Monday, 6 March 2017
Four Pillars Of Self Development
(Translation of a discourse by Poojya Gurudev Pandit Shriram
Sharma Acharya on Atmonnati Ke Char Adhara delivered in 1980)
Let us begin with the collective chanting of the Gayatri Mantra:
Om Bhur Buvah Swah, Tatsaviturvarenyath Bhargo Devasya Dhimahi, Dhiyo Yonah Prachodayat !
Sisters and Brothers,
Our Yug Nirman mission has been organized as a laboratory. In a laboratory of chemistry, new chemicals and compounds are invented and presented to the world with a demonstration of their properties and use. Our mission is experimenting on the formulae, on the workable and viable plans for spiritual ascent and reconstruction of the world. Our Yug Nirman mission is a man-making odyssey. It is developed like a nursery to nurture good qualities, to produce enlightened talents. As you know, saplings of a variety of plants and trees are grown in a nursery and supplied to different gardens where they blossom with beautiful flowers and nutritious fruits.
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Saturday, 4 March 2017
स्वस्थ रहने के सरल उपाय
हम खाना क्यों खाते है?
जब से हम जन्म लेते हैं शरीर को शक्ति की आवश्यकता होती है ।। शक्ति के दो प्रमुख स्रोत हैं- १ .नींद २. भोजन
नींद तो अनिवार्यत: सब को लेनी ही पड़ती है ।। एक दो दिन भी कम हो गई तो शरीर हाथ के हाथ उसको पूरा करने को मजबुर होता है ।।
भोजन हम दो कारणों से करते हैं- १. शक्ति के लिये २. स्वाद के लिये आरम्भ से ही शक्ति और स्वाद में कुश्ती चलती है और देखा यह गया है कि इस कुश्ती में स्वाद जीतता है और शक्ति पीछे रह जाती है ।। कई चीजें तो हम -केवल इसीलिये खा- पी लेते हैं कि वे स्वादिष्ट लगती हैं चाहे उनमें शक्ति है या नहीं या चाहे वे अंतत: नुकसान ही करें । कहने को तो कहते हैं कि ' हम जीने के लिये खाते हैं ' पर वस्तुत: यह पाया जाता है कि ' हम खाने के लिये जीते हैं '।
हम खाना पका कर क्यों खाते हैं?
यों तो हम कहते हैं कि खाने की वस्तुओं में कई कीड़े इत्यादि रहने हैं अत: हम पकाकर खाते हैं, पर मुख्यत: स्वाद के लिए ही पकाकर खाते हैं ।। यद्यपि हम जानते हैं कि पकाने से भोजन की पौष्टिकता निश्चित रूप से कम हो जाती है, फिर भी स्वाद व सुविधा के लिए हम पका कर ही खाना खाते हैं ।।
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समाज का मेरुदण्ड सशक्त परिवार तंत्र -48
प्रजातंत्र की एक सशक्त इकाई के रूप में परिवार संस्था को माना
गया है। व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में परिवार
का नाम लिया जाता है। व्यक्ति को उठाने-गिराने में पारिवारिक वातावरण का
जितना प्रभाव पड़ता है, उतना अन्य समस्त साथियों एवं माध्यमों के संयुक्त
साधनों का कदाचित ही पड़ता है। सुसंस्कृत परिजनों के बीच मनुष्य गरीबी में
भी जीवनयापन कर सकता है; परन्तु गृह–कलह के बीच तो संपन्नता भी नीरस और
असह्य हो जाती है। भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता रही है कि
इसमें परिवार संस्था को अत्याधिक महत्व दिया जाता रहा है। परिवार निर्माण
की, समाज के नव-निर्माण एवं राष्ट्रोत्थान की सदा से आवश्यकता समझी जाती
रही है। समाज के विकास के लिए उसके मेरुदण्ड परिवार के समग्र निर्माण को
अपने कार्यक्रम में प्रधानता देने के कारण ही हमारे ऋषिगण परिवार संस्था को
एक आदर्श इकाई बनाकर हमें धरोहर के रूप में दे गए। श्रेष्ठ व्यक्तित्वों
के समाज रूपी उद्यान में सुगंधित पुष्पों के समान खिलने के लिए परिवार ही
नन्दन वन की भूमिका निभाता है। परमपूज्य गुरुदेव ने जीवन भर एक ही बात पर
जोर दिया कि समाज में श्रेष्ठ सद्गृहस्थ अधिक से अधिक संख्या में विकसित
हों, ताकि सुसंततियाँ जन्म लें और सतयुगी समाज की पृष्ठभूमि बन सके।
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व्यक्तित्व परिष्कार की साधना
मनुष्य शरीर परमात्मा का सर्वोपरि अनुग्रह माना गया है, पर यह उस
खजाने की तरह है, जो गड़ा तो अपने घर में हो, पर जानकारी रत्ती भर न हो।
यदि किसी के मन में अध्यात्म साधनाओं के प्रति श्रद्धा और जिज्ञासा का
अंकुर फूट पड़े, तो उस परमात्मा के छिपे खजाने की जानकारी दे देने जैसा
प्रत्यक्ष वरदान समझना चाहिए। ऐसे अवसर जीवन में बड़े सौभाग्य से आते हैं।
इस पुस्तिका को आप अपने लिए परम पूज्य गुरुदेव का ‘परा संदेश’’ समझकर पढ़ें
और निष्ठापूर्वक अनुपालन करें।
व्यक्तिगत रूप से साधनायें अन्तःकरण की प्रसुप्त शक्तियों का जागरण करती हैं। उनका जागरण जिस अभ्यास से होता है, उसे साधना-विज्ञान कहते हैं। इस क्षेत्र में जितना आगे बढ़ा जाये, उतने दुर्लभ मणिमुक्तक करतलगत होते चले जाते हैं। पर इस तरह की साधनायें समय-साध्य भी होती है, तितीक्षा साध्य भी। परम पू. गुरुदेव ने आत्म शक्ति से उनका ऐसा सरल स्वरूप विनिर्मित कर दिया है, जो बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी के लिए सरल और सुलभ है, लाभ की दृष्टि से भी ये अभ्यास असाधारण है।
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मरें तो सही पर बुद्धिमत्ता के साथ
यों कहने को तो सभी कहते हैं कि जो जन्मा है सो मरेगा । इसलिए
किसी की मृत्यु पर दुःख मनाते हुए भी यह नहीं कहा जाता है कि यह अनहोनी
घटना घट गई । देर-सबेर मेंआगे-पीछे मरना तो सभी को है, यह मान्यता रहने के
कारण रोते-धोते अंतत: संतोष कर ही लेते हैं । जब सभी को मरना है तो अपने
स्वजन-संबंधी ही उस काल-चक्र से कैसे बच सकते हैं?
लोक मान्यताओं की बात दूसरी है, पर विज्ञान के लिए यह प्रश्न काफी जटिल है । परमाणुओं की तरह जीवाणु भी अमरता के सन्निकट ही माने जाते हैं । जीवाणुओं की सरचना ऐसी है, जो अपना प्रजनन और परिवर्तन क्रम चलाते हुए मूलसत्ता को अक्षुण्ण बनाए रहती है । जब मूल इकाई अमर है तो उसका समुदाय-शरीर क्यों मर जाता है? उलट-पुलटकर वह जीवित स्थिति में ही क्यों नहीं बना रहता ? उनके बीच जब परस्पर सघनता बनाए रहनेवाली चुंबकीय क्षमता का अविरल स्रोत विद्यमान है, तो कोशाओं के विसंगठित होने और बिखरने का क्या कारण है? थकान से गहरी नींद आने और नींद पूरी होने पर फिर जग पड़ने की तरह ही मरना और मरने के बाद फिर जी उठना क्यों संभव नहीं हो सकता ?
बैक्टीरिया से लेकर अमीबा तक के दृश्यमान और अदृश्य जीवधारी अपने ही शरीर की उत्क्रांति करते हुए अपनी ही परिधिमें जन्म-मरण का चक्र चलाते हुए प्रत्यक्षत: अपने अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रहते हैं । फिर बड़े प्राणी ही क्यों मरते हैं ? मनुष्यको ही क्यों मौत के मुँह में जाने के लिए विवश होना पड़ता है?
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