Saturday, 8 October 2016

भारतीय संस्कृति जीवन दर्शन

Preface

जब कोई समाज कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने व्यक्तिगत मान-अपमानों की परवाह किए बिना अपने राष्ट्र, अपनी मातृभूमि के अस्तित्व पर आए संकट या संघर्ष में अपने प्राणों की बाजी लगाता है या फिर बलिदान हो जाता है, तो वह व्यक्तिगत रूप से उस राष्ट्र और समाज की संस्कृति की ही रक्षा करता है और बलिदान होना ही, उस बलिदानी वीर पुरूष की संस्कृति है । 

यह संस्कृति ही है, जो राष्ट्र पर मर मिटने के लिए प्रेरित करती है और मर कर भी जब संतोष नहीं होता है, तो बलिदानी वीर पुरूष अगले जन्म में भी अपनी उसी मातृभूमि पर पैदा होकर अपने प्राणों को अपनी मातृभूमि के लिए अर्पित करने की ईश्वर से कामना करता है । 

कहते हैं कि किसी भी राष्ट्र और उसके नागरिकों के अस्तित्व के लिए संस्कृति उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना कि उनके लिए भोजन, हवा और पानी । जिस प्रकार भोजन, हवा और पानी के बिना कोई राष्ट्र और उसके नागरिक जीवित नहीं रह सकते उसी प्रकार बिना संस्कृति के राष्ट्र और नागरिकों का कोई अस्तित्व नहीं रह सकता है । इसलिए यह सत्यता हैं कि संस्कृति किसी व्यक्ति के प्राणों की रक्षा भले ही न करती हो, पर राष्ट्र के अस्तित्व की रक्षा अवश्य करती है । इसलिए प्रत्येक राष्ट्र और जाति की अपनी अलग-अलग संस्कृति होती है, उसी के अनुरूप उस समाज, उस राष्ट्र और उस जाति की पहचान होती है ।

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वेशभूषा शालीन ही रखिए

Preface

हमारा स्वास्थ्य जिस प्रकार आहार पर निर्भर है, उसी प्रकारवस्त्रों-पोशाकों का भी उस पर काफी प्रभाव पड़ता है पर लोगों नेइस समय इस दृष्टिकोण को बिल्कुल भुला रखा है । वे पोशाक का उद्देश्य लज्जा निवारण या शान-शौक मात्र समझते हैं । अब तोधीरे-धीरे यह मानव-जीवन का ऐसा अविच्छिन्न अंग बन गई है कि हमवस्त्रहीन मनुष्य की कल्पना भी नहीं कर सकते । अधिकांश लोग तोइसे इतना ज्यादा महत्व देते हैं और ऐसा अनिवार्य समझते हैं मानो मनुष्य वस्त्रों सहित ही पैदा हुआ है और उनके बिना उसका अस्तित्वही नहीं रह सकता । 

पर सच तो यह है कि मनुष्य नंगा ही पैदा हुआ है और हजारों वर्ष तक यह उसी दशा में प्रकृति माता की गोद में निवास कर चुकाहै । उस समय उसका चमड़ा भी कुछ कड़ा था । बहुत अधिक ठण्डे स्थानों के निवासी चाहे शीत के प्रकोप से बचने के लिए भालू आदि जैसे किसी पशु के चर्म का उपयोग भले ही कर लेते हों, अन्यथा उस युगमें सभी मनुष्य दिगम्बर अवस्था में ही जीवन यापन करते थे । फिर जैसे-जैसे रहन-सहन के परिवर्तन से शारीरिक अवस्था में अन्तर पड़ता गया और लिंग-भेद (सैक्स) सम्बन्धी मनोवृत्तियाँ वृद्धि पाती गयीं, मनुष्य लँगोटी, कटि-वस्त्र आदि पहनने लग गये । जब जीवन-निर्वाह के साधन बढ़ गये और अनेक लोग अपेक्षाकृत आलस्य का जीवन व्यतीत करने लगे तो ठण्डे देशों में उनको देह कीरक्षा के लिए किसी प्रकार के वस्त्र पहिनने की आवश्यकता जान पड़नेलगी । धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति बढ़ती गई और आज पोशाक ने सजावट और शौक का ही नहीं, मान-मर्यादा का रूप भी ग्रहण कर लिया है । वस्त्रों से मनुष्य के छोटे बड़े गरीब-अमीर होने का पता लगता है ।

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Gayatri A Unique Solutions For Problems

Preface

It is absolutely easy to be liberated from sins by Gayatri worship. The specialty of Gayatri worship is that when the resonance of the innate powers within its 24 letters occurs within the heart, the sattogun (virtue) within thoughts increases day-by-day and as a result changes occur in the nature and programme of the person. One in whose heart virtuous thoughts increase, the same excellence will also be there in his deeds. 

A persons nature is not any definite or permanent thing. It keeps on changing according to situations and sentiments. It is not necessary that a person who is sinful to-day will remain sinful throughout life. Similarly it cannot also be said that a person who is a gentleman with good conduct to-day, will remain so in future also. 

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चिकित्सा उपचार के विविध आयाम-४०

Preface

परमपूज्य गुरुदेव ने वाड्मय के प्रारंभ में ही स्वास्थ्य रक्षा के चौबीस स्वर्णिम सूत्र देते हुए लिखा है कि बिना प्राकृतिक संतुलन से भरा जीवन अपनाए मनःस्थिति ठीक किए व्यक्ति स्वस्थ नहीं हो सकता । औषधियाँ-सर्जरी आदि बाह्योपचार व्यर्थ हैं, यदि मूल जड़ को नष्ट नहीं किया गया । इसमें उनने आठ आहार संबंधी दस विहार संबंधी छह मनःसंतुलन संबंधी अनुशासन दिए हैं व लिखा है कि इनका अनुपालन करने वाला कभी बीमार हो ही नहीं सकता । आरोग्य को स्वाभाविक व दुर्बलता-रुग्णता को अस्वाभाविक मानते हुए उनने स्वास्थ्य-रक्षा हेतु अनेकानेक निर्देशों द्वारा बहुमूल्य मार्गदर्शन किया है । 

आज के व्यक्ति का जीवन आरामतलबी का है । उपकरणों-मशीनों, घर-घर में उपलब्ध संसाधनों ने व्यक्ति को मशीनों का गुलाम बना दिया है । ऐसे में स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए उनने शरीर पर बहुत अधिक दबाव डालने या थकाने वाले व्यायामों की तुलना शरीर की सूक्ष्म चक्र-उपत्यिकाओं को प्रभावित, उत्तेजित कर स्कूर्ति लाने वाले आसनों को अपनाने पर जोर दिया है । आसन अनेकानेक हैं, किंतु विभिन्न आयु वर्गों के लिए जिन्हें चुना जाए-कौन सा किस रोग की रक्षा के लिए किन अंगों के सूक्ष्म संचालन हेतु प्रयुक्त होता है, उसका सरल मार्गदर्शन इस खंड में है । इसी तरह प्राणायाम को विभिन्न मनोरोगों को दूर करने, तनाव मिटाने, चिरस्थायी प्राणशक्ति का स्रोत बनाए रखने के लिए कैसे प्रयुक्त किया जा सकता है, यह वर्णन विस्तार से इसमें है । प्राणों का व्यायाम-प्राणों के आयाम में प्रवेश ही प्राणायाम है । प्राणतत्त्व की अभिवृद्धि, कौन-कौन से प्राणायाम व्याधि-निवारण हेतु उपयुक्त हैं, उन सभी का दिग्दर्शन इसमें है ।


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गायत्री महाविज्ञान संयुक्त

Preface

गायत्री वह दैवी शक्ति है जिससे सम्बन्ध स्थापित करके मनुष्य अपने जीवन विकास के मार्ग में बड़ी सहायता प्राप्त कर सकता है। परमात्मा की अनेक शक्तियाँ हैं, जिनके कार्य और गुण पृथक् पृथक् हैं। उन शक्तियों में गायत्री का स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यह मनुष्य को सद्बुद्धि की प्रेरणा देती है। गायत्री से आत्मसम्बन्ध स्थापित करने वाले मनुष्य में निरन्तर एक ऐसी सूक्ष्म एवं चैतन्य विद्युत् धारा संचरण करने लगती है, जो प्रधानतः मन, बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण पर अपना प्रभाव डालती है। बौद्धिक क्षेत्र के अनेकों कुविचारों, असत् संकल्पों, पतनोन्मुख दुर्गुणों का अन्धकार गायत्री रूपी दिव्य प्रकाश के उदय होने से हटने लगता है। यह प्रकाश जैसे- जैसे तीव्र होने लगता है, वैसे- वैसे अन्धकार का अन्त भी उसी क्रम से होता जाता है। मनोभूमि को सुव्यवस्थित, स्वस्थ, सतोगुणी एवं सन्तुलित बनाने में गायत्री का चमत्कारी लाभ असंदिग्ध है और यह भी स्पष्ट है कि जिसकी मनोभूमि जितने अंशों में सुविकसित है, वह उसी अनुपात में सुखी रहेगा, क्योंकि विचारों से कार्य होते हैं और कार्यों के परिणाम सुख- दुःख के रूप में सामने आते हैं। जिसके विचार उत्तम हैं, वह उत्तम कार्य करेगा, जिसके कार्य उत्तम होंगे, उसके चरणों तले सुख- शान्ति लोटती रहेगी। गायत्री उपासना द्वारा साधकों को बड़े- बड़े लाभ प्राप्त होते हैं। हमारे परामर्श एवं पथ- प्रदर्शन में अब तक अनेकों व्यक्तियों ने गायत्री उपासना की है। उन्हें सांसारिक और आत्मिक जो आश्चर्यजनक लाभ हुए हैं, हमने अपनी आँखों देखे हैं।



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What am I?

Preface

There are several things worth knowing in this world. There are various fields of knowledge and many paths needing exploration. There are several branches of science which come within the normal purview of mans curiosity. Why, How, Where, When, are the questions in every field. This inquisitive tendency of knowing is mainly responsible for such rich store of knowledge. In reality, knowledge is the light house of life.The question about knowledge of self is most important amongst various objects of inquiry. We know several superficial things or make efforts to know them but we forget What we are in ourselves. Without knowing the Self the life becomes agitated, uncertain and prickly. In the absence of this knowledge regarding his real self, a person spends his time in deliberating about insignificant things and indulges in unbelievable acts. The only path to true happiness and comfort is Knowledge of Self.This book contains instructions about the knowledge of Self. What am I?. The answer to this question has not been given in words, but an effort has been made to impart it through austerity and practice.It is hoped that this book will prove useful to the aspirants of spiritualism.

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Pragya Puran Set - (4 items)



कथा-सहित्य की लोकप्रियता के संबंध में कुछ कहना व्यर्थ होगा। प्राचीन काल में 18 पुराण लिखे गए। उनसे भी काम न चला तो 18 उपपुराणों की रचना हुई। इन सब में कुल मिलाकर 10,000,000 श्लोक हैं, जबकि चारों वेदों में मात्र 20 हजार मंत्र हैं। इसके अतिरिक्त भी संसार भर में इतना कथा साहित्य सृजा गया है कि उन सबको तराजू के पलड़े पर रखा जाए और अन्य साहित्य को दूसरे पर कथाऐं भी भारी पड़ेंगी। 

समय परिवर्तनशील है। उसकी परिस्थितियाँ, मान्यताएं, प्रथाऐं, समस्याऐं एवं आवश्यकताऐं भी बदलती रहती हैं। तदनुरुप ही उनके समाधान खोजने पड़ते हैं। इस आश्वत सृष्टिक्रम को ध्यान में रखते हुए ऐसे युग साहित्य की आवश्यकता पड़ती रही है, जिसमें प्रस्तुत प्रसंगो प्रकाश मार्गदर्शन उपलब्ध हो सके। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अनेकानेक मनःस्थिति वालों के लिए उनकी परिस्थिति के अनुरूप समाधान ढूँढ़ निकालने में सुविधा दे सकने की दृष्टि से इस प्रज्ञा पुराण की रचना की गई, इसे चार खण्डों में प्रकाशित किया गया है। 

1. प्रज्ञा पुराण-1 
2 प्रज्ञा पुराण-2 
3 प्रज्ञा पुराण-3 
4 प्रज्ञा पुराण-4 

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