी विवेकशीलता के अभाव का ही परिचय दिया ।। 

 

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आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=880जीवन रोगों के भार और मार से बुरी तरह टूट गया है ।। जब तन के साथ मन भी रोगी हो गया हो, तो इन दोनों के योगफल के रूप में जीवन का यह बुरा हाल भला क्यों न होगा ? ऐसा नहीं है कि चिकित्सा की कोशिशें नहीं हो रही ।। चिकित्सा तंत्र का विस्तार भी बहुत है और चिकित्सकों की भीड़ भी भारी है ।। पर समझ सही नहीं है ।। जो तन को समझते हैं, वे मन के दर्द को दरकिनार करते हैं ।। और जो मन की बात सुनते हैं, उन्हें तन की पीड़ा समझ नहीं आती ।। चिकित्सकों के इसी द्वन्द्व के कारण तन और मन को जोड़ने वाली प्राणों की डोर कमजोर पड़ गयी है ।।

पीड़ा बढ़ती जा रही है, पर कारगर दवा नहीं जुट रही ।। जो दवा ढूँढी जाती है, वही नया दर्द बढ़ा देती है ।। प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में से प्राय: हर एक का यही हाल है।। यही वजह है कि चिकित्सा की वैकल्पिक विधियों की ओर सभी का ध्यान गया है ।। लेकिन एक बात जिसे चिकित्सा विशेषज्ञों को समझना चाहिए उसे नहीं समझा गया ।। समझदारों की यही नासमझी सारी आफतो- मुसीबतों की जड़ है ।। यह नासमझी की बात सिर्फ इतनी है कि जब तक जिन्दगी को सही तरह से नहीं समझा जाता, तब तक उसकी सम्पूर्ण चिकित्सा भी नहीं की जा सकती ।। 

 

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Friday, 3 February 2017

असंयम बनाम आत्मघात

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=881कुछ अपंग, अविकसित अपवादों को छोड़कर प्राय: सभी मनुष्य एक जैसी स्थिति में उत्पन्न होते हैं ।। आरोग्य से लेकर जीवन के अनेकानेक क्षेत्रों में दृढ़ता एवं प्रगति की सफलताएँ तो मनुष्य की अपनी गतिविधियों पर निर्भर रहती हैं।। अपना आरोग्य यदि पिछड़ा या बिगड़ा हुआ है तो उसके लिए परिस्थितियों को दोष देते रहने से काम नहीं चलेगा ।। अपना उत्तरदायित्व स्वीकार करना पड़ेगा, कहीं अपने से ही भूल होती है या होती रही है, अपने पैर कल्हाडी मारने से ही यह जख्म हुआ है ।। ऐसा दूसरा कोई पास में दीखता नहीं जिसके कारण इतनी इमारत खोखली होती ।। आँख बंद किये रहें तो बात दूसरी है, अन्यथा पलक खोलकर देखने पर वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जाती है और वह छिद्र स्पष्ट दीखता है, जिसमें होकर इस नाव में पानी भरा है और वह डूबने के करीब जा पहुँची है ।। अपनी ही बुरी आदतें है जिनसे घुन की तरह इस मजबूत शरीर को खोखला करके रख दिया है ।। यदि अपनी भूलें स्वास्थ्य की बर्बादी का कारण समझ में आ सके और उनका पश्चात्ताप हो तो प्रायश्चित एक ही है कि जो हो चुका है उसे सुधारने के लिए उतनी ही हिम्मत के साथ कदम बढ़ाए जाएँ जितने उत्साह से निराशा के पथ पर बढ़ने में उत्साह दिखाया गया है ।। 

 

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अक्षुण्ण स्वास्थ्य प्राप्ति हेतु शास्वत राजमार्ग

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=873समझदारी का सदुपयोग यह है कि उसके सहारे सीधा रास्ता तलाश किया जाए और ऊँचा उठने, आगे बढ़ने में उपलब्ध शक्तियों को नियोजित किया जाए । इसके विपरीत यदि समझदारी कुचक्र रचने लगे, विनाश पर उतरे, उल्टे रास्ते चले तो उससे हानि ही हानि है। इससे तो वे नासमझ अच्छे जो कछुए की तरह धीमी चाल चलते, लक्ष्य का ध्यान रखते और उछलने वाले खरगोश से आगे निकलकर बाजी जीतते हैं ।

मनुष्य की तुलना में इस दृष्टि से वे पशु अधिक समझदार हैं जिन्होंने प्रकृति मर्यादाओं को अपनाए रखा है और मनुष्य के नागपाश तथा प्रकृति प्रकोप का सामना करते हुए भी अपना अस्तित्व बनाए रखा है । जो इन साधन रहित परिस्थितियों में भी मात्र अपनी काय प्रकृति प्रेरणा और कठोर श्रम करने पर संभव हो सकने वाली निर्वाह व्यवस्था भर से काम चलाते और सुख-चैन की जिंदगी जीते हैं । एक मनुष्य है जो विपुल वैभव का अधिष्ठाता होते हुए भी आए दिन ऐसे त्रास सहता है जैसे पुराणों में यमदूतों द्वारा नरक क्षेत्र में पहुँचने पर दिए जाने का उल्लेख है । होना यह चाहिए था कि सृष्टा के इस सुरम्य उद्यान में मनुष्य शरीरधारी देवोपम स्तर का निर्वाह करता और अपने प्रभाव क्षेत्र को स्वर्ग में अवस्थित नंदन वन जैसा सुरम्य बनाकर रखता । पर दुर्भाग्य को देखा जाए, ठीक उल्टी स्थिति में उसे दिन गुजारने पड़ रहे हैं । 

 

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Extrasensory Potentials Of The Mind

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=13The present book has brought in-depth details on the myths and realities of the extrasensory perceptions, supramental talents and supernormal experiences. It is compiled from the translation of the Chapter 6 of the Volume 18 of Pt. Shriram Sharma Acharya Vangmaya series. The author has thoroughly attended to multiple aspects of the cosmic evolution of consciousness in the human body, spiritual transmutation of hidden intellect and activation of the extrasensory power centers like the sahastrara cakra and the ajna cakra by different kinds of yoga sadhanas with adept guidance. He has also discussed — along with evidential examples — the possibilities of sudden arousal of supernatural faculties because of the intrinsic mental tendencies and spiritual assimilation since past live(s), and the use of hypnotism and yoganidra in psychic healing, understanding the complexities of human mind and awakening of latent talents.

Several sections are devoted here to the riddles of Nature posed by the mysterious experiences ranging from —the recurrence of past events at specific places, sudden appearance of a ruined kingdom, etc, to — the esoteric existence of siddha pithas (aroused hermitages) in the impregnable domains of the Himalayas, journey of the other worlds through the black holes, etc.

The author provides a marvelous combination of rare information and references from the ancient scriptures and modern scientific research findings. The ample collection of authentic examples on each topic adds to the lucidity and liveliness of the book. 

 

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Thursday, 2 February 2017

चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क -18

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=185मानवीय काया अपने आम में एक अजूबा है। इस भगवत्संरचना के एक-एक भाग को देखकर आश्चर्य चकित होकर रह जाना पड़ता है कि किस कुशलता से उस नियन्ता ने इसे विनिर्मित किया होगा। मानवीय काया में जिसे सर्वोच्य व शीर्ष स्थान प्राप्त है तथा जिसकी सक्रियता-निष्क्रियता पर ही सुन्दर काय कलेवर की सार्थकता है, वह है मानवीय मस्तिष्क जिसे प्रत्यक्ष कल्प वृक्ष, भानुमती का पिटारा, जादुई कम्प्यूटर आदि अनेकानेक उपाधियाँ दी गयी हैं। इस मस्तिष्क का ही चमत्कार है कि शरीर की दृष्टि से मनुष्य यदि कुछ उन्नीस भी है अथवा उसके साथ कोई जन्मजात से लेकर दुर्घटना जन्य विकलांगता जुड़ी हुई है तो भी मस्तिष्क की प्रखरता बनी रहने पर वह बहुत कुछ बुद्धि कौशल संबंधी कार्य संपादित कर सकता है, करा सकता है। मस्तिष्कीय कौशल पर ही मानव की सारी लौकिक-पारलौकिक सफलताएँ, ऋद्धि-सिद्धियाँ टिकी हुई है। यदि मनुष्य अपने पर बहुमूल्य अनुदान को सही ढंग से साध लेता है तो वह दुनियाँ में जो चाहे, वह हस्तगत कर सकता है। 

 

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गायत्री की शक्ति और सिद्धि

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=36संसार में जितना भी वैभव, उल्लास दिखाई पड़ता है या प्राप्तकिया जाता है वह शक्ति के मूल्य पर ही मिलता है । जिसमें जितनी क्षमता होती है वह उतना ही वैभव उपार्जित कर लेता है । जीवन में शक्ति का इतना महत्वपूर्ण स्थान है कि उसके बिना कोई आनन्द नहीं उठाया जा सकता । यहाँ तक कि अनायास उपलब्ध हुए भोगों को भीनही भोगा जा सकता । इंद्रियों में शक्ति रहने तक ही विषम भोगों का सुक्ष प्राप्त किय जा सकता है । ये किसी प्रकार अशक्त हो जाँय तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय और घृणास्पद लगते है । नाड़ी संस्थान की क्षमता क्षीण हो जाय तो शरीर का सामान्य क्रिया कलाप भी ठीक तरह नहीं चल पाता । मानसिक शक्ति घट जाने पर मनुष्य की गणना विक्षिप्तों और उपहासास्पदों में होने लगती है । धनशक्ति न रहनेपर दर-दर का भिखारी बनना पड़ता है । मित्रशक्ति न रहने पर एकाकी जीवन सर्वथा निरीह और निरर्थक होने लगता है । आत्मबल न होने पर प्रगति के पथ पर एक कदम भी यात्रा नहीं बढ़ती । जीवनो द्देश्य की पूर्ति आत्मबल से रहित व्यक्ति के लिए सर्वथा असंभवही है ।

अतएव शक्ति का संपादन भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने के लिए नितांत आवश्यक है । इसके साथ यह भी जान ही लेना चाहिए कि भौतिक जगत में पंचभूतों को प्रभावित करने तथा आध्यात्मिक, विचारात्मक, भावात्मक और संकल्पात्मक जितनी भी शक्तियाँ है उन सब का मूल उद्गम एवं असीम भण्डार वह महत्तत्व ही है जिसे गायत्री के नाम से संबोधित किया जाता है । भारतीय मनीषियों ने विभिन्न शक्तियों को देव नामों से संबोधित किया है । यह समस्त देव शक्तियाँ उस परम् शक्ति की किरणें ही हैं उनका अस्तित्व इस महत्व के अन्तर्गत ही है । 

 

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The Astonishing Power Of Bio-Physical And Subtle Energies Of Human Body

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=187Human body is a wonderful creation of the supreme natural power. It is endowed with all the physical and conscious energy forms existing in the universe. The living system of human body can be identified as a grand magnet or as a moving electric powerhouse. The human-magnet through its vital energy can affect and get affected by others. An in-depth study and controlled utilization of such effects at (bio)physical and subtle levels offers challenging and important research problems in advanced science. The source of biomagnetism in our body gains energy from the earths gravitation similar to what the latter gains from the Sun. All the universal magnetic forces affect the biomagnetism of the human body. Vital energy levels of a person vary according to the biomagnetism of his/her body. The visible effects of reduction in this magnetic power are: dullness in eyes, spiritless face, dry skin and lethargic body. Feelings of oblivion, illusion and fatigue are common in people with weak biomagnetism. Elevated levels of biomagnetism on the other hand, give rise to corresponding increase in the general activeness, charm, enthusiasm, sound memory and intellect. Persons having more powerful biomagnetism naturally attract and influence the weaker ones. The reception of cosmic radiations by human-psyche is also characterized by the latters biomagnetic quality. The north pole of the human magnet is said to reside in the human brain. The formation of an aura (halo of light) around this vital organ is a result of an upward bioelectric flow near the subtle pole. The south pole of the human-magnet is situated near the genital organs. The sexual activities are controlled by the vital energy through this pole. Excessive stimulation of this pole results in severe loss of the vital energy 

 

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Human Brain Apparent Boon Of The Omnipotent

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=209The living state of a human body consists of the five basic elements called Pancha Tatvas and the five basic streams of vital force called Pancha Prana. The Pancha Tatvas constitute the physical body and the Pancha Prana create the mental (subtle) body. The flow of electricity in a circuit is generated by the connection of the two complementary, positive and negative types of currents. The life cycle of a human being also continues to revolve with the help of the two wheels of the physical and mental bodies. The collective contribution of these components is unparalleled in nature.

The known, as well as the undeciphered, structural and functional features of the human body are enormous. Deeper analysis of these brings out more and more amazing results and shows newer layers of mysteries in this splendid action of the Almighty. The structural complexity, functional adaptability and potentials of different sense organs give a glimpse of the magnificent systems that could be constructed in the Jada (material) part of nature. 

 

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यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया- 26

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=264यज्ञ- प्रक्रिया को अपने संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में प्रतिपादित कर वाड्मय के इस खण्ड में परमपूज्य गुरुदेव ने बड़े विस्तार से यज्ञोपचार की प्रक्रिया की व्याख्या की है ।। यज्ञ एक सर्वांगपूर्ण उपचार पद्धति है- पर्यावरण संशोधन के लिए, सूक्ष्म जगत में संव्याप्त प्रदूषण मिटाने के लिए तथा मानव की स्थूल- सूक्ष्म हर स्तर पर चिकित्सा करने के लिए ।। सविता देवता की उपासना गायत्री महामंत्र का प्राण है एवं उसी सविता को समर्पित आहुतियाँ किस प्रकार अपनी मंत्र शक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा के समन्वित स्वरूप के माध्यम से होता को लाभ पहुँचाती है, यही यज्ञोपचार प्रक्रिया है ।। आत्मसत्ता पर छाये कषाय- कल्मषों की सफाई से लेकर- गुणसूत्रों, क्रोमोसोम्स जीन्स तक पर यज्ञ प्रक्रिया प्रभाव डालती है एवं इसमें किस प्रकार यज्ञ कुण्ड एक यंत्र की भूमिका निभाकर वृहत सोम के अवतरण द्वारा सोम की- पर्जन्य की वर्षा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, इसका वैज्ञानिक आधार क्या है, ज्यामिती किस प्रकार यज्ञधूम्रों की बहुलीकरण प्रक्रिया को प्रभावित करती है, यह सारा प्रतिपादन इस खण्ड में हुआ है ।।

यज्ञाग्नि व सामान्य अग्नि में अन्तर है ।। परमपूज्य गुरुदेव ने "यज्ञोपैथी" के नाम से एक नूतन चिकित्सा पद्धति जो भविष्य की उपचार पद्धति बनने जा रही है, को जन्म देकर वस्तुत: वैदिक विज्ञान के मूल आधार को पुनर्जीवित किया है ।। यज्ञों से रोग निवारण में समिधाओं, शाकल्य तथा मंत्रों का चयन कैसे किया जाता है, यह पूरी प्रक्रिया अपने में एक समग्र विज्ञान है ।। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि पृथ्वी तत्त्व का पंचभूतों से बनी इस काया में प्राधान्य है तथा पृथ्वी सदा वायु से गंधों का शोषण करती रहती है ।। 

 

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Sunday, 29 January 2017

Applied Science Of Yagya For Health And Environment

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=316Yagya-therapy is an ancient method of herbal/plant medicinal treatment derived from the. Vedic texts. In yagya natural herbal/plant products are processed in fire and medicinal vapors, gases and photo chemicals are released. It is basically an inhalation therapy that promises wider healing applications without any risk, of side effects or drug-resistance. It is cost effective and natural and provides added benefits of purifying the environment and balancing the Eco-system.

This book aims to introduce the readers to the ancient knowledge and modern scientific findings on yagya (fire-ritual) with special focus on preventive and therapeutic applications for holistic healthcare. It also presents detailed information and guidelines for yagya-threapy of several diseases and disorders — including the dreaded ones like Cancer and AIDS — that have challenged the world today.

Yagya Therapy –The key to Holistic Health

Yagya Therapy is an ethno-botanical inhalation therapy derived from the ancient Medical Science of India, The multiple benefits of yagya experiments include purification of atmospheric environment and healthy fertilization of the soil. Scientific validity and technical evaluation of this Vedic ritual in recent times indicate its enormous potential for reducing air-water pollution and for agricultural and therapeutic applications. 

 

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चेतन ,अचेतन एवं सुपर चेतन मन

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=186मानवी काया एक विलक्षणताओं का समुच्चय है । यदि इस रहस्यमय अद्भुत कायपिंजर को समझा जा सके व तदनुसार जीवन-साधना सम्पन्न करते हुए अपने जीवन की रीति-नीति बनायी जा सके तो व्यक्तित्त्व सम्पन्न, ऋद्धि-सिद्धि सम्पन्न बना जा सकता है । इसके लिए अपने स्वयं के मन को ही साधने की व्यवस्था बनानी पड़ेगी । यदि यह सम्भव हो सके कि व्यक्ति अपने चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मस्तिष्कीय परतों की एनाटॉमी समझकर तदनुसार अपना व्यक्तित्त्व विकसित करने की व्यवस्था बना ले तो उसके लिए सब कुछ हस्तगत करना सम्भव है । यह एक विज्ञान सम्मत तथ्य है, यह मानवी मनोविज्ञान को समझाते हुए पूज्यवर बडे़ विस्तार से इस गूढ़ विषय को विवेचन करते इसमें पाठकों को नजर आयेंगे । मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार रूपी अन्त: करण चतुष्टय की सत्ता से हमारा निर्माण हुआ है । यदि विचारों की व्यापकता और सशक्तता का स्वरूप समझा जा सके व तदनुसार अपने व्यक्तित्त्व के निर्माण का सूत्र समझा जा सके तो इस अन्त करण चतुष्टय को प्रखर, समर्थ और बलवान बनाया जा सकता है ।

यदि अचेतन का परिष्कार किया जा सके, आत्महीनता की महाव्याधि से मुक्त हुआ जा सके, तो हर व्यक्ति अपने विकास का पथ स्वयं प्रशस्त कर सकता है । उत्कृष्टता से ओतप्रोत मानवी सत्ता ही मनुष्य के वैचारिक विकास की अन्तिम नियति है । यदि चिन्तन उत्कृष्ट स्तर का होगा तो कार्य भी वैसे बन पड़ेंगे एवं मानव से महामानव, चेतन से सुपरचेतन के विकास की, अतिचेतन के विकास की आधारशिला रखी जा सकेगी। 

 

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