Monday, 8 August 2016

गुरु गीता

 गुरु गीता

 Preface

गुरुगीता शिष्यों का हृदय गीत है ।। गीतों की गूँज हमेशा हृदय के आँगन में ही अंकुरित होती है ।। मस्तिष्क में तो सदा तर्कों के संजाल रचे जाते हैं ।। मस्तिष्क की सीमा बुद्धि की चहार दीवारी तक है, पर हृदय की श्रद्धा सदा विराट् और असीम है ।। मस्तिष्क तो बस गणितीय समीकरणों की उलझनों तक सिमटा रहता है ।। इसे अदृश्य, असम्भव, असीम एवं अनन्त का पता नहीं है ।। मस्तिष्क मनुष्य में शारीरिक- मानसिक संरचना क्रिया की वैज्ञानिक पडताल कर सकता है, परन्तु मनुष्य में गुरु को ढूँढ लेना और गुरु में परमात्मा को पहचान लेना हृदय की श्रद्धा का चमत्कार है ।।

गुरुगीता के महामंत्र इसी चमत्कारी श्रद्धा से सने हैं ।। इसकी अनोखी - अनूठी सामर्थ्य का अनुभव श्रद्धावान् कभी भी कर सकते हैं ।। योगेश्वर श्रीकृष्ण के वचन हैं- "श्रद्धावान् लभते ज्ञानं" जो श्रद्धावान् हैं, वही ज्ञान पाते हैं ।। यह श्रद्धा बडे दुस्साहस की बात है ।। कमजोर के बस की बात नहीं है, बलवान् की बात है ।। श्रद्धा ऐसी दीवानगी है कि जब चारों तरफ मरुस्थल हो और कहीं हरियाली का नाम न दिखाई पड़ता हो, तब भी श्रद्धा भरोसा करती है कि हरियाली है, फूल खिलते हैं ।। जब जल का कहीं कण भी न दिखाई देता हो, तब भी श्रद्धा मानती है कि जल के झरने हैं, प्यास तृप्त होती है ।। जब चारों तरफ पतझड हो तब भी श्रद्धा में वसन्त ही होता है ।।

जो शिष्य हैं, उनकृा अनुभव यही कहता है कि श्रद्धा में वसन्त का मौसम सदा ही होता है ।। श्रद्धा एक ही मौसम जानती है- वसन्त ।। बाहर होता रहे पतझड़, पतझड़ के सारे प्रमाण मिलते रहें, लेकिन श्रद्धा वसन्त को मानती है ।। इस वसन्त में भक्ति के गीत गूँजते हैं ।।

 
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प्रज्ञापुराण कथामृत (बडा़ संस्करण) Part -1

प्रज्ञापुराण कथामृत (बडा़ संस्करण) Part -1

 

Preface

भारतीय संस्कृति के उपासक आचार्य पं. श्रीराम शर्मा जी द्वारा रचित प्रज्ञा पुराण को उनके समस्त साहित्य सागर का सार कहा जा सकता है । कथा साहित्य की लोकप्रियता को देखते हुए आचार्य श्री ने प्रज्ञा पुराण की रचना की, जिसमें आधुनिक परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं के अनुरूप कथाओं के माध्यम से मानव के अचिंत्य चिंतन को बदलने के उद्देश्य से दैनंदिन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है । प्रज्ञा पुराण ग्रंथ रामायण तथा गीता के समान ही प्रेरणा प्रद है ।

आधुनिक युग की इस प्रेरक कृति प्रज्ञा पुराण को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य को लेकर इस पुस्तक की रचना की गई है । प्रज्ञा पुराण का मूल ग्रंथ संस्कृत में है, उन श्लोकों की हिन्दी में व्याख्या कर कथाओं के द्वारा युग चेतना जगाने का प्रयत्न किया गया है । संगीत की लोकप्रियता सर्वविदित है, उसमें हृदय तंत्री को झंकृत करने की अपूर्व क्षमता है, अत: मनोरंजन के साथ साथ जन कल्याण की भावना को ध्यान में रखकर प्रज्ञा पुराण कथामृतम् ( भाग दो) पुस्तक में श्लोकों की व्याख्या को राधेश्यामी तर्ज पर गेय पदों में प्रस्तुत किया गया है, जिससे प्रज्ञा पुराण का संदेश घर-घर, ग्राम-ग्राम, नगर- नगर तक पहुँच सके । लोक रंजन के साथ लोक मंगल का यह सर्व सुलभ मार्ग है ।

 

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Saturday, 6 August 2016

आत्मा वा अरे ज्ञातव्य:

शरीर का ही नहीं - आत्मा का भी ध्यान रखें

इस बात से जा भी इनकार नहीं किया जा सकता कि मानव जीवन में शरीर का महत्त्व कम नहीं है ।। शरीर की सहायता से ही संसार यात्रा संभव होती है ।। शरीर द्वारा की हम उपार्जन करते हैं और उसी के द्वारा हम सारी क्रियाएँ सम्पन्न करते हैं ।। यदि मनुष्य को शरीर प्राप्त न हो, तो वह तत्व रूप से कुछ भी करने में समर्थ न हो ।।

यदि एक बार मानव- शरीर के इस महत्व को गौण भी मान लिया जाये, तब भी शरीर का यह महत्त्व तो प्रमुख है ही कि आत्मा का निवास उसी में होता है ।। उसे पाने के लिए किए जाने वाले सब प्रयत्न उसी के द्वारा सम्पादित होते हैं ।। सारे आध्यात्मिक कर्म जो आत्मा को पाने, उसे विकसित करने और बन्धन से मुक्त करने के लिए अपेक्षित  होते हैं, शरीर को सहायता से ही सम्पन्न होते हैं ।। अत: शरीर का महत्त्व बहुत है ।। तथापि जब इसको आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे दिया जाता है, तब यही शरीर जो संसार बन्धन से मुक्त होने में हमारी एक मित्र को तरह सहायता करता है, हमारा शत्रु बन जाता है ।। अधिकार से अधिक शरीर को परवाह करने और उसकी इन्दियों की सेवा करते रहने से, शरीर और उसके विषयों के सिवाय और कुछ भी याद न रखने से वह हमें हर ओर से विभोर बनाकर अपना दास बना लेता है और दिन- रात अपनी ही सेवा में तत्पर रखने के लिए दबाव में आ जाने वाला व्यक्ति कमाने- खाने और विषयों को भोगने के सिवाय- इससे आगे की कोई बात सोच ही नहीं पाता ।। उसका सारा ध्यान शरीर और उसकी आवश्यकताओं तक ही केन्द्रित हो जाता है ।। वह शरीर और इन्दियों की क्षमता में बँधकर अपनी सारी शक्ति जिसका उपयोग महत्तर कार्यों में
किया जा सकता है, शरीर को सेवा में समाप्त कर देता है ।


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अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य

Preface

पिता एक ऐसा शब्द है, जिसका उच्चारण करते ही निश्चिन्ततापूर्ण संरक्षण की अनुभूति होती है। पूज्य आचार्यश्री एक वृहद् परिवार के पिता थे। एक ऐसा परिवार, जिसके सदस्यों को उन्होंने एक खास मकसद के लिए दुनिया के कोने-कोने से तलाशा व तराशा था। वह उनके संरक्षण और विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। वह बहुत दूर बैठकर भी अपने एक-एक बच्चे का ध्यान रखते थे। उनका हर शिष्य आज भी सदैव उनके स्नेहिल संरक्षण में होने की स्पष्ट अनुभूति करता है और अपने शिष्यों के साथ उनके अलग-अलग रूपों में होने के प्रमाण हमें आये दिन मिलते रहते हैं। दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से संतप्त इस संसार में पूज्यवर ने अपने मानसपुत्रों को कई बार आसन्न संकटों से बचाया। गायत्री परिवार का इतिहास ऐसी अनेकानेक घटनाओं से भरा पड़ा है।

आचार्यवर द्वारा स्थापित गायत्री परिवार के सहस्रों कार्यकर्ता, लाखों-लाख उनके पुत्र व पुत्रियाँ ऐसी कई घटनाओं के स्वयं साक्षी हैं। इन अद्भुत् घटनाओं की गिनती करना, इन्हें किसी पुस्तक में बाँध पाना असंभव-सा काम है। फिर भी, कदम-कदम पर प्राप्त होते रहे युगऋषि के अद्भुत् अनुदानों को लेकर जन्मशताब्दी वर्ष में रोम-रोम से कृतज्ञता व्यक्त करते हुए श्रद्धासुमन के रूप में प्रस्तुत हैं- पूज्यवर के वरदपुत्रों द्वारा अभिव्यक्त कुछ अविस्मरणीय अनुभूतियाँ।




अंतर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान भाग-२

Preface

परम पूज्य गुरुदेव एवं महर्षि पतंजलि में अद्भुत साम्य है । अध्यात्म जगत् में इन दोनों की उपस्थिति अत्यन्त विरल है । ये दोनों ही अध्यात्म के शिखर पुरुष हैं, परन्तु वैज्ञानिक हैं । वे प्रबुद्ध हैं- बुद्ध, कृष्ण, महावीर एवं नानक की भांति लेकिन इन सबसे पूरी तरह से अलग एवं मौलिक हैं । बुद्ध, कृष्ण महावीर एवं नानक-ये सभी महान् धर्म प्रवर्तक हैँ इन्होंने मानव मन और इसकी संरचना को बिल्कुल बदल दिया है, लेकिन उनकी पहुँच, उनका तरीका वैसा सूक्ष्मतम स्तर पर प्रमाणित नहीं है । जैसा कि पतंजलि का है ।

जबकि महर्षि पतंजलि एवं वेदमूर्ति गुरुदेव अध्यात्मवेत्ताओं की दुनिया के आइंस्टीन हैं । वे अदभुत घटना हैं । वे बड़ी सरलता से आइंस्टीन, बोर, मैक्स प्लैंक या हाइज़ेनबर्ग की श्रेणी में खड़े हो सकते हैं । उनकी अभिवृत्ति और दृष्टि ठीक वही है, जो एकदम विशुद्ध वैज्ञानिक मन की होती है । कृष्ण कवि हैं, कवित्व पतंजलि एवं गुरुदेव में भी है । किन्तु इनका कवित्व कृष्ण की भांति बरबस उमड़ता व बिखरता नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रयोगों में लीन हो जाता है । पतंजलि एवं गुरुदेव वैसे रहस्यवादी भी नहीं हैं जैसे कि कबीर हैं । ये दोनी ही बुनियादी तौर पर वैज्ञानिक हैं जो नियमों की भाषा में सोचते-विचारते हैं । अपने निष्कर्षों को रहस्यमय संकेतों के स्वर में नहीं, वैज्ञानिक सूत्रों के रूप में प्रकट करते हैं ।

अदभुत है इन दोनों महापुरुषों का विज्ञान । ये दोनों गहन वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं, परन्तु उनकी प्रयोगशाला पदार्थ जगत् में नहीं, अपितु चेतना जगत् में है । वे अन्तर्जगत् के वैज्ञानिक हैं और इस ढंग से वे बहुत ही विरल एवं विलक्षण हैं ।
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Fruits Of Contentment

Preface

Stories have always been very useful for overall development of children. Short Stories sow the seeds of knowledge and moral ideas in their mind. Through these stories children learn to differentiate between good and bad, friend and foe. Stories are considered to be most effective medium for personality development of children and for giving them good sanskars. Previously, grandmothers (dadi & nani) used to tell inspiring stories to children. But these days this important art is being neglected. Yug Nirman Yojna has published Picture Books containing short stories which will entertain, guide and inspire the children and elders both.


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चेतना का सहज-स्वभाव, स्नेह-सहयोग

Preface

प्रकृति का प्रत्येक घटक अपने एक निश्चित नियम के अनुसार जन्म लेता और विकास करता है । यह नियम-व्यवस्था किन्हीं विशिष्ट क्षेत्रों के लिए ही लागू नहीं होती, बल्कि जहाँ कहीं भी प्रगति, विकास और गतिशीलता दिखाई देती है, वहाँ यही नियम काम करते दिखाई देते हैं ।

समझा जाता है कि मनुष्य ने इस प्रकृति में अन्य सभी प्राणियों से अधिक उन्नति तथा विकास किया है । उस उन्नति और विकास का श्रेय उसकी बुद्धिमत्ता को दिया जाता है । मनुष्य की बुद्धिमत्ता को उसकी प्रगति का आधार मानने में कोई हर्ज भी नहीं है क्योंकि उसने बुद्धिबल से ही अन्य प्राणियों की तुलना में इतनी अधिक उन्नति की है, जिससे सृष्टि का मुकुटमणि बन सकने का श्रेय उसे प्राप्त हो सका । इस मान्यता में यदि कुछ तथ्य है तो उसमें एक संशोधन यह और करना पड़ेगा कि बुद्धिमत्ता उसे सहकारिता के आधार पर ही उपलब्ध हुई है । क्या मनुष्य ने उन्नति अपनी मस्तिष्कीय विशेषता के कारण की है ? मोटी बुद्धि ही इस मान्यता का अंधा समर्थन कर सकती है । सूक्ष्म चिंतन का निष्कर्ष यही होता है कि कोई-न-कोई आत्मिक सद्गुण ही उसके मस्तिष्क समेत अनेक क्षमताओं को विकसित करने का आधार हो सकता है । महत्त्वपूर्ण प्रगति न तो शरीर की संरचना के आधार पर संभव होती है और न मस्तिष्कीय तीक्ष्याता पर अवतरित रहती है । उसका प्रधान कारण अंतःकरण के कुछ भावनात्मक तत्त्व ही होते हैं ।

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