Monday, 2 May 2016

Problems Of Today Solutions Of Tomorrow


Preface

A maniac let loose on the thoroughfare may create havoc amongst the passers-by and injure many seriously. It is done quite effortlessly; but on the other hand, is it possible to restore the damage easily? Modern generation has been living in the mania of two mistaken beliefs. First the scientific developments have made man omnipotent and second-that instant gain is all that matters. In this euphoria, man has totally lost balance of judgement. With scientific achievements, he has become so much power drunk that he has stopped thinking about consequences of his impetuous actions. Under the existing circumstances, irresponsible individuals keep on repenting for the outcome of their thoughtless misdeeds.

World is facing similar crisis today. With a peculiar mania man has begun to destroy systematically the very things on which his survival depends. Survival of human race is in danger. One has to pay a heavy price for the cruel jokes and playing with the nature. The numerous problems and crisis in the society have arisen because of mans own irresponsible, wrong actions.


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समय का सदुपयोग

Preface

यदि हमें जीवन से प्रेम है तो यही उचित है कि समय को व्यर्थनष्ट न करें। मरते समय एक विचारशील व्यक्ति ने अपने जीवन के व्यर्थ ही चले जाने पर अफसोस प्रकट करते हुए कहा था- मैंने समय को नष्ट किया, अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।

खोई दौलत फिर कमाई जा सकती है । भूली हुई विद्या फिरयाद की जा सकती है । खोया स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जासकता है, पर खोया हुआ समय किसी प्रकार नहीं लौट सकता,उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है ।

जिस प्रकार धन के बदले में अभीष्ठित वस्तुएँ खरीदी जास कती हैं, उसी प्रकार समय के बदले में भी विद्या, बुद्धि, लक्ष्मीकीर्ति आरोग्य, सुख-शांति, आदि जो भी वस्तु रुचिकर हो खरीदी जा सकती है । ईश्वर समय रूपी प्रचुर धन देकर मनुष्यको पृथ्वी पर भेजा है और निर्देश दिया है कि इसके बदले में ससारकी जो वस्तु रुचिकर समझें खरीद लें । कितने व्यक्ति है जो समय का मूल्य समझते और उसका सदुपयोग करते है ? अधिकांश लोग आलस्य और प्रमाद में पड़े हुए जीवन के बहुमूल्य क्षणों को यों ही बर्बाद करते रहे हैं। एक-एक दिन करके सारी आयु व्यतीत हो जाती है और अंतिम समय वे देखते हैंकि उन्होंने कुछ भी प्राप्त नहीं किया, जिंदगी के दिन यों ही बितादिए । इसके विपरीत जो जानते हैं कि समय का नाम ही जीवन है, वेएक-एक क्षण कीमती मोती की तरह खर्च करते हैं और उसके बदले में बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं । हर बुद्धिमान व्यक्ति ने बुद्धिमत्ता का सबसे बडा परिचय यही दिया है कि उसने जीवन के क्षणों को व्यर्थ बर्बाद नहीं होने दिया ।अपनी समझ के अनुसार जो अच्छे से अच्छाउपयोग हो सकता था, उसी में उसने समय को लगाया । उसका यही कार्यक्रम अंतत: उसे इस स्थिति तक पहुँचा सका, जिस पर उसकी आत्मा संतोष का अनुभव करे ।

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वेदमाता गायत्री महामंत्र एवं आरती

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ईश्वर और उसकी अनुभुति

महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने में कुछ दिन ही शेष थे ।। कौरव और पाण्डव दोनों पक्ष अपनी- अपनी तैयारियाँ कर रहे थे युद्ध के लिए ।। अपने- अपने पक्ष के राजाओं को निमंत्रित कर रहे थे ।। भगवान् श्रीकृष्ण को निमन्त्रित करने के लिए अर्जुन और दुर्योधन एक साथ पहुँचे ।। भगवान् ने दोनों के समक्ष अपना चुनाव प्रश्र रखा ।। एक ओर अकेले शस्त्रहीन श्रीकृष्ण और दूसरी ओर श्रीकृष्ण की सारी सशस्त्र सेना इन दोनों में से जिसे जो चाहिए वह माँग ले ।। दुर्योधन ने सारी सेना के समक्ष निरस्त कृष्ण को अस्वीकार कर दिया; किन्तु अपने पक्ष में अकेले निरस्त भगवान् कृष्ण को देखकर अर्जुन मन- ही बड़ा प्रसन्न हुआ ।। अर्जुन ने भगवान् को अपना सारथी बनाया ।। भीषण संग्राम हुआ ।। अन्तत: पांडव जीते और कौरव हार गये ।। इतिहास साक्षी है कि बिना लड़े भगवान् कृष्ण ने अर्जुन का सारथी मात्र बनकर पाण्डवों को जिता दिया और शक्तिशाली सेना प्राप्त करके भी कौरव को हारना पड़ा ।। दुर्योधन ने भूल की जो स्वयं भगवान् के समक्ष सेना को ही महत्त्वपूर्ण समझा और सैन्य बल के समक्ष भगवान् को ठुकरा दिया ।।

किन्तु आज भी हम सब दुर्योधन बने हुए हैं और निरन्तर यही भूल करते जा रहे हैं ।। संसारी शक्तियों, भौतिक सम्पदाओं के बल पर ही जीवन संग्राम में विजय चाहते हैं, ईश्वर की उपेक्षा करके, हम भी तो भगवान् और उनकी भौतिक स्थूल शक्ति दोनों में से दुर्योधन की तरह स्वयं ईश्वर की उपेक्षा कर रहे हैं और जीवन में संसारी शक्तियों को प्रधानता दे रहे हैं; किन्तु इससे तो कौरवों की तरह असफलता ही मिलेगी ।।

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१०८ उपनिषद्-ब्रह्मविद्या खण्ड


Preface

उपनिषद् में उप और नि उपसर्ग हैं । सद् धातु गति के अर्थ में प्रयुक्त होती है। गति शब्द का उपयोग ज्ञान, गमन और प्राप्ति इन तीन संदर्भो में होता है । यहाँ प्राप्ति अर्थ अधिक उपयुक्त है । उप सामीप्येन, नि-नितरां, प्राम्नुवन्ति परं ब्रह्म यया विद्यया सा उपनिषद अर्थात् जिस विद्या के द्वारा परब्रह्म का सामीप्य एवं तादात्म्य प्राप्त किया जाता है, वह उपनिषद् है ।


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ब्रह्मवर्चस् साधना की ध्यान - धारणा

Preface

गायत्री-शक्ति और गायत्री-विद्या को भारतीय धर्म में सर्वोपरि स्थान दिया गया है। उसे वेदमाता-भारतीय धर्म और संस्कृति की जननी उद्गम-गंगोत्री कहा गया है। इस चौबीस अक्षर के छोटे से मंत्र के तीन चरण है। ॐ एवं तीन व्याहृतियों वाला चौथा चरण है। इन चारों चरणों का व्याख्यान चार वेदों में हुआ है। वेद भारतीय तत्त्वज्ञान और धर्म अध्यात्म के मूल है। गायत्री उपासना की भी इतनी ही व्यापक एवं विस्तृत परिधि है।

गायत्री माता के आलंकारिक चित्रों, प्रतिमाओं में एक मुख-दो भुजाओं का चित्रण है। कमंडलु और पुस्तक हाथ में है। इसका तात्पर्य इस महाशक्ति को मानवता की उत्कृष्ट आध्यात्मिकता की प्रतिमा बनाकर उसे मानवी आराध्या के रूप में प्रस्तुत करना है। इसकी उपासना के दो आधार है-ज्ञान और कर्म। पुस्तक से ज्ञान का और कंमडलु जल से कर्म का उद्बोधन कराया गया है। यही वेदमाता है। उसी को विश्व-माता की संज्ञा दी गई है। सर्वजनीन और सर्वप्रथम इसी उपास्य को मान्यता दी गई है।



 

Sunday, 1 May 2016

Vedas Set - (8 Books)

Description

1. ऋग्वेद-1
2. ऋग्वेद-2
3. ऋग्वेद-3
4. ऋग्वेद-4
5. अथर्ववेद-01
6. अथर्ववेद-02
7. यजुर्वेद
8. सामवेद

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