Monday, 4 April 2016

बाल संस्कारशाला मार्गदर्शिका

पुस्तिका में विभिन्न धर्म- सम्प्रदायों में श्रद्धा रखने वाले छात्र- छात्राओं का विशेष ध्यान रखते हुए प्रार्थना आदि में तथा प्रेरक प्रसंगों आदि में किन बातों पर ध्यान दिया जाय, आदि टिप्पणियाँ देने का प्रयास किया गया है। जैसे- प्रार्थना के बाद अपने इष्ट का ध्यान, उनसे ही सद्बुद्घि माँगने के लिए गायत्री जप, अन्य मंत्र या नाम जप करें। विभिन्न सम्प्रदायों के श्रेष्ठ पुरुषों के प्रसंग चुने जाएँ। बच्चों से भी उनके जीवन एवं आदर्शों के बारे में पूछा जा सकता है, उन पर विधेयात्मक समीक्षा करें, आदि। विभिन्न स्कूलों में जाने वाले बच्चों को गणित, विज्ञान, अंग्रेजी जैसे विषयों में कोचिंग देने, होमवर्क में सहयोग करने, योग- व्यायाम सिखाने जैसे आकर्षणों के माध्यम से एकत्रित किया जा सकता है। सप्ताह में एक बार इस पुस्तिका के आधार पर कक्षा चलाई जा सकती है। प्रति दिन के क्रम में प्रारंभ में प्रार्थना, अंत में शांतिपाठ जैसे संक्षिप्त प्रसंग जोड़े जा सकते हैं। पढ़ी- लिखी बहिनें, सृजन कुशल भाई, रिटायर्ड परिजन इस पुण्य प्रयोजन में लग जाएँ तो प्रत्येक मोहल्ले में ‘बाल संस्कार शालाओं’ का क्रम चल सकता है। विद्यालय के ‘संस्कृति मंडलों’ में भी यह प्रयोग बखूबी किया जा सकता है। हमें विश्वास है कि भावनाशील परिजन लोक मंगल, आत्मनिर्माण एवं राष्ट्र निर्माण का पथ प्रशस्त करने वाले इस पुण्य कार्य में तत्परता पूर्वक जुट पड़ेंगे।

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तुलसी के चमत्कारी गुण

जब से संसार में सभ्यता का उदय हुआ है, मनुष्य रोग और औषधि इन दोनों शब्दों को सुनते आए हैं । जब हम किसी शारीरिक कष्ट का अनुभव करते हैं तभी हम को औषधि की याद आ जातीहै, पर आजकल औषधि को हम जिस प्रकार टेबलेट , मिक्चर , इंजेक्शन , कैप्सूल आदि नए-नए रूपों में देखते हैं, वैसी बातपुराने समय में न थी । उस समय सामान्य वनस्पतियाँ और कुछ जड़ी-बूटियाँ ही स्वाभाविक रूप में औषधि का काम देती थीं औरउन्हीं से बड़े-बड़े रोग शीघ्र निर्मूल हो जाते थे, तुलसी भी उसी प्रकार की औषधियों में से एक थी ।

जब तुलसी के निरंतर प्रयोग से ऋषियों ने यह अनुभव किया कि यह वनस्पति एक नहीं सैकड़ों छोटे -बड़े रोगों मेंलाभ पहुँचाती है और इसके द्वारा आस पास का वातावरण भी शुद्ध और स्वास्थ्यप्रद रहता है तो उन्होंने विभिन्न प्रकार से इसके प्रचारका प्रयत्न किया । उन्होंने प्रत्येक घर में तुलसी का कम से कमएक पौधा लगाना और अच्छी तरह से देखभाल करते रहना धर्म कर्त्तव्य बतलाया । खास-खास धार्मिक स्थानों पर तुलसी कानन बनाने की भी उन्होंने सलाह दी, जिसका प्रभाव दूर तक के वातावरण पर पड़े ।

धीरे- धीरे तुलसी के स्वास्थ्य प्रदायक गुणों और सात्विक प्रभाव के कारण उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि लोग उसेभक्ति भाव की दृष्टि से देखने लगे, उसे पूज्य माना जाने लगा ।


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Friday, 1 April 2016

विवाह दिवसोत्सव कैसे मनाएँ ?

जिनके विवाह नहीं हुए हैं, उनके संस्कार को सुयोग्य व्यवस्थाप कों एवं पुरोहितों द्वारा अत्यन्त प्रभावोत्पादक बनाया जाना चाहिए । पर जिनके विवाह हो चुके हैं, उनके सम्बन्ध में हो गया सोहो गया कहकर छुटकारा नहीं पाया जा सकता । उनको वह लाभपुन: मिलना चाहिए जो औधे-सीधे ढंग से बेगार भुगताने की भगदड़ में उन्हें नहीं मिल पाया है । इसके लिए सबसे उत्तम सरल औरउपयोगी तरीका विवाह दिवसोत्सव मनाया जाना ही हो सकता है ।जिस दिन विवाह हुआ था, हर वर्ष उस दिन एक छोटा-सा उत्सवसमारोह मनाया जाय । मित्र-परिजन एकत्रित हों, विवाह का पूरा कर्मकाण्ड तो नहीं पर उनमें प्रयुक्त होने वाली कुछ क्रियायें फिरकी जायें और जो मोटे-मोटे संकल्प हैं वे पति-पत्नी द्वारा हर वर्ष किये जायें तथा विवाह के कर्तव्य उत्तरदायित्वों को नये सिरे से पुन:समझा, समझाया जाय । 

हर वर्ष इस प्रकार का व्रत धारण, प्रशिक्षण, संकल्प एवं धर्मानुष्ठान किया जाता रहे तो उससे दोनों को अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को पालने, निबाहने की निश्चय ही अधिक प्रेरणा मिलेगी | भारतीय तत्व-वेत्ताओं ने विवाह संस्कार का महान् विधि-विधान इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए विनिर्मित किया था । उस समय बोले जाने वाले मंत्र, देवाह्वान, यज्ञ एवं अन्यान्य कर्मकाण्डों का एक वैज्ञानिक महत्व है । उनके कारण वर-वधू के अन्तःकरणों में एक विशेष प्रकार की आद्रता आती है और वे अनायास ही एक-दूसरे में धुलने लगते है |


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स्वस्थ रहने की कला

मनुष्य की काय संरचना ऐसी है, जिसे यदि तोड़ा-मरोड़ा न जाए, सहज गति से चलने दिया जाए तो वह लंबे समय तक बिना लड़खड़ाए कारगर बनी रह सकती है ।आरोग्य स्वाभाविक है और रोग प्रयत्न पूर्वक आमंत्रित । सृष्टि के सभी प्राणी अपनी सहज आयु का उपभोग करते हैं । मरण तो सभी का निश्चित है, पर वह जीर्णता के चरम बिंदु पर पहुँचनेके उपरांत ही होता है । मात्र दुर्घटनाएँ ही कभी-कभी उसमें व्यवधान उत्पन्न करती हैं । रुग्णता का अस्तित्व उन प्राणियोंमें दृष्टिगोचर नहीं होता, जो प्रकृति की प्रेरणा अपनाकर सहज सरल जीवन जीते हैं । मनुष्य ही इसका अपवाद है । इसी जीवधारी को आए दिन बीमारियों का सामना करना पड़ताहै । बेमौत मरते भी वही देखा जाता है । दुर्बलता, रुग्णता और असामयिक मृत्यु कोई दैवी विपत्तिनहीं है । मनुष्य द्वारा अपनाई गई रहन-सहन संबंधी प्रतिक्रिया मात्र है । आहार-विहार में संयम बरता जा सके और मस्तिष्कको अनावश्यक उत्तेजनाओं से बचाए रखा जा सके, तो लंबी अवधि तक सुखपूर्वक निरोगी जीवन जिया जा सकता है ।आरोग्य की उपलब्धि के लिए बहुमूल्य टॉनिकों या औषध-रसायनों को खोजने की तनिक भी आवश्यकता नहींहै । जो उपलब्ध है उसे बरबाद न करने की सावधानी भरबरती जाए, तो न बीमार पड़ना पड़े, न दुर्बल रहना पड़े औरन असमय बेमौत मरने की आवश्यकता पड़े । चिकित्सकों का द्वार खटखटाने की अपेक्षा आरोग्यार्थी यदि रहन-सहन में सम्मिलित कुचेष्टाओं को निरस्त कर सकें, तो यह उपाय उनकी मनोकामना सहज ही पूरी कर सकता है ।

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वेदांत दर्शन

भारतीय चिन्तन धारा में जिन दर्शनों की परिगणना विद्यमान है, उनमें शीर्ष स्थानीय दर्शन कौन सा है ? ऐसी जिज्ञासा होने पर एक ही नाम उभरता है, वह है - वेदान्त । यह भारतीय दर्शन के मंदिर का जगमगाता स्वर्ण कलश है- दर्शनाका देदीप्यमान सूर्य है । वेदान्त की विषय वस्तु, इसके उद्देश्य, साहित्य और आचार्य परम्परा आदिपर गहन चिन्तन करें, इससे पूर्व आइये, वेदान्त शब्द का अर्थ समझें | 

वेदान्त का अर्थ- वेदान्त का अर्थ है- वेद का अन्त या सिद्धान्त । तात्पर्य यह है - वह शास्त्र जिसके लिए उपनिषद् ही प्रमाण है । वेदान्तमें जितनी बातों का उल्लेख है, उन सब का मूल उपनिषद् है । इसलिए वेदान्त शास्त्र के वे ही सिद्धान्त माननीय हैं, जिनके साधक उपनिषद् के वाक्य हैं । इन्हीं उपनिषदों को आधार बनाकर बादरायण मुनि ने ब्रह्मसूत्रों की रचना की ।


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यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया- 26

यज्ञ- प्रक्रिया को अपने संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में प्रतिपादित कर वाड्मय के इस खण्ड में परमपूज्य गुरुदेव ने बड़े विस्तार से यज्ञोपचार की प्रक्रिया की व्याख्या की है ।। यज्ञ एक सर्वांगपूर्ण उपचार पद्धति है- पर्यावरण संशोधन के लिए, सूक्ष्म जगत में संव्याप्त प्रदूषण मिटाने के लिए तथा मानव की स्थूल- सूक्ष्म हर स्तर पर चिकित्सा करने के लिए ।। सविता देवता की उपासना गायत्री महामंत्र का प्राण है एवं उसी सविता को समर्पित आहुतियाँ किस प्रकार अपनी मंत्र शक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा के समन्वित स्वरूप के माध्यम से होता को लाभ पहुँचाती है, यही यज्ञोपचार प्रक्रिया है ।। आत्मसत्ता पर छाये कषाय- कल्मषों की सफाई से लेकर- गुणसूत्रों, क्रोमोसोम्स जीन्स तक पर यज्ञ प्रक्रिया प्रभाव डालती है एवं इसमें किस प्रकार यज्ञ कुण्ड एक यंत्र की भूमिका निभाकर वृहत सोम के अवतरण द्वारा सोम की- पर्जन्य की वर्षा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, इसका वैज्ञानिक आधार क्या है, ज्यामिती किस प्रकार यज्ञधूम्रों की बहुलीकरण प्रक्रिया को प्रभावित करती है, यह सारा प्रतिपादन इस खण्ड में हुआ है ।। 

यज्ञाग्नि व सामान्य अग्नि में अन्तर है ।। परमपूज्य गुरुदेव ने "यज्ञोपैथी" के नाम से एक नूतन चिकित्सा पद्धति जो भविष्य की उपचार पद्धति बनने जा रही है, को जन्म देकर वस्तुत: वैदिक विज्ञान के मूल आधार को पुनर्जीवित किया है ।। यज्ञों से रोग निवारण में समिधाओं, शाकल्य तथा मंत्रों का चयन कैसे किया जाता है, यह पूरी प्रक्रिया अपने में एक समग्र विज्ञान है ।। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि पृथ्वी तत्त्व का पंचभूतों से बनी इस काया में प्राधान्य है तथा पृथ्वी सदा वायु से गंधों का शोषण करती रहती है ।।

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