Tuesday, 2 May 2017

विश्व की महान नारियां -२

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नारियों में अपरिमित शक्ति एवं क्षमताएँ सन्निहित हैं ।। जीवन के प्राय: सभी क्षेत्रों में उन्होंने कीर्तिमान स्थापित किए हैं, अपने अदम्य साहस, अथक संघर्षशीलता, दूरदर्शी बुद्धिमत्ता आदि विविध गुणों का परिचय दिया है ।। मानवीय संवेदना, करुणा, ममत्व और वात्सल्य तो नारी की सामान्य विशेषताएँ हैं ही, परंतु जिन क्षेत्रों में सदियों से पुरुषों ने अपना आधिपत्य जमा रखा था, उनमें भी प्रवेश कर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है, यदि वे चाह लें- एक बार संकल्प कर लें, तो उन क्षेत्रों में भी वे अपनी श्रेष्ठता एवं विशिष्टता सिद्ध कर सकती है ।। 

प्रस्तुत संकलन में हम "युग निर्माण योजना" में प्रकाशित विश्व की ऐसी महान नारियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं जिनसे प्रेरणा लेकर भारतीय नारियों अपने जीवन को सँवार- सजा सकती हैं ।। 

अब समय आ गया है जबकि भारतीय नारियों को घर की चहार दिवारी से बाहर निकलना ही होगा ।। खुले आकाश के तले एक सद्संकल्प लेकर विचरना होगा ।। राष्ट्र निर्माण एवं विश्वशांति के क्षेत्र में अपनी- अपनी भूमिका निश्चित कर अपनी अंतर्निहित शक्तियों एवं क्षमताओं का परिचय देना ही होगा ।। 

परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा का जीवन आदर्श हमारे सामने है ।। भारतीय नारियाँ उनसे प्रेरणा लेकर उनके स्वप्नों को साकार करने में तन- मन से जुट जाएँ- यही उन दिव्य महिमा मंडित शक्तिस्वरूपा के प्रति महिला जगत की सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।। 

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विचारो की सृजनात्मक शक्ति

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जीवन की अन्यान्य बातों की अपेक्षा सोचने की प्रक्रिया पर सामान्यत: कम ध्यान दिया गया है, जबकि मानवी सफलताओं-असफलताओं में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान है । विचारणा की शुरुआत मान्यताओं अथवा धारणा से होती है जिन्हें या तो मनुष्य स्वयं बनाता है अथवा किन्हीं दूसरे से ग्रहण करता है या वे पढ़ने, सुनने और अन्यान्य अनुभवों के आधार पर बनती हैं । अपनी अभिरुचि के अनुरूप विचारों को मानव मस्तिष्क में प्रविष्ट होने देता है जबकि जिन्हें पसंद नहीं करता उन्हें निरस्त भी कर सकता है । जिन विचारों का वह चयन करता है उन्हीं के अनुरूप चिंतन की प्रक्रिया भी चलती है । चयन किए गए विचारों के अनुरूप ही दृष्टिकोण का विकास होता है । जो विश्वास को जन्म देता है, वह परिपक्व होकर पूर्वधारणा बन जाता है । व्यक्तियों की प्रकृति एवं अभिरुचि की भिन्नता के कारण मनुष्य-मनुष्य के विश्वासों, मान्यताओं एवं धारणाओं में भारी अंतर पाया जाता है । चिंतन पद्धति में अर्जित की गई भली-बुरी आदतों की भी भूमिका होती है । स्वभाव-चिंतन को अपने ढर्रे में घुमा भर देने में समर्थ हो जाता है । स्वस्थ और उपयोगी चिंतन के लिए उस स्वभावगत ढर्रे को भी तोड़ना आवश्यक है जो मानवी गरिमा के प्रतिकूल है अथवा आत्मविकास में बाधक है ।

प्राय: अधिकांश व्यक्तियों का ऐसा विश्वास है कि विशिष्ट परिस्थिति में मन द्वारा विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करना मानवी प्रकृति का स्वभाव है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं । अभ्यास द्वारा उस ढर्रे को तोड़ना हर किसी के लिए संभव है । परिस्थिति विशेष में लोग प्राय: जिस ढंग से सोचते एवं दृष्टिकोण अपनाते हैं, उससे भिन्न स्तर का चिंतन करने के लिए भी अपने मन को अभ्यस्त किया जा सकता है । मानसिक विकास के लिए, अभीष्ट दिशा में सोचने के लिए अपनी प्रकृति को मोड़ा भी जा सकता है । 

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Monday, 1 May 2017

वातावरण के परिवर्तन का आध्यात्मिक प्रयोग

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=550युग- परिवर्तन को घड़ी सन्निकट है ।। व्यक्ति में दुष्टता और समाज में भ्रष्टता जिस तूफानी गति से बढ़ रही है, उसे देखते हुए सर्वनाश की विभीषिका सामने खड़ी प्रतीत होती है। किंतु ऐसे ही विषम असंतुलन को समय- समय पर सुधारने संभालने के लिए स्रष्टा की प्रतिज्ञा भी तो है। अपनी इस अनुपम कलाकृति, विश्व वसुधा को नियंता ने बड़े अरमानों के साथ बनाया है। संकटों की घड़ी आने पर उसका अवतरण होता है और असंतुलन फिर संतुलन में बदल जाता है। अधर्म को निरस्त और धर्म को आश्वस्त करने वाली ईश्वरीय सत्ता आज को संकटापन्न विषम वेला में उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए अपनी अवतरण प्रक्रिया को फिर संपन्न करने वाली है ।।

यह आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई ? प्रश्न उठना स्वाभाविक है। उत्तर एक ही है- इन दिनों व्यापक क्षेत्रों में जो असंतुलन उत्पन्न हो रहा है, वह इतना बढ़ गया है कि अब स्रष्टा ही उसे संतुलन में साध और ढाल सकता है ।। यह स्थिति कैसे उत्पन्न हुई ? इसका उत्तर है कि धरती की व्यवस्था सँभालने का उत्तरदायित्व स्रष्टा ने मनुष्य को सौंपा है। साथ ही उसे इतना समर्थ शरीरतंत्र दिया है कि वह न केवल जीवधारियों के लिए सुख- शांति बनाए रहे वरन ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अदृश्य शक्तियों को भी अनुकूल रहने के लिए सहमत रख सके। अपने उस उत्तरदायित्व में व्यतिरेक करके जब मनुष्य अनाचार और उददंडता बरतता है- चिंतन को भ्रष्ट और आचरण को दुष्ट बनाता है तो उसकी प्रतिक्रिया अदृश्य जगत का संतुलन बिगाड़ती है और विपत्तियों का विक्षोभ उत्पन्न करती है। दैवी प्रकोप प्रत्यक्ष में लगते तो ऐसे हैं मानों अदृश्य द्वारा मनमानी की जा रही है। 

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युग परिवर्तन क्यों ? किसलिए

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प्रज्ञावतार का लीला- संदोह एवं परिवर्तन की वेला

इन दिनों प्रगति और चमक- दमक का माहौल है, पर उसकी पन्नी उघाड़ते हो सड़न भरा विषघट प्रकट होता है। विज्ञान, शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र की प्रगति सभी के सामने अपनी चकाचौंध प्रस्तुत करती है। आशा की गई थी कि इस उपलब्धि के आधार पर मनुष्य को अधिक, सुखी ,समुन्नत प्रगतिशील, सुसंपन्न सभ्य, सुसंस्कृत बनने का अवसर मिलेगा ।। हुआ ठीक उलटा। मनुष्य के दृष्टिकोण चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता घुस पड़ने से संकीर्ण स्वार्थपरता और मत्स्य- न्याय जैसी अतिक्रमाणता यह प्रवाह चल पड़ा। मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्ट आदर्शवादिता की उपेक्षा अवमानना और विलास, संचय, पक्षपात, तथा अहंकार का दौर चल पड़ा लोभ, मोह और अहंकार को कभी शत्रु मानने, बचने, छोड़ने की शालीनता अपनाई जाती थी अब उसका अता- पता नहीं दीखता और हर व्यक्ति उन्हें के लिए मरता दीखता है। परंपरा उलटी तो परिणति भी विघातक होनी चाहिए थी, हो भी रही है। शक्ति संपन्नता पक ओर- विनाश दूसरी ओर देखकर हैरानी तो अवश्य होती है, पर यह समझने में भी देर नहीं लगती कि भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण अपनाने पर भौतिक समृद्धि से अपना ही गला कटता है, अपनी ही माचिस से आत्मदाह जैसा उपक्रम बनता है। 

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युग निर्माण क्या संभव है

महाक्रान्ति का शंखनाद

भावी महाभारत

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अविवेक, अज्ञान और अन्याय जो सारे समाज पर छाए हुए है, उसे जड़-मूल से हटा करके ही छोड़े ऐसा एक अंतिम युद्ध होगा, जिसको हम भावी महाभारत कहेंगे । भारत छोटा नहीं रह जायेगा बल्कि एक विश्वव्यापी भारत होगा जिसको हम महान भारत कह सकते हैं ।







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