Friday, 26 August 2016

Vedas Set - (8 Books)

1. ऋग्वेद-1 
2. ऋग्वेद-2 
3. ऋग्वेद-3 
4. ऋग्वेद-4
5. अथर्ववेद-01 
6. अथर्ववेद-02 
7. यजुर्वेद 
8. सामवेद 


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गृहस्थ में प्रवेश के पूर्व जिम्मेदारी समझें


Preface

गृहस्थ जीवन के लिए पूर्व तैयारी आवश्यक 

पाश्चात्य देशों में विवाह के पूर्व ही युवक- युवतियों को यौन विषयक जानकारी दी जानी आवश्यक समझी जाती है ।। हमारे यहाँ इस विषय को गोपनीय मानकर बच्चों को नहीं बताया जाता ।। यह कहना कि बच्चों के वयस्क होते- होते उन्हें यौन विषयक जानकारी दे देनी आवश्यक होती है ।। उचित मानें भी तो भी यह मत एकांगी ही ठहरता है ।। यौन विषयक जानकारी युवक- युवतियों के लिए उतनी आवश्यक नहीं है जितनी कि उन्हें विवाह के पूर्व वैवाहिक दायित्वों, विवाह की महत्ता और उसकी सफलता के तथ्यों का ज्ञान कराना आवश्यक है ।। इनका समुचित ज्ञान न होने के कारण या तो वे विवाहोत्तर जीवन की ऐसी काल्पनिक तस्वीर अपने मन- मस्तिष्क में लेकर चलते हैं कि जीवन के नग्न यथार्थ तो टकरा कर जब वह टूटती है तो है स्वयं भी बहुत कुछ टूट जाते हैं। ऐसी काल्पनिक तस्वीर दे न भी बनाएँ तो भी है शारीरिक व मानसिक तोर से उन बातों के लिए तैयार नहीं रह पाते जो उनके सामने आती हैं ।। विवाह जैसे महत्वपूर्ण दायित्व और व्यवस्था का न स्वयं पूरा लाभ उठा सकते हैं न समाज को और परिवार को ही उसका लाम है सकते हैं ।। 

आज तक अधिकांश माता- पिता विवाह को अनिवार्य तो मानते हैं ,, लड़के- लड़कियों के हाथ पीले करके गंगा नहाने की बात तो करते हैं, किन्तु उनका यह गंगा नहाना कितना अधूरा रहता है जब बच्चे विवाहोत्तर जीवन भार को उठा पाने में असमर्थ रहते हैं या बेगार की तरह गृहस्थी की गाड़ी खींचते रहते हैं ।। विवाह की अनिवार्यता को स्वीकारने के साथ ही उसकी सफलता के लिए बच्चों को शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक रूप से तैयार व समर्थ बनाना भी उतना ही महत्व रखता है, जितना कि विवाह करवा देना ।। "

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Saturday, 13 August 2016

अध्यात्म चेतना का ध्रुव केन्द्र देवात्मा हिमालय

Preface

पदार्थों और प्राणियों के परमाणुओं-जीवकोषों में मध्यवर्ती नाभिक ‘‘न्यूक्लियस’’ होते हैं। उन्हीं को शक्ति स्रोत्र कहा गया है और घिरे हुए परिकर को उसी उद्गम से सामर्थ्य मिलती है तथा अवयवों की सक्रियता बनी रहती है। यह घिरा हुआ परिकर गोल भी हो सकता है और चपटा अण्डाकार भी। यह संरचना और परिस्थितियों पर निर्भर है।

पृथ्वी का नाभिक उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव की परिधि में मध्य स्थान पर है। उनके दोनों सिरे अनेकानेक विचित्रताओं का परिचय देते हैं। उत्तरी ध्रुव लोक-लोकान्तरों से कास्मिक-ब्रह्माण्डीय किरणों को खींचता है। जितनी पृथ्वी को आवश्यकता है उतनी ही अवशोषित करती है और शेष को यह नाभिक दक्षिणी ध्रुव मार्ग से अन्तरिक्ष में नि:सृत कर देता है। इन दोनों छिद्रों का आवरण मोटी हिम परत से घिरा रहता है। उन सिरों को सुदृढ़ रक्षाकवच एवं भण्डारण में प्रयुक्त होने वाली तिजोरी की उपमा दी जा सकती है। प्राणियों के शरीरों और पदार्थ परमाणुओं में भी यही व्यवस्था देखी जाती है। अपने सौरमण्डल का ‘‘नाभिक’’ सूर्य है, अन्य ग्रह उसी की प्रेरणा से प्रेरित होकर अपनी-अपनी धुरियों और कक्षाओं में भ्रमण करते हैं।

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अध्यात्म चेतना का ध्रुव केन्द्र देवात्मा हिमालय 

 

ब्रह्मवर्चस की पंचाग्नि विद्या

Preface

साधना के सिद्धांत को अत्युक्तिपूर्ण और अतिरंजित तभी कहा जा सकता है, जब उसमें से आत्म- परिष्कार के तथ्य को हटा दिया जाए और मात्र क्रिया- कृत्यों के सहारे चमत्कारी उपलब्धियों का सपना देखा जाए ।।

मानवी सत्ता में परमात्म सत्ता की सभी विशिष्टताएँ बीज रूप में विद्यमान हैं ।। इस अनुदान में स्रष्टा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र के प्रति अपने अनुग्रह का अंत कर दिया ।। इतने पर भी उसने इतना रखा है कि पात्रता के अनुरूप उन विशिष्टताओं से लाभान्वित होने का अवसर मिले ।। जिस पात्रता का परिचय देने पर सिद्धियों का द्वार खुलता है वह और कुछ नहीं जीवन परिष्कार के निमित्त प्रस्तुत की गई पुरुषार्थपरायणता भर है ।।

साधना विधानों में प्रयुक्त होने वाले क्रिया- कृत्य अगणित हैं ।। पर उन सबका मूल उद्देश्य एक है- जीवन के अंतरंग पक्ष को सुसंस्कृत और बहिरंग पक्ष को समुन्नत बनाना ।। जो साधना अपने विधि- विधानों के सहारे साधक को सुसंस्कारिता की दिशा में जितना अग्रसर कर पाती है वह उतनी ही सफल होती है ।।

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ब्रह्मवर्चस की पंचाग्नि विद्या



Inspiring Stories

Preface

Stories have always been very useful for overall development of children. Short Stories sow the seeds of knowledge and moral ideas in their mind. Through these stories children learn to differentiate between good and bad, friend and foe. Stories are considered to be most effective medium for personality development of children and for giving them good sanskars. Previously, grandmothers (dadi & nani) used to tell inspiring stories to children. But these days this important art is being neglected. Yug Nirman Yojna has published Picture Books containing short stories which will entertain, guide and inspire the children and elders both.

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Awake O Talented And Come Forward

Preface

Awake! O Talented and Come Forward

Talents are God given. These are given to certain special persons for the reason that these will be considered God"s reserve for peoples welfare and that these special skills will not be employed for gratifying one"s lust or desire or ego, but for people"s welfare. Had the talented people understood this truth and kept in mind the special task imposed with the special skills, then the situation of the world would have been different today.

Hitler, the Supreme of fascist Germany, fully utilized the power of cinema for making the German people desirous of war. He used his vast propaganda machinery according to his likes and needs. The result was as desired every citizen of Germany had started dreaming of world conquest and every German citizen was willing to sacrifice everything to make his country a jewel in the crown of the world. By giving a proper direction to the propaganda machinery of cinema, the mind of the people can be changed to any desired direction. Today, when most film producers, singers, music directors and actors are…

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बुद्धि बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि

Preface

पूर्णत: बुद्धिहीन मनुष्य शायद कोई भी न होगा । जिसे हम मूर्ख या बुद्धिहीन कहते हैं, उसमें बुद्धि का बिलकुल अभाव नहीं होता । एक अध्यापक की दृष्टि में किसान मूर्ख है, क्योंकि वह साहित्य के विषय में कुछ नहीं जानता, किंतु परीक्षा करने परमालूम होगा कि किसान को खेती के संबंध में पर्याप्त होशियारी, सूझ और योग्यता है । एक वकील की दृष्टि में अध्यापक मूर्ख है, क्योंकि कानून की पेचीदगियों के बारे में कुछ नहीं जानता । इसी प्रकार एक डाक्टर की दृष्टि में वकील मूर्ख ठहरेगा, क्योंकि वह यह भी नहीं जानता कि जुकाम हो जाने पर उसकी क्या चिकित्सा करनी चाहिए ? सेठ जी की दृष्टि में पंडित भिख मंगे हैं, तो महात्मा जी की दृष्टि में सेठ जी चौकीदार हैं । इन सब बातों परविचार करते हुए ऐसा मनुष्य मिलना कठिन है, जो सर्वथा निर्बुद्धि कहा जा सके । दो मनुष्य यदि आपस में एक समान विषय काज्ञान रखते हैं, तो वे एक-दूसरे की दृष्टि में बुद्धिमान् हैं । यदि दोनों की योग्यताएँ अलग-अलग विषयों में हैं, तो वे प्राय:एक्-दूसरे को बुद्धिमान् न कहेंगे ।

यहाँ दो प्रश्न उपस्थित होते है -

( १) क्या बुद्धि का विकास बचपन में ही संभव है ?
(२) क्या सभी मनुष्य बुद्धिमान् हैं ? पहले प्रश्न के उत्तर में कहना चाहिए कि आरंभिक काल की शिक्षा अवश्य ही महत्वपूर्ण एवं सरल है । इनमें बीस वर्ष की आयु तकजो संस्कार जम जाते हैं, वे अगले चार-पाँच वर्षों में पुष्ट होकर जीवन भर बने रहते हैं ।

 
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