Saturday, 7 May 2016

गहना कर्मणोगति (कर्मफल का सुनिश्चित सिद्धांत्)

निःसंदेह कर्म की गति बड़ी गहन है । धर्मात्माओं को दुःखपापियों को सुख, आलसियों को सफलता, उधोगशीलों को असफलता, विवेकवानों पर विपत्ति, के यहाँ संपत्ति, दंभियोंको प्रतिष्ठा, सत्यनिष्ठों को तिरस्कार प्राप्त होने के अनेक उदाहरण इस दुनियाँ में देखे जाते हैं कोई जन्म से ही वैभव लेकर पैदा होते हैं, किन्हीं को जीवन भर दुःख ही दुःख भोगने पड़ते हैं? सुख और सफलता के जो नियम निर्धारित हैं, वेसर्वाश पूरे नहीं उतरते ।

इन सब बातों को देखकर भाग्य, ईश्वर की मर्जी, कर्म कीगीत के संबंध में नाना प्रकार के प्रश्न और संदेहों की झड़ी लगजाती है । इन संदेहों और प्रश्नों का जो समाधान प्राचीन पुस्तकों में मिलता है, उससे आज के तर्कशील युग में ठीक प्रकार समाधान नहीं होता । फलस्वरूप नई पीढी, उन पाश्वात्य सिद्धांतोंकी ओर झुकती जाती है, जिनके द्वारा ईश्वर और धर्म को ढोंग और मनुष्य को पंचतत्त्व निर्मित बताया जाता है एवं आत्मा के अस्तित्व से इंकार किया जाता है कर्म फल देने की शक्ति राज्यशक्ति के अतिरिक्त और किसी में नहीं है ईश्वर और भाग्य कोई वस्तु नहीं है आदि नास्तिक विचार हमारी पीढ़ी में घर करते जा रहे हैं

इस पुस्तक में वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण से कर्मकी गहन गति पर विचार किया गया है और बताया गया है किजो कुछ भी फल प्राप्त होता है, वह अपने कर्म के कारण ही है । हमारा विचार है कि पुस्तक कर्मफल संबंधी जिज्ञासाओं का किसी हद तक समाधान अवश्य करेगी |

 
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Thursday, 5 May 2016

Thought Revolution

Preface

The subject of this discourse is the root cause and the solution of the crisis of our times. Because the results of our actions will match the level of our desires, we must conclude that it is the level of our consciousness that created the unfavorability of the circumstances within which we now live.
-Acharya Shriram Sharma

Part of what it means to be alive at the beginning of the 21st Century is bearing the burden of the awareness that the ecosystem of our planet, the web of life upon which we depend, is in jeopardy. To live in an authentic way today, we are required to integrate the reality of global crisis, not only into our consciousness and understanding, but also into our lifestyles, economies and social structures. Needless¬to-say, this integration will not be easy.

Coming to terms with the state of our global health is not easy due to the force of our momentum towards a lifestyle that willfully denies it.

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Old And New Herbal Remedies


Preface

Yoga and Herbal Therapy have become subject matters of common curiosity and pursuit for those caring for sustenance of good health by inexpensive and natural means and also for those who have suffered side-effects of antibiotics or in general, the lacunae of modern science of medicine. While a lot of training courses and dedicated schools on yoga are helping people across the globe, the scientific testing and implementation of herbal therapies are still confined to research labs and few pharmaceutical companies. Ayurveda is known to be the origin of herbal therapeutic science. Most importantly, the fact that its prescription is risk-free and does not generate any negative or suppressive effects on other kinds of medicaments or modes of treatments that might be used simultaneously makes it an excellent complementary mode of healing.

More and more people are getting interested these days in knowing about easy but effective modes of herbal remedies these days. Our major objective in presenting this new book on herbal remedies is to provide useful, authentic and innovative information in this direction. The main focus is laid on the use of Himalayan herbal medicines based on first of its land research carried out at the Brahmvarchas Research Center, Shantikunj, Hardwar (India). Thousands of people have been benefited from this therapy and got rid of diseases of different types and severity. Rare knowledge from the scriptures will be presented here.
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Wednesday, 4 May 2016

आत्मा न नारी है न नर

Preface

मनुष्य की मूल सत्ता न शरीर है और न उसकी इच्छाएँ - आकांक्षाएँ ।। बल्कि आत्मा ही मनुष्य का मूल स्वरूप है ।। यह आत्मा न किसी प्राणी में कोई अतिरिक्त विशेषताएँ लिये रहता है, न कोई न्यूनताएँ ही ।। आत्मा की सभी विशेषताएँ समान रूप से सभी प्राणियों में विद्यमान रहती हैं और वह अपने मूल स्वरूप में रहता हुआ ही विभिन्न शरीर धारण करता है ।।

विशेषता और अविशेषता की दृष्टि से आत्मा में इतना भी भेद नहीं है कि उसका लिंग की दृष्टि से कोई निर्धारण किया जा सके ।। संस्कृत में आत्मा शब्द नपुंसक लिंग है, इसका कारण यही है आत्मा वस्तुत: लिंगातीत है ।। वह न स्त्री है, न पुरुष ।।

आत्म तत्त्व के इस स्वरूप का विश्लेषण करते हुए प्राय: प्रश्न उठता है कि आत्मा जब न स्त्री है और न पुरुष, तो फिर स्त्री या पुरुष के रूप में जन्म लेने का आधार क्या है ?

इस अंतर का आधार जीव से जुड़ी मान्यताएँ ही है ।। जीव चेतना भीतर से जैसी इच्छा करती है, वैसे संस्कार उसमें गहरे हो जाते हैं ।। अपने प्रति जो मान्यता दृढ़ हो जाती है, वही व्यक्तित्व रूप में प्रतिपादित होती है ।। ये मान्यताएँ स्थिर नहीं रहती ।। फिर भी सामान्यत: इनमें एक दिशाधारा का सातत्य रहता है ।। किसी विशेष अनुभव की प्रतिक्रिया से मान्यताओं में आकस्मिक परिवर्तन भी आ सकता है या फिर सामान्य क्रम में धीरे- धीरे क्रमिक परिवर्तन भी होता रह सकता है ।।

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Table of content

1. आत्मा न स्त्री है, न पुरुष
2. चाहें तो नर बन जाएँ चाहें तो नारी
3. एक ही शरीर में विद्यमान नर और नारी
4. अमैथुनी सृष्टि होती है, हो सकती है
5. गर्भस्थ शिशु का इच्छानुवर्ती निर्माण
6. ब्रह्मचर्य से शक्ति और संचम द्वारा प्रसन्नता
7. संयम अर्थात् शक्ति अर्थात् समर्थता

शिष्य संजीवनी

Preface

प्रत्येक साधक की सर्वमान्य सोच यही रहती है कि यदि किसी तरह सदगुरु कृपा हो जाय तो फिर जीवन में कुछ और करना शेष नहीं रह जाता है । यह सोच अपने सारभूत अंशों में सही भी है । सदगुरु कृपा है ही कुछ ऐसी-इसकी महिमा अनन्त- अपार और अपरिमित है । परन्तु इस कृपा के साथ एक विशिष्ट अनुबन्ध भी जुड़ा हुआ है । यह अनुबन्ध है शिष्यत्व की साधना का । जिसने शिष्यत्व की महाकठिन साधना की है, जो अपने गुरु की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरा है- वही उनकी कृपा का अधिकारी है । शिष्यत्व का चुम्बकत्व ही सदगुरु के अनुदानों को अपनी ओर आकर्षित करता है । जिसका शिष्यत्व खरा नहीं है- उसके लिए सदगुरु के वरदान भी नहीं हैं ।

गुरुदेव का संग-सुपास-सान्निध्य मिल जाना, जिस किसी तरह से उनकी निकटता पा लेना, सच्चे शिष्य होने की पहचान नहीं है । हालांकि इसमें कोई सन्देह नहीं है, कि ऐसा हो पाना पिछले जन्मों के किसी विशिष्ट पुण्य बल से ही होता है । परन्तु कई बार ऐसा भी होता है जो गुरु के पास रहे, जिन्हें उनकी अति निकटता मिली, वे भी अपने अस्तित्त्व को सदगुरु की परम चेतना में विसर्जित नहीं कर पाते ।

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Table of content

• अनुभव के अक्षर
• सबसे पहले शिष्य अपनी महत्त्वाकांक्षा छोड़े
• गुरु चेतना के प्रकाश में स्वयं को परखें
• सभी में गुरु ही है समाया
• देकर भी करता मन, दे दें कुछ और अभी
• गुरु चेतना में समाने की साहसपूर्ण इच्छा
• स्वयं को स्वामी ही सच्चा स्वामी
• हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार
• जैविक प्रवृत्तियों को बदल देती है सदगुरु की चेतना
• एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी
• सदगुरु संग बनें साधना-समर के साक्षी
• गुरु के स्वर को हृदय के संगीत में सुनें
• सदगुरु से संवाद की स्थिति कैसे बनें
• समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें
• अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखें
• संवाद की पहली शर्त-वासना से मुक्ति
• व्यवहारशुद्धि, विचारशुद्धि, संस्कारशुद्धि
• परमशान्ति की भावदशा

Monday, 2 May 2016

बच्चों का निर्माण परिवार की प्रयोगशाला में

Preface

बच्चों का निर्माण- परिवार को प्रयोगशाला में

चरित्रवान माता- पिता ही सुसंस्कृत संतान बनाते हैं

अंग्रेजी में कहावत है- दि चाइल्ड इज ऐज ओल्ड ऐज हिज एनसेस्टर्स ।। अर्थात् बच्चा उतना पुराना होता है जितना उसके पूर्वज ।। एक बार संत ईसा के पास आई एक स्त्री ने प्रश्न किया- बच्चे की शिक्षा- दीक्षा कब से प्रारंभ की जानी चाहिए ? ईसा ने उत्तर दिया- गर्भ में आने के १ ० ० वर्ष पहले से ।। स्त्री भौंचक्की रह गई, पर सत्य वही है जिसकी ओर संत ने इंगित किया ।। सौ वर्ष पूर्व जिस बच्चे का अस्तित्व नहीं होता, उसकी जड़ तो निश्चित ही होती है, चाहे वह उसके बाबा हों या परबाबा ।। उनकी मन : स्थिति, उनके आचार, उनकी संस्कृति पिता पर आई और माता- पिता के विचार, उनके रहन- सहन, आहार- विहार से ही बच्चे का निर्माण होता है ।। कल जिस बच्चे को जन्म लेना है, उसकी भूमिका हम अपने में लिखा करते हैं ।। यदि यह प्रस्तावना ही उत्कृष्ट न हुई तो बच्चा कैसे श्रेष्ठ बनेगा ? भगवान राम जैसे महापुरुष का जन्म रघु, अज और दिलीप आदि पितामहों के तप की परिणति थी, तो योगेश्वर कृष्णा का जन्म देवकी और वसुदेव के कई जन्मों की तपश्चर्या का पुण्य फल था ।। अठारह पुराणों के रचयिता व्यास का आविर्भाव तब हुआ था, जब उनकी पाँच पितामह पीढ़ियों ने छोर तप किया था ।। हमारे बच्चे श्रेष्ठ, सद्गुणी बने, इसके लिए मातृत्व और पितृत्व को
गंभीर अर्थ में लिए बिना जाम नहीं चलेगा ।।

महाभारत के समय की घटना है ।। द्रोणाचार्य ने पांडवों के वध के लिए चक्रव्यूह की रचना को ।। उस दिन चक्रव्यूह का रहस्य जानने वाले एकमात्र अर्जुन को कौरव बहुत दूर तक भटका ले गए ।। इधर पांडवों के पास चक्रव्यूह भेदन का आमंत्रण भेज दिया ।।


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विद्यार्थियों की आवश्यकतायें

Table of Content

1 सफलता के तीन साधन
2 बुद्धि बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि
3 बाल नीति शतक
4 वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ
5 सफलता के सात सुत्र
6 समय का सदुपयोग करें