Thursday, 2 March 2017

जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=172मनुष्य को न तो अभागा बनाया गया है और न अपूर्ण। उसमें वे सभी क्षमताएँ बीज रूप से विद्यमान हैं, जिनके आधार पर अभीष्ट भौतिक एवं आत्मिक सफलताएँ प्रचुर मात्रा में प्राप्त की जा सकती हैं, आवश्यकता उनके समझने और उनके उपयोग करने की है।










Buy online:



गृहस्थ:एक तपोवन -61

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=267‘धन्यो गृहस्थाश्रम:’ कहकर हमारे ऋषि-मुनियों ने चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम ही धन्य कहे जाने योग्य है, ऐसा श्रुति में कहा है। जिस तरह समस्त प्राणी माता का आश्रय पाकर जीवित रहते हैं, उसी तरह सभी आश्रम गृहस्थाश्रम पर आधारित हैं। वस्तुत: किसी भी समाज या राष्ट्र के विकास के लिए परिवार संस्था का स्वस्थ, समर्थ व सशक्त होना जरूरी है। यह सहजीवन के व्यावहारिक शिक्षण की प्रयोगशाला है। बिना किसी बाह्य दण्ड, भय या कानून के चलने वाली संस्था एकमात्र ऐसी संस्था है जो आनुवांशिक संस्कारों एवं पारस्परिक विश्वास पर निर्भर रह, अविच्छृंखल स्थिति में न जाकर सतत गतिशील रहती आयी है। बिना स्वार्थों का त्याग किए सहजीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती एवं त्याग, सहिष्णुता, सेवा की धुरी पर यह संस्था मात्र भारतीय संस्कृति की ही विशेषता है एवं सदा रहेगी।

 गृहस्थ तप और त्याग का जीवन कहा गया है। इस धर्म के परिपालन के लिए किया गया कोई भी प्रयास किसी तप से कम नहीं है। गृहस्थ में स्वयं को अपनी वृत्तियों पर अंकुश लगाना पड़ता है। चिकित्सा, भोजन, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए सब प्रबन्धन करने हेतु अपना पेट काट कर सारी व्यवस्था करनी होती है, एक जिम्मेदारी से भरा जीवन जीना पड़ता है। सचमुच गृहस्थाश्रम एक यज्ञ है, जिसमें प्रत्येक सदस्य उदारता पूर्वक सहज ही एक दूसरे के लिए कष्ट सहते हैं, एक दूसरे के लिए त्याग करते हैं। गृहस्थाश्रम समाज के संगठन, मानवीय मूल्यों की स्थापना, समाजनिष्ठा, भौतिक विकास के साथ-साथ मनुष्य के आध्यात्मिक, मानसिक विकास का भी क्षेत्र है एवं इस प्रकार समाज के व्यवस्थित स्वरूप का मूलाधार है। 

 

Buy online:

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=267

 


The Folly Of The Wise

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=349Capacity to think is an exclusive characteristic of man. This forms the basis of his ability to deliberate, imagine, analyses and take decisions. The ability of other living organisms to think is confined to food, survival and procreation. They cannot think beyond this on topics like better lifestyles, world order or the future of civilizations etc. Off and on some of them can be seen vying for a larger share and attacking each other on account of conflicts but that is about all. They somehow expend their lives and die in due course. 

 

Buy online:

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=349

 

Wednesday, 1 March 2017

Be Saved From Mental Tension

This booklet is a bouquet of spritual thoughts.


Buy online:http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=350
 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=350

स्वस्थ रहने की कला

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=91मनुष्य की काय संरचना ऐसी है, जिसे यदि तोड़ा-मरोड़ा न जाए, सहज गति से चलने दिया जाए तो वह लंबे समय तक बिना लड़खड़ाए कारगर बनी रह सकती है ।आरोग्य स्वाभाविक है और रोग प्रयत्न पूर्वक आमंत्रित । सृष्टि के सभी प्राणी अपनी सहज आयु का उपभोग करते हैं । मरण तो सभी का निश्चित है, पर वह जीर्णता के चरम बिंदु पर पहुँचनेके उपरांत ही होता है । मात्र दुर्घटनाएँ ही कभी-कभी उसमें व्यवधान उत्पन्न करती हैं । रुग्णता का अस्तित्व उन प्राणियोंमें दृष्टिगोचर नहीं होता, जो प्रकृति की प्रेरणा अपनाकर सहज सरल जीवन जीते हैं । मनुष्य ही इसका अपवाद है । इसी जीवधारी को आए दिन बीमारियों का सामना करना पड़ताहै । बेमौत मरते भी वही देखा जाता है । दुर्बलता, रुग्णता और असामयिक मृत्यु कोई दैवी विपत्तिनहीं है । मनुष्य द्वारा अपनाई गई रहन-सहन संबंधी प्रतिक्रिया मात्र है । आहार-विहार में संयम बरता जा सके और मस्तिष्कको अनावश्यक उत्तेजनाओं से बचाए रखा जा सके, तो लंबी अवधि तक सुखपूर्वक निरोगी जीवन जिया जा सकता है ।आरोग्य की उपलब्धि के लिए बहुमूल्य टॉनिकों या औषध-रसायनों को खोजने की तनिक भी आवश्यकता नहींहै । जो उपलब्ध है उसे बरबाद न करने की सावधानी भरबरती जाए, तो न बीमार पड़ना पड़े, न दुर्बल रहना पड़े औरन असमय बेमौत मरने की आवश्यकता पड़े । चिकित्सकों का द्वार खटखटाने की अपेक्षा आरोग्यार्थी यदि रहन-सहन में सम्मिलित कुचेष्टाओं को निरस्त कर सकें, तो यह उपाय उनकी मनोकामना सहज ही पूरी कर सकता है । 

 

Buy online: 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=91

 


स्वस्थ और सुंदर बनने की विद्या

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=139यह अच्छी तरह अनुभव कर लिया गया है कि खिलखिलाकर हँसने से अच्छी भूख लगती है, पाचनशक्ति बढ़ती है और रक्त का संचार ठीक गति से होता है ।। क्षय जैसे भयंकर रोगों में हँसना अमृत- तुल्य गुणकारी सिद्ध हुआ है ।। खिल- खिलाकर हँसने से मुँह, गरदन, छाती और उदर के बहुत उपयोगी स्नायुओं को आवश्यकीय कसरत करनी पड़ती है, जिससे वे प्रफुल्लित और दृढ़ बनते हैं ।। इसी तरह मांसपेशियों, ज्ञानतंतुओं और दूसरी आवश्यक नाड़ियों को हँसने से बहुत दृढ़ता मिलती है ।। हँसने का मुँह, गाल और जबड़े पर बड़ा अच्छा असर पड़ता है ।। मुँह की मांसपेशियों और नसों का यह सबसे अच्छा व्यायाम है ।। जिन्हें हँसने की आदत होती है, उनके गाल सुंदर, गोल और चमकीले रहते हैं ।। फेफड़ों के छोटे- छोटे भागों में अकसर पुरानी हवा भरी रहती है, आराम की साँस लेने से बहुत- थोड़ी वायु फेफड़ों में जाती है और प्रमुख भागों में ही हवा का आदान- प्रदान होता है, शेष भाग यों ही सुस्त और निकम्मा पड़ा रहता है, जिससे फेफड़े संबंधी कई रोग होने की आशंका रहती है, किंतु जिस समय मनुष्य खिल- खिलाकर हँसता है, उस समय फेफड़ों में भरी हुई पहले की हवा पूरी तरह बाहर निकल जाती है और उसके स्थान पर नई हवा पहुँचती है ।। मुँह की रसवाहिनी गिलटियाँ हँसने से चैतन्य होकर पूरी मात्रा में लार बहाने लगती हैं।। पाठक यह जानते ही होंगे कि भोजन में पूरी मात्रा में लार मिल जाने पर उसका पचना कितना आसान होता है? जो आदमी स्वस्थ रहना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि हँसने की आदत डालें । 

 

Buy online: 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=139

 


मन साधै जीवन सधै

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=237कहा जाता है- "मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।" यह साधारण-सी लोकोक्ति एक असाधारण सत्य को प्रकट करती है और वह है-मनुष्य के मनोबल की महिमा । जिसका मन हार जाता है, वह बहुत कुछ शक्तिशाली होने पर भी पराजित हो जाता है और शक्ति न होते हुए भी जो मन से हार नहीं मानता, उसको कोई शक्ति पराजित नहीं कर सकती ।

मनुष्य की वास्तविक शक्ति मनोबल ही है । मनोबल से हीन मनुष्य को निर्जीव ही समझना चाहिए । संसार के सारे कार्य शरीर द्वारा ही संपादित होते हैं, किंतु उसका संचालक मन ही हुआ करता है । मन का सहयोग पाए बिना शरीर-यंत्र उसी प्रकार निष्क्रिय रहा करता है, जैसे बिजली के अभाव में सुविधा-उपकरण अथवा मशीनें आदि । बहुत बार देखा जा सकता है कि साधन-शक्ति तथा आवश्यकता होने पर भी जब मन नहीं चाहता तो अनेक कार्य बिना किए पड़े रहते हैं । शरीर के अक्षत रहते हुए भी मानसिक सहयोग के बिना कोई काम नहीं बनता और जब मन चाहता है तो एक बार रुग्ण शरीर भी कार्य में प्रवृत्त हो जाता है । जो काम मन से किया जाता है वह अच्छा भी होता है, और जल्दी भी । बेमन किए हुए काम न केवल अकुशल ही होते हैं, बल्कि बुरी तरह शिथिल भी कर देते हैं । मनोयोग रहने से मनुष्य न जाने कितनी देर तक बिना थकान अनुभव किए कार्य में संलग्न रहा करता है, किंतु मन के उचटते ही जरा भी काम करने में मुसीबत आ जाती है । इस प्रकार देखा जा सकता है कि मनुष्य का वास्तविक बल, मनोबल ही है । 

 

Buy online:

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=237