Wednesday, 31 August 2016

मरें तो सही पर बुद्धिमत्ता के साथ

Preface

यों कहने को तो सभी कहते हैं कि जो जन्मा है सो मरेगा । इसलिए किसी की मृत्यु पर दुःख मनाते हुए भी यह नहीं कहा जाता है कि यह अनहोनी घटना घट गई । देर-सबेर मेंआगे-पीछे मरना तो सभी को है, यह मान्यता रहने के कारण रोते-धोते अंतत: संतोष कर ही लेते हैं । जब सभी को मरना है तो अपने स्वजन-संबंधी ही उस काल-चक्र से कैसे बच सकते हैं ? 

लोक मान्यताओं की बात दूसरी है, पर विज्ञान के लिए यह प्रश्न काफी जटिल है । परमाणुओं की तरह जीवाणु भी अमरता के सन्निकट ही माने जाते हैं । जीवाणुओं की सरचना ऐसी है, जो अपना प्रजनन और परिवर्तन क्रम चलाते हुए मूलसत्ता को अक्षुण्ण बनाए रहती है । जब मूल इकाई अमर है तो उसका समुदाय-शरीर क्यों मर जाता है? उलट-पुलटकर वह जीवित स्थिति में ही क्यों नहीं बना रहता ? उनके बीच जब परस्पर सघनता बनाए रहनेवाली चुंबकीय क्षमता का अविरल स्रोत विद्यमान है, तो कोशाओं के विसंगठित होने और बिखरने का क्या कारण है? थकान से गहरी नींद आने और नींद पूरी होने पर फिर जग पड़ने की तरह ही मरना और मरने के बाद फिर जी उठना क्यों संभव नहीं हो सकता ? 

बैक्टीरिया से लेकर अमीबा तक के दृश्यमान और अदृश्य जीवधारी अपने ही शरीर की उत्क्रांति करते हुए अपनी ही परिधिमें जन्म-मरण का चक्र चलाते हुए प्रत्यक्षत: अपने अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रहते हैं । फिर बड़े प्राणी ही क्यों मरते हैं ? मनुष्यको ही क्यों मौत के मुँह में जाने के लिए विवश होना पड़ता है ?



Buy Online @ 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=50


मरणोत्तर जीवन और उसकी सच्चाई

Preface

घास-पात की तरह मनुष्य भी माता के पेट से जन्म लेता है,पेडू-पौधों की तरह बढ़ता है और पतझड़ के पीले पत्तों की तरहजरा-जीर्ण होकर मौत के मुँह में चला जाता है । देखने में तो मानवी सत्ता का यही आदि-अंत है । प्रत्यक्षवाद की सचाई वहीं तक सीमितहै, जहाँ तक इंद्रियों या उपकरणों से किसी पदार्थ को देखा-नापा जासके । इसलिए पदार्थ विज्ञानी जीवन का प्रारंभ व समाप्ति रासायनिक संयोगों एवं वियोगों के साथ जोड़ते हैं और कहते हैं कि मनुष्य एक चलता-फिरता पेड़-पादप भर है । लोक-परलोक उतना ही है जितना कि काया का अस्तित्व । मरण के साथ ही आत्मा अथवा कायासदा-सर्वदा के लिए समाप्त हो जाती है । बात दार्शनिक प्रतिपादन या वैज्ञानिक विवेचन भर की होती तो उसे भी अन्यान्य उलझनों की तरह पहेली, बुझौवल समझा जासकता था और समय आने पर उसके सुलझने की प्रतीक्षा की जासकती थी । किंतु प्रसंग ऐसा है जिसका मानवी दृष्टिकोण औरसमाज के गठन, विधान और अनुशासन पर सीधा प्रभाव पड़ता है ।यदि जीवन का आदि- अंत-जन्म-मरण तक ही सीमित है, तो फिर इस अवधि में जिस भी प्रकार जितना भी मौज-मजा उड़ाया जा सकता हो, क्यों न उड़ाया जाए ? दुष्कृत्यों के फल से यदि चतुरता पूर्वक बचा जा सकता है, तो पीछे कभी उसका दंड भुगतना पड़ेगा, ऐसा क्यों सोचा जाए ? अनास्था की इस मनोदशा में पुण्य-परमार्थ का, स्नेह-सहयोग का भी कोई आधार नहीं रह जाता ।






मरणोत्तर श्राद्ध कर्म-विधान


गायत्री तीर्थ शान्तिकु्ज्ञ्ज में भारतीय संस्कृति के अनुरूप हर प्रकार के संस्कार कराने की व्यवस्था लम्बे समय से चली आ रही है। तीर्थ श्राद्ध परम्परा प्रारम्भ करने के बाद एक नया अनुभव हुआ। ऐसा लगा कि लोगों के मन में रुकी-घुटी श्रद्धा की अभिव्यक्ति को नया मार्ग मिल गया है, जिनके तप, पुरुषार्थ और अनुदान पर हमारा वर्तमान जीवन टिका है, उन पितरों के प्रति श्राद्ध व्यक्ति करने की उमंग हर नर-नारि में उमड़ती दिखती है।

 






Buy Online 
@http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=242



Sunday, 28 August 2016

सफल दांपत्य जीवन के मौलिक सिद्धांत


Preface

सुखी दाम्पत्य का आधार है- पति-पत्नी का शुद्ध सात्विक प्रेम ।। जब दोनों एक- दूसरे के लिए अपनी स्वार्थ- भावना का परित्याग कर देते हैं तब हृदय परस्पर मिल जाते हैं ।। प्रेम में अहंकार का भाव नहीं होता है ।। त्याग ही त्याग चाहिए ।। जितने गहन तल से समर्पण की भावना होगी उतना ही प्रगाढ़ प्रेम होगा ।।

Table of content

1. परिवार का मूल: दाम्पत्य जीवन 
2. सफल दांपत्य के व्यावहारिक सत्य 
3. अहंकार और दाम्पत्य-प्रेम में एक रह सकता है, दोनों नहीं 
4. महापुरुषों का दाम्पत्य जीवन 


             सफल दांपत्य जीवन के मौलिक सिद्धांत



Complete Yagya Set

Description

1 Janaiv (Yagyopaveet) 
2 Devsthapan-Asni 
3 Upavashra - Gayatri Mantra Dupatta (Cotton) 
4 Kasta Patra Set 
5 Hawan Kund 
6 Hawan Samagri 
7 Dhoti Cotton 
8 यज्ञ कर्मकाण्ड (MP3 CD) 
9 सरल सर्वोपयोगी हवन विधि (Book) 
10. देवस्थापना (5x7 Inch) (Photo Freams) 


                                Complete Yagya Set



आकृति देखकर मनुष्य की पहचान

आकृति देखकर मनुष्य की पहचान

Preface
चेहरा मनुष्य के भीतरी भागों का दर्पण है । मन में जैसे भाव होते है, उन्हें कुछ अत्यन्त सिद्ध हस्त लोगों को छोड़कर कोई आसानी से नहीं छिपा सकता । मनोगत भाव आमतौर से चेहरे पर अंकित हो जाते हैं । मुखाकृति को देखकर मन की भीतरी बातों का बहुत कुछ पता लगालिया जाता है । परन्तु जब कोई भाव अधिक समय तक मन में मजबूती के साथ बैठ जाता है तो उसका प्रभाव आकृति पर स्थाई रूप से पड़ता है और अंगों की बनावट वैसी ही हो जाती है । स्वभाव के परिवर्तन के साथ-साथ चेहरे की बनावट में कितने ही सूक्ष्म अन्तर आ जाते है । 

जब कोई मनोवृत्ति बहुत पुरानी एवं अभ्यस्त होकर मनुष्य के अन्तःकरण में संस्कार रूप से जम जाती है तो वह कई जन्मों तक जीवका पीछा करती है । इस स्वभाव संस्कार के अनुसार माता के गर्भ मेंउस जीव आकृति का निर्माण होता है । बालक के पैदा होने पर जानकार लोग जान लेते है कि किन स्वभावों और संस्कारों की इसके अन्तःकरणपर छाया है और उन संस्कारों के कारण उसे जीवन में किस प्रकार की परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ेगा । 

आकृति विज्ञान का यही आधार है । प्राचीन काल में इस विद्या की सहायता से बालकों के संस्कारों को समझ कर उनकी प्रवृत्तियो को सन्मार्ग पर लगाने का प्रयत्न किया जाता था । अब भी इसका यही उपयोग होना चाहिए । इसके चिह्न बुरे हैं इसलिए यह अभागा है इससे घृणा करे, इसके चिह्न अच्छे हैं, यह भाग्यवान है, इसे अधिक आदर दें, यह भावना इसविद्या का दुरूपयोग है ।



साधना पद्धतियों का ज्ञान विज्ञान-4

Preface

भारतीय संस्कृति का कोश अनेकानेक रत्नों से भरा पड़ा है। योगदर्शन उनमें से एक है जो व्यक्ति को उच्च से उच्चतर-उच्चतम सोपानों पर चढ़ाने की विधा का प्रशिक्षण देता है। साधना जो योगदर्शन के अन्तर्गत विभिन्न पद्धतियों के माध्यम से सिखाई जाती हैं कोई जादू-चमत्कार नहीं वरन् विशुद्घ विज्ञान है। मानवीसत्ता के कण-कण में दिव्यता भरी पड़ी है जो कि अद्भुत है, अनन्त है। उसी को परमस्तर तक पहुँचा देने के लिए जो प्राप्ति का पुरुषार्थ किया जाता है- आकांक्षा, साहसिकता, सक्रियता और तत्परता जुटायी जाती है, उसी को साधना कहते हैं। साधना का अर्थ अपने आपको को साधना-अपने कर्म को कुशलतापूर्वक संपादित कर लेना तथा विच्छृंखलित, अस्तव्यस्त स्थिति से सुव्यवस्थित, सुरुचिपूर्ण स्थिति में अपने व्यक्तित्व को पहुँचाना। 


Buy Online@