Friday, 20 January 2017

सम्रग स्वास्थ्य संवर्द्धन कैसे ?


http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=88अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं ।। संसार के सारे कार्य स्वास्थ्य पर निर्भर हैं ।। जिस काम के करने में किसी प्रकार की तकलीफ न हो, श्रम से जी न उकताए, मन में काम करने के प्रति उत्साह बना रहे और मन प्रसन्न रहे और मुख पर आशा की झलक हो, यही शरीर के स्वाभाविक स्वास्थ्य की पहचान है ।। स्वाभाविक दशा में बिना किसी प्रकार की कठिनाई के साँस ले सके, आँख की ज्योति और श्रवण शक्ति ठीक हो, फेफड़े ठीक- ठीक आँक्सीजन को लेकर कार्बन डाइआक्साइड को बाहर निकालते हों, आदमी के सभी निकास के मार्ग- त्वचा, गुदा, फेफड़े ठीक अपने कार्य को करते हों, वह व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ है ।। हम सभी लोग जानते हैं कि ऐसा आदमी ही बीमार पड़ता है जिसका जीवन नियमित नहीं है और प्रकृति के साथ पूरा- पूरा सहयोग नहीं कर रहा है ।। हमारा सदा सहायक सेवक शरीर है ।। ये चौबीस घंटे सोते- जागते हमारे लिए काम करता है ।। वफादार सेवक को समर्थ निरोग एवं दीर्घजीवी बनाए रखना प्रत्येक विचारशील का कर्त्तव्य है ।। केवल स्वस्थ व्यक्ति ही धनोपार्जन, सामाजिक, नैतिक, वैयक्तिक सब कर्त्तव्यों का पालन कर सकता है ।। जिसका स्वास्थ्य अच्छा है उसमें प्राण शक्ति अधिक होती है जिसके कारण सुख- शांति का अक्षय भंडार उसे प्राप्त होता है ।। स्वास्थ्य लाभ के लिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना आवश्यक होता है ।। आदतों और दिनचर्या का स्वास्थ्य से घनिष्ठ संबंध है ।।


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यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया- 26

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=264यज्ञ- प्रक्रिया को अपने संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में प्रतिपादित कर वाड्मय के इस खण्ड में परमपूज्य गुरुदेव ने बड़े विस्तार से यज्ञोपचार की प्रक्रिया की व्याख्या की है ।। यज्ञ एक सर्वांगपूर्ण उपचार पद्धति है- पर्यावरण संशोधन के लिए, सूक्ष्म जगत में संव्याप्त प्रदूषण मिटाने के लिए तथा मानव की स्थूल- सूक्ष्म हर स्तर पर चिकित्सा करने के लिए ।। सविता देवता की उपासना गायत्री महामंत्र का प्राण है एवं उसी सविता को समर्पित आहुतियाँ किस प्रकार अपनी मंत्र शक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा के समन्वित स्वरूप के माध्यम से होता को लाभ पहुँचाती है, यही यज्ञोपचार प्रक्रिया है ।। आत्मसत्ता पर छाये कषाय- कल्मषों की सफाई से लेकर- गुणसूत्रों, क्रोमोसोम्स जीन्स तक पर यज्ञ प्रक्रिया प्रभाव डालती है एवं इसमें किस प्रकार यज्ञ कुण्ड एक यंत्र की भूमिका निभाकर वृहत सोम के अवतरण द्वारा सोम की- पर्जन्य की वर्षा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, इसका वैज्ञानिक आधार क्या है, ज्यामिती किस प्रकार यज्ञधूम्रों की बहुलीकरण प्रक्रिया को प्रभावित करती है, यह सारा प्रतिपादन इस खण्ड में हुआ है ।।

यज्ञाग्नि व सामान्य अग्नि में अन्तर है ।। परमपूज्य गुरुदेव ने "यज्ञोपैथी" के नाम से एक नूतन चिकित्सा पद्धति जो भविष्य की उपचार पद्धति बनने जा रही है, को जन्म देकर वस्तुत: वैदिक विज्ञान के मूल आधार को पुनर्जीवित किया है ।। यज्ञों से रोग निवारण में समिधाओं, शाकल्य तथा मंत्रों का चयन कैसे किया जाता है, यह पूरी प्रक्रिया अपने में एक समग्र विज्ञान है ।। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि पृथ्वी तत्त्व का पंचभूतों से बनी इस काया में प्राधान्य है तथा पृथ्वी सदा वायु से गंधों का शोषण करती रहती है ।। 

 

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Diagnose, Cure And Empower Yourself By Currents Of Breath

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=325Swara Yoga refers to an Independent and complete in Itself branch of yoga. It deals with the physiological, psychological and spiritual aspects of the rhythmic notes of breathing and the associated flow of bio-electrical currents and prana (vital spiritual energy). The preeminent science (swara-vijnana) of this powerful yoga was derived by the Vedic Sages, whose enlightened acumen had a reach into the deepest depths of perceivable and sublime components of Nature and the diverse forms of life manifested in it…..

 

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Applied Science Of Yagya For Health And Environment

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=316Yagya-therapy is an ancient method of herbal/plant medicinal treatment derived from the. Vedic texts. In yagya natural herbal/plant products are processed in fire and medicinal vapors, gases and photo chemicals are released. It is basically an inhalation therapy that promises wider healing applications without any risk, of side effects or drug-resistance. It is cost effective and natural and provides added benefits of purifying the environment and balancing the Eco-system.

This book aims to introduce the readers to the ancient knowledge and modern scientific findings on yagya (fire-ritual) with special focus on preventive and therapeutic applications for holistic healthcare. It also presents detailed information and guidelines for yagya-threapy of several diseases and disorders — including the dreaded ones like Cancer and AIDS — that have challenged the world today.

Yagya Therapy –The key to Holistic Health

Yagya Therapy is an ethno-botanical inhalation therapy derived from the ancient Medical Science of India, The multiple benefits of yagya experiments include purification of atmospheric environment and healthy fertilization of the soil. Scientific validity and technical evaluation of this Vedic ritual in recent times indicate its enormous potential for reducing air-water pollution and for agricultural and therapeutic applications. 

 

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योग चिकित्सा संदर्शिका

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=137प्रस्तुत पुस्तक को सरल व व्यावहारिक बनाने के लिए दो खण्डों में विभक्त किया गया है । पहला खण्ड विभिन्न व्याधियों के निवारण एवं भिन्न-भिन्न आयु वर्ग के लिए लाभदायी अभ्यासों का संकलन प्रस्तुत करता है । दूसरे खण्ड में योगाभ्यास की संक्षिप्त जानकारी, क्रिया-विधि एवं सामान्य दिशा-निर्देश है ।

 

 

 

 

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चिकित्सा उपचार के विविध आयाम-४०

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=401परमपूज्य गुरुदेव ने वाड्मय के प्रारंभ में ही स्वास्थ्य रक्षा के चौबीस स्वर्णिम सूत्र देते हुए लिखा है कि बिना प्राकृतिक संतुलन से भरा जीवन अपनाए मनःस्थिति ठीक किए व्यक्ति स्वस्थ नहीं हो सकता । औषधियाँ-सर्जरी आदि बाह्योपचार व्यर्थ हैं, यदि मूल जड़ को नष्ट नहीं किया गया । इसमें उनने आठ आहार संबंधी दस विहार संबंधी छह मनःसंतुलन संबंधी अनुशासन दिए हैं व लिखा है कि इनका अनुपालन करने वाला कभी बीमार हो ही नहीं सकता । आरोग्य को स्वाभाविक व दुर्बलता-रुग्णता को अस्वाभाविक मानते हुए उनने स्वास्थ्य-रक्षा हेतु अनेकानेक निर्देशों द्वारा बहुमूल्य मार्गदर्शन किया है ।


आज के व्यक्ति का जीवन आरामतलबी का है । उपकरणों-मशीनों, घर-घर में उपलब्ध संसाधनों ने व्यक्ति को मशीनों का गुलाम बना दिया है । ऐसे में स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए उनने शरीर पर बहुत अधिक दबाव डालने या थकाने वाले व्यायामों की तुलना शरीर की सूक्ष्म चक्र-उपत्यिकाओं को प्रभावित, उत्तेजित कर स्कूर्ति लाने वाले आसनों को अपनाने पर जोर दिया है । आसन अनेकानेक हैं, किंतु विभिन्न आयु वर्गों के लिए जिन्हें चुना जाए-कौन सा किस रोग की रक्षा के लिए किन अंगों के सूक्ष्म संचालन हेतु प्रयुक्त होता है, उसका सरल मार्गदर्शन इस खंड में है । इसी तरह प्राणायाम को विभिन्न मनोरोगों को दूर करने, तनाव मिटाने, चिरस्थायी प्राणशक्ति का स्रोत बनाए रखने के लिए कैसे प्रयुक्त किया जा सकता है, यह वर्णन विस्तार से इसमें है । प्राणों का व्यायाम-प्राणों के आयाम में प्रवेश ही प्राणायाम है । प्राणतत्त्व की अभिवृद्धि, कौन-कौन से प्राणायाम व्याधि-निवारण हेतु उपयुक्त हैं, उन सभी का दिग्दर्शन इसमें है । 


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निरोग जीवन का राजमार्ग

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=89प्रकृति के विशाल प्रांगण में नाना जीव-जंतु, जलचर, थलचर और नभचर हैं । प्रत्येक का शरीर जटिलताओं से परिपूर्ण है, उसमें अपनी-अपनी विशेषताएँ और योग्यताएँ हैं, जिनके बल पर वे पुष्पित एव फलित होते हैं, यौवन और बुढ़ापा पाते हैं, जीवन का पूर्ण सुख प्राप्त करते हैं । पृथ्वी पर रहने वाले पशुओं का अध्ययन कीजिए । गाय, भैंस, बकरी, भेड़, घोडा, कुत्ता, बिल्ली, ऊँट इत्यादि जानवर अधिकतर प्रकृति के साहचर्य में रहते है, उनका भोजन सरल और स्वाभाविक रहता है, खानपान तथा विहार में संयम रहता है । घास या पेड- पौधों की हरी, ताजी पत्तियाँ या फल इत्यादि उनकी सुधा निवारण करते हैं । सरिताओं और तालाबों के जल से वे अपनी तृषा का निवारण करते हैं, ऋतुकाल में विहार करते हैं । प्रकृति स्वयं उन्हें काल और ऋतु के अनुसार कुछ गुप्त आदेश दिया करती है, उनकी स्वयं की वृत्तियाँ स्वयं उन्हें आरोग्य की ओर अग्रसर करती रहती हैं । उन्हें ठीक मार्ग पर रखने वाली प्रकृति माता ही है । यदि कभी किसी कारण से वे अस्वस्थ हो भी जाय तो प्रकृति स्वयं अपने आप उनका उपचार भी करने लगती है । कभी पेट के विश्राम द्वारा, कभी धूप, मालिश, रगड़, मिट्टी के प्रयोग, उपवास द्वारा, कभी ब्रह्मचर्य द्वारा, किसी न किसी प्रकार जीव- जंतु स्वयं ही स्वास्थ्य की ओर जाया करते हैं । पक्षियों को देखिये । ससांर में असंख्य पक्षी हैं । 

 

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