Monday, 17 April 2017

ज्ञान यज्ञ प्रचारक बनें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=714हमारे गुरु के इशारे पर हम कठपुतली के तरीके से नाचते रहे ।। उनके इशारे का हमको ध्यान है ।। आज युगदेवता का, महाकाल का इशारा यह है कि हमको जनजाग्रति के लिए काम करना चाहिए ।। हमको नवयुग लाने के लिए घर- घर में संदेश पहुँचाना चाहिए ।। विचार क्रांति अभियान आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि इस युग की सभी समस्याएँ इसलिए पैदा हुई हैं कि आदमी की अक्ल खराब हो गई है ।। न पैसा कम है, न कोई चीज कम है ।। अक्ल खराब है ।। अक्ल ठीक करने के लिए हमको विचार क्रांति में हिस्सा लेना चाहिए ।। व्यक्ति और समाज, देश और धर्म- संस्कृति के लिए मानवीय भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए हमको एक काम करना चाहिए कि ज्ञानयज्ञ के विस्तार के लिए पूरी कोशिश करें, प्रयास करें ।। घर- घर में जाएँ, जन- जन के पास जाएँ, अलख जगाए, नवयुग का संदेश सुनाएँ और यह कहें कि आदमी को कृपणता छोड़नी चाहिए ।। अपनी मनःस्थिति को ऊँचा बनाना चाहिए ।। चिंतन और चरित्र में उँचाइयों का, उत्कृष्टता का समावेश करना चाहिए ।। क्रिया- कलापों में आदर्शवादिता का समन्वय करना चाहिए यही हमारा विचार क्रांति अभियान है ।।

मित्रो ! अक्ल को बढ़ाने के लिए जनमानस के परिष्कार के लिए युग देवता ने, महाकाल ने पुकार लगाई है ।। अगर आप कृपणता को त्यागने के लिए तैयार हों, सेवावृत्ति के लिए उदारता है तैयार हों तो मैं आपसे वायदा करता हूँ कि गायत्री माता का वह चमत्कार जो ऋषियो को मिला था, ब्राह्मणों के मिला था और हमको मिला है- उसका लाभ आप भी उठा सकेगें ।। 

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गायत्री परिवार का लक्ष्य

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=568गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ को भारतीय धर्म का पिता माना जाता है ।। गायत्री का संदेश है- सद्विचार, विवेक, सद्भावना, आध्यात्मिक उच्चस्तर, मानवता के आदर्शों की अभिव्यक्ति ।। यज्ञ का तत्त्वज्ञान है- त्याग, सत्कर्म, सदाचार, संयम, सेवा, सामूहिकता, सहिष्णुता, सहयोग, स्नेह, उदारता, श्रमशीलता, तितिक्षा ।। गायत्री हमें मानसिक दृष्टि से महान बनने की प्रेरणा देती है और यज्ञ की शिक्षा सांसारिक दृष्टि से आदर्शवादी, धर्मनिष्ठ, कर्त्तव्यपरायण महापुरुष बनने की है ।।

गायत्री और यज्ञ की उपासना को धर्म- कर्मों में प्राथमिक स्थान देकर ऋषियों ने मानवता के आदर्शों में मनुष्य को लगाए रखने का प्रयत्न किया है ।। यों गायत्री और यज्ञ के असंख्यों वैज्ञानिक लाभ हैं, इनके द्वारा अनेक समस्याओं को सुलझाने का भारी उपयोग भी है ।। पर यहाँ इस पुस्तक में इस दृष्टिकोण से विचार करेंगे कि गायत्री यज्ञ की धर्म प्रवृत्ति को एक आंदोलन का रूप देकर हम किस प्रकार नैतिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की ओर अग्रसर हो सकते हैं ।।

प्रतीक पूजा के रूप में भी गायत्री और यज्ञ को सद्विचारों एवं सत्कार्यों का माध्यम बताकर इनकी आवश्यकता समझाने तथा अपनाने के लिए जनसाधारण को प्रेरित करने का लक्ष्य स्थिर किया गया है ।। कपड़े का छोटा सा तिरंगा झंडा जिस प्रकार राष्ट्रीयता का, राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना जाता है, उसका अभिवदन किया जाता है, उसी प्रकार सद्विचारों और सत्कार्यों के प्रतीक के रूप में सर्वत्र गायत्री तथा यज्ञ का अभिवंदन- पूजन- अर्चन हो तो इससे मानवता एवं नैतिकता के आदर्शों को प्रोत्साहन मिलना स्वाभाविक ही है ।। 

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क्रान्ति की करवट

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=547"मनुष्यता समय-समय पर ऐसी आश्चर्यजनक करवटें लेती रही है, जिसके अनुसार देव मानवों का नया बसन्त, नयी कोपलें, नई कलियों और नए फल-फूलों की सम्पदा लेकर सभी दिशाओं में अट्टहास करता दीख पड़ता है ।"

क्रान्ति की ये करवटें परिवर्तन का प्रचण्ड प्रवाह उत्पन्न करती हैं । जिसमें जाने- अनजाने, चाहे-अनचाहे सभी इसके साथ बहने के लिए विवश हो जाते हैं । स्वाधीनता संग्राम के दिनों में भी ऐसी ही हलचलें, ऐसा ही प्रवाह उत्पन्न हुआ था । इसके बारे में उन दिनों महाराष्ट्र के सन्त गजानन महाराज से उनके एक भक्त ने पूछा- महाराज! इन दिनों जो हलचलें हो रही हैं, उससे लगता है कि कोई बड़ी क्रान्ति होने को है ।

गजानन महाराज पहले तो गम्भीर बने रहे फिर बोले- यह तो बस पृष्ठभूमि है । बड़ी क्रान्ति-महाक्रान्ति का बीजारोपण तो सन् १९११ में अवतारी महामानव के जन्म के साथ होगा । तब देश और दुनिया में ये हलचलें तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम होती जाएँगी । बड़े विप्लव खड़े होंगे, युद्ध और महायुद्धों की विभीषिकाएँ जन्म लेगी । 

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इक्कीसवी सदी का संविधान

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1253युग निर्माण जिसे लेकर गायत्री परिवार अपनी निष्ठा और तत्परतापूर्वक अग्रसर हो रहा है, उसका बीज सत्संकल्प है । उसी आधार पर हमारी सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम संचालित होते हैं, इसे अपना घोषणा-पत्र भी कहा जा सकता है । हम में से प्रत्येक को एक दैनिक धार्मिक कृत्य की तरह इसे नित्य प्रातःकाल पढ़ना चाहिए और सामूहिक शुभ अवसरों पर एक व्यक्ति उच्चारण करे और शेष लोगों को उसे दुहराने की शैली से पढा़ एवं दुहराया जाना चाहिए ।

संकल्प की शक्ति अपार है । यह विशाल ब्रह्मांड परमात्मा के एक छोटे संकल्प का ही प्रतिफल है । परमात्मा में इच्छा उठी एकोऽहं बहुस्याम मैं अकेला हूँ-बहुत हो जाऊँ, उस संकल्प के फलस्वरूप तीन गुण, पंचतत्त्व उपजे और सारा संसार बनकर तैयार हो गया । मनुष्य के संकल्प द्वारा इस ऊबड़- खाबड़ दुनियाँ को ऐसा सुव्यवस्थित रूप मिला है । यदि ऐसी आकांक्षा न जगी होती, आवश्यकता अनुभव न होती तो कदाचित् मानव प्राणी भी अन्य वन्य पशुओं की भाँति अपनी मौत के दिन पूरे कर रहा होता । 

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Saturday, 15 April 2017

अमृत कण प्रथम भाग

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1257परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी की सुपुत्री सबके लिए श्रद्धा की प्रतिमूर्ति श्रद्धेया शैल जीजी के अश्वमेधों में दिए गये उद्बोधन की संकलित पुस्तिका "अमृतकण" को पाकर मन प्रसन्न है । नब्बे के दशक में आयोजित अश्वमेध यज्ञों के क्रम में दिये गये इन प्रवचनों में परम वंदनीया माताजी के साथ बिताये पल याद आ जाते हैं । नवयुग का दशमावतार-प्रज्ञावतार (भिलाई-छत्तीसगढ़ अश्वमेध महायज्ञ में दिया उद्बोधन), भाव सम्वेदना जगाएँ (जबलपुर म०प्र० अश्वमेध), समय की चुनौती स्वीकार करें (इन्दौर म०प्र०अश्वमेध), नारी की महत्ता (बुलन्दशहर उ०प्र०), मन्यु जगाएँ अनीति भगाएँ (भोपाल म०प्र०), आसुरी शक्तियों से लड़ने की सामर्थ्य जगायें (आँवलखेड़ा प्रथम महापूर्णाहुति), नारी का गौरव बनाएँ रखें (राजकोट-गुजरात), सहेजेंगे आपका प्यार (विदाई प्रवचन बुलन्दशहर) जैसे शीर्षकों द्वारा इसका प्रतिपादन किया गया है ।

श्रद्धेया शैल जीजी के मुखारविन्द से निकली ये पंक्तियों मानों परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी की ओर से बरसाये जाने वाले आशीर्वाद के शब्द का मूर्त रूप है-इसे उपस्थित हर परिजन ने न केवल अनुभव किया अपितु इन पंक्तियों के पाठक उसे अभी भी उसी रूप में अनुभव करेंगे । 

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अनाचार से कैसे निपटें?

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=435विकासवादी डार्विन के अनुसार मनुष्य क्षुद्र योनियों बंदर से मनुष्य बना है ।। धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से वह चौरासी लाख निम्नस्तरीय योनियों में भ्रमण करते हुए मानवी काया के चरम शिखर तक पहुँचा है ।। जन्म मिल जाने पर भी पूर्व संचित कुसंस्कारों से पूरी तरह छुटकारा नहीं मिलता, पशु- प्रवृत्तियों के बीजांकुर जड़ जमाए बैठे रहते हैं और अनुकूल अवसर मिलते ही उनकी पूर्व परम्परा उभर पड़ती है ।। यदि सुधार, अनुशासन, प्रशिक्षण का विशिष्ट प्रयत्न न किया जाए, तो अनगढ़ मनुष्य भी स्वेच्छाचारिता अपना लेता है और उस प्रकार का दृष्टिकोण, क्रिया- कलाप अपना लेता है जैसा कि पशुओं के आचरण में देखा जाता है ।।

भगवान की इसे मनुष्य पर विशेष भूमिका अनुकंपा ही समझना चाहिए कि उसे उच्चस्तरीय संरचना वाला शरीर और मस्तिष्क मिला है ।। इन्हीं के आधार पर वह ऐसे प्रयास कर सका और उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सका, जो अन्य शरीरधारियों में बलिष्ठ समझे जाने वालों के लिए भी संभव नहीं हैं ।। इतने पर भी कुछ काम मनुष्य को स्वयं भी करने पड़ते हैं, जिनके आधार पर उसका आचरण सभ्य और मानस सुसंस्कृत बन सके ।। इसे शिक्षा या विद्या कहते हैं ।। यह मानवी प्रयास है इसका दार्शनिक ढाँचा और आचार व्यवहार तो पूर्ववर्ती देव मानव बना गए हैं, पर उसे गहराई से समझना स्वभाव- अभ्यास में उतारना और व्यवहार में चरितार्थ करने की विधि- व्यवस्था मनुष्य को वैयक्तिक या सामूहिक रूप से स्वयं ही बनानी पड़ती है ।। 

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गायत्री महाविज्ञान संयुक्त

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=12गायत्री वह दैवी शक्ति है जिससे सम्बन्ध स्थापित करके मनुष्य अपने जीवन विकास के मार्ग में बड़ी सहायता प्राप्त कर सकता है। परमात्मा की अनेक शक्तियाँ हैं, जिनके कार्य और गुण पृथक् पृथक् हैं। उन शक्तियों में गायत्री का स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यह मनुष्य को सद्बुद्धि की प्रेरणा देती है। गायत्री से आत्मसम्बन्ध स्थापित करने वाले मनुष्य में निरन्तर एक ऐसी सूक्ष्म एवं चैतन्य विद्युत् धारा संचरण करने लगती है, जो प्रधानतः मन, बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण पर अपना प्रभाव डालती है। बौद्धिक क्षेत्र के अनेकों कुविचारों, असत् संकल्पों, पतनोन्मुख दुर्गुणों का अन्धकार गायत्री रूपी दिव्य प्रकाश के उदय होने से हटने लगता है। यह प्रकाश जैसे- जैसे तीव्र होने लगता है, वैसे- वैसे अन्धकार का अन्त भी उसी क्रम से होता जाता है। मनोभूमि को सुव्यवस्थित, स्वस्थ, सतोगुणी एवं सन्तुलित बनाने में गायत्री का चमत्कारी लाभ असंदिग्ध है और यह भी स्पष्ट है कि जिसकी मनोभूमि जितने अंशों में सुविकसित है, वह उसी अनुपात में सुखी रहेगा, क्योंकि विचारों से कार्य होते हैं और कार्यों के परिणाम सुख- दुःख के रूप में सामने आते हैं। जिसके विचार उत्तम हैं, वह उत्तम कार्य करेगा, जिसके कार्य उत्तम होंगे, उसके चरणों तले सुख- शान्ति लोटती रहेगी। गायत्री उपासना द्वारा साधकों को बड़े- बड़े लाभ प्राप्त होते हैं। हमारे परामर्श एवं पथ- प्रदर्शन में अब तक अनेकों व्यक्तियों ने गायत्री उपासना की है। उन्हें सांसारिक और आत्मिक जो आश्चर्यजनक लाभ हुए हैं, हमने अपनी आँखों देखे हैं। 

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