Saturday, 18 March 2017

भाव संवेदनाओं की गंगोत्री

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=217भाव-संवेदना रूपी गंगोत्री के सूख जाने पर व्यक्ति निष्ठुर बनता चला जाता है। आज का सबसे बड़ा दुर्भिक्ष इन्हीं भावनाओं के क्षेत्र का है। जब भी अवतारी चेतना आई है, उसने एक ही कार्य किया-अंदर से उस गंगोत्री के प्रवाह के अवरोध को हटाना एवं सृजन-प्रयोजनों में उसे नियोजित करना। कुछ कथानकों द्वारा व दृष्टांतों के माध्यम से इस तथ्य को भली−भाँति समझा जा सकता है।

देवर्षि नारद एवं वेदव्यास के वार्तालाप के एक तथ्य से स्पष्ट होता है कि मानवीय गरिमा का उदय जब भी होता है, सबसे पहले भावचेतना का जागरण होता है। तभी वह ईश्वर-पुत्र की गरिमामय भूमिका निभा पाता है। चैतन्य जैसे अंतर्दृष्टि-संपन्न महापुरुष भी शास्त्र-तर्क मीमांसा के युग में इसी चिंतन को दे गए। भाव श्रद्धा के प्रकाश में मनुष्यता जो खो गई है, पुन: पाई जा सकती है। पीतांबरा मीरा जीवन भर करुणा विस्तार का, ममत्व का ही संदेश देती रहीं। जब संकल्प जागता है तो अशोक जैसा निष्ठुर भी बदल जाता है- चंड अशोक से अशोक महान् बन जाता है। जीसस का जीवन करुणा के जन-जन तक विस्तार का संदेश देता है। मिस्टर गाँधी इसी भाव-संवेदना के जागरण से एक घटना मात्र से महात्मा गाँधी बन गए-जीवन भर आधी धोती पहनकर एक पराधीन राष्ट्र को स्वतंत्र करने में सक्षम हुए। ठक्कर बापा के जीवन में भी यही क्रान्ति आई। वस्तुत: अवतारी चेतना जब भी सक्रिय होती है, इसी रूप में व्यक्ति को बेचैन कर उसके अंतराल को आमूलचूल बदल डालती है। 

 

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सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1003पारिवारिक जीवनक्रम तप और त्याग से भरा हुआ है ।। गृहस्थी के निर्वाह हेतु किया जाने वाला प्रयत्न किसी तितीक्षा से कम नहीं ।। परिवार का भार वहन करना, सदस्यों की सहकारितापूर्वक सुविधा के साधन जुटाना एक दुस्तर तपस्या है ।। उससे भी अधिक दुस्तर जो तपोवनों में बैठकर की जाती है ।। इस व्यवस्था में ही व्यक्ति अपनी अनेक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना सीखता है ।। माँ- बाप स्वयं अपना पेट काटकर भी बच्चों को पढ़ाते हैं, छोटों को आगे बढ़ाते हैं ।। इसी खदान से सुसंस्कारी नागरिक निकलते हैं एवं इस व्यवस्था से ही जन्म लेती हैं- भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर- अतिशय धर्म ।।

यह एक विडम्बना ही है कि बढ़ती आधुनिकता व शहरीकरण की आसुरी लीला ने इस व्यवस्था को हानि पहुँचाने का कुछ सीमा तक प्रयास किया है ।। यही कारण है कि अब यह संस्था विशृंखलित होने लगी है ।। यह आलोक जन- जन तक पहुँचाना जरूरी है कि सहयोग- सहकारिता भरी परिवार व्यवस्था ही सुख- शांति से युक्त समाज का मूल आधार है ।। 

 

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श्रम है सुख का सेतु

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1010मानव- जीवन का सबसे बड़ा आधार श्रम ही है ।। हमारी सबसे प्रधान आवश्यकताओं- भोजन, वस्त्र, निवास स्थान की पूर्ति किसी न किसी के श्रम द्वारा ही होती है ।। अन्न के मिल जाने पर उसको खाने के लायक रोटी के रूप में परिवर्तित करने में भी श्रम करना पड़ता है और बिना श्रम के वह ठीक तौर से हजम होकर शरीर में रस- रक्त के रूप में बदल भी नहीं सकती ।। यह सब देखते हुए भी मनुष्य श्रम से बचने की चेष्टा करते रहते है ।। इसके लिए वे अपना कार्य- भार दूसरों पर लादने की कोशिश ही नहीं करते, वरन् तरह- तरह के आविष्कार करके, यंत्र बनाकर भी अपने हाथ- पैरों का कार्य उनसे पूरा कराने का प्रयत्न करते हैं ।। परिणाम यह होता है कि चाहे मनुष्य की दिमागी शक्तियाँ बढ़ रही हों, पर शारीरिक शक्तियाँ क्षीण होती जाती है और उसका जीवन कृत्रिम तथा परावलम्बी होता चला जाता है ।। चाहे नकली बातों को महत्व देने वाले और विचारशून्य इन बातों में भी गौरव और शान समझते हों पर जीवन- संघर्ष में इसके कारण विपत्तियाँ ही सहन करनी पड़ती है ।। इस सम्बन्ध में एक लेखक ने बहुत ठीक कहा है -

"पता नहीं कहाँ से यह गलत ख्याल लोगों में आ गया है कि परिश्रम से बचने में कोई सुख नहीं है ।। परिश्रम करने से कुछ थकावट आती है, पर श्रम न करने से तो शक्ति का स्रोत ही सूख जाता है ।। मेरी समझ से तो बेकार रहने से अधिक " श्रमसाध्य " और कोई काम नहीं है ।। कुछ काम न करना मानो जीते जी मर जाना है ।" 

 

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विवाहित जीवन का अलौकिक आनंद

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=976आश्रम व्यवस्था हमारी देवोपम भारतीय संस्कृति का मूल आधार है । प्राचीन ऋषियों-मनीषियों ने गहन चिंतन-मनन के उपरांत मानवीय जीवन का चार भागों में विभाजन किया था । सौ वर्ष के आदर्श जीवन काल को २५-२५ वर्ष के चार खंडों में, चार आश्रमों में बांट दिया था । पहला ब्रह्मचर्य फिर गृहस्थ और पचास वर्ष की आयु पर वानप्रस्थ तथा अंतिम संन्यास आश्रम की व्यवस्था की गई थी । इसके अनुसार पहले २५ वर्षो में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शारीरिक एवं मानसिक रूप से अपने को परिपुष्ट बनाया जाता था । इसके बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके परिवार, समाज व राष्ट्र की सेवा करने का विधान था । वानप्रस्थ व संन्यास आश्रमों में लोक कल्याण की साधना करते हुए समाज में चतुर्दिक सुख-शांति का वातावरण निर्मित करने के सतत प्रयास में मानव जी-जान से जुटा रहता था ।

इस व्यवस्था पर यदि गंभीरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों आश्रमों का उद्देश्य यही है कि गृहस्थाश्रम को सुचारु रूप से: व्यवस्थित समुत्रत और सुख शांति से परिपूर्ण बनाया जाए । इसका एक पक्ष यह भी है कि गृहस्थाश्रम के ऊपर ही शेष तीनों आश्रमों के समुचित पालन-पोषण करने का दायित्व भी है । इसी कारण गृहस्थाश्रम को चारों में सबसे महत्वपूर्ण कहा गया है । 

 

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Tuesday, 14 March 2017

परदोष दर्शन और अहंकार से बचें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1016यह सारा संसार गुण- दोषमय है।। संसार की कोई भी वस्तु तथा वाणी सर्वथा गुणसंपन्न अथवा दोषमुक्त नहीं है ।। सभी में कुछ न कुछ गुण और कुछ न कुछ दोष मिलेगा ।। परमात्मा ही अकेला पूर्ण और दोषरहित है ।। अन्य सब कुछ गुण- दोषमय एवं अपूर्ण है ।।

सामान्यत: मनुष्यों में दोष- दर्शन का भाव रहा करता है ।। इसी दोष के कारण वे अच्छी से अच्छी वस्तु में, यहाँ तक कि परमात्मा में भी दोष निकाल लेते हैं ।। दोष- दर्शन करते रहने वाला व्यक्ति संसार में किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता ।। उसकी सारी शक्ति और सारा समय दूसरों के दोष देखने तथा उनकी खोज करने में लगे रहते हैं ।। दूसरों की आलोचना करना, उनके कार्यों तथा व्यक्तित्व पर टीका- टिप्पणी करना, उनके दोषों की गणना करना, उसका एक व्यसन बन जाता है ।। दोषदर्शी व्यक्ति निस्संदेह बड़े घाटे में रहता है ।।

छिद्रान्वेषक व्यक्ति को संसार में कुरूपता के सिवाय और कुछ दीखता ही नहीं ।। किसी बात में सौंदर्य देख सकना उनके भाग्य में होता ही नहीं ।। उसे अच्छी से अच्छी पुस्तक पढ़ने को दीजिए और उसके बारे में पूछिए तो वह बड़े अनमने मन से यही कहेगा- हाँ पुस्तक को अच्छा कह लीजिए किंतु वास्तव में वह श्रेष्ठ पुस्तकों की सूची में रखने योग्य नहीं है ।। इसकी भाषा अच्छी है पर विचार निम्न कोटि के हैं ।। विचार अच्छे हैं तो भाषा शिथिल है ।। भाषा तथा विचार दोनों अच्छे हैं तो विषय योग्य नहीं है और यदि ये तीनों बातें अच्छी हैं, तो पुस्तक बड़ी है उसका मेकअप, गेटअप अच्छा नहीं है ।। 

 

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पत्नि का सम्मान गृहस्थ का उत्थान


http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=988"महिला जागृति अभियान' वंदनीया माता जी के संपादकत्व में अनेक वर्षों तक प्रकाशित होती रही है ।। इस पत्रिका के माध्यम से आत्म विस्मृति के गर्त में पड़ी नारियों को उबारने और पुरुषों को उनकी गरिमा व महिमा समझाने का वे निरंतर प्रयास करती रही हैं ।। उनके इन लेखों की उपयोगिता और महत्त्व आज भी उतना ही अधिक है जितना कि तब था ।। आज हमारे बीच उनके सशरीर न रहने के कारण उनके ये लेख नारी जागृति एवं उत्थान की दिशा में हमें विशेष रूप से प्रेरणा एवं उत्साह प्रदान करेंगे ।।

महिला जागरण एवं उन्हें, उनके बलात् अपहृत किए गए गरिमामय सिंहासन पर पुन: प्रतिष्ठित करना वंदनीया माताजी का स्वप्न रहा है और जीवन ध्येय भी ।। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर हम इस श्रद्धांजलि वर्ष में "महिला जागृति अभियान' में प्रकाशित उनके लेखों को संकलित कर निम्नलिखित तीन पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं ।।


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निर्भय बनें, शान्त रहें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=971कितना ही प्रयत्न करने पर भी, कितनी ही सावधानी बरतने पर भी, ऐसा संभव नहीं कि मनुष्य के जीवन में अप्रिय परिस्थितियाँ प्रस्तुत न हों ।। यहाँ सीधा और सरल जीवन किसी का भी नहीं है ।। अपनी तरफ से मनुष्य शांत, संतोषी और संयमी रहे, किसी से कुछ भी न कहे, कुछ न चाहे, तो भी दूसरे लोग उसे शांतिपूर्वक समय काट ही लेने देंगे- इसका कोई निश्चय नहीं ।। कई बार तो सीधे और सरल व्यक्तियों से अधिक लाभ उठाने के लिए दुष्ट, दुर्जनों की लालसा और भी तीव्र हो उठती है ।। कठिन प्रतिरोध की संभावना न देखकर सरल व्यक्तियों को सताने में दुर्जन कुछ न कुछ लाभ ही सोचते हैं ।। सताने पर कुछ न कुछ वस्तुएँ मिल जाती हैं और दूसरों को आतंकित करने, डराने का एक उदाहरण उनके हाथ लग जाता है ।।

हम सब के शरीर अब जैसे कुछ बन गए हैं उनमें पग- पग पर कोई बीमारी उठ खड़ी होने की आशंका रहती है ।। प्रकृति का संतुलन एटम- बमों के परीक्षणों से, वृक्ष- वनस्पतियों के नष्ट हो जाने से, कारखानों के धुएँ से हवा गंदी होते रहने से बिगड़ता चला जा रहा है ।। उसके कारण दैवी विपत्ति की तरह कई बार बीमारियों फूट पड़ती हैं और संयमी लोग भी अपना स्वास्थ्य खो बैठते हैं ।। खाद्य पदार्थों का अशुद्ध स्वरूप में प्राप्त होना, उनमें पोषक तत्त्व घटते जाना, आहार- विहार की अप्राकृतिक परंपरा के साथ घसीटते चलने की विवशता आदि कितने ही कारण ऐसे हैं जो संयमी लोगों को भी बीमारी की ओर घसीट ले जाते हैं ।। 

 

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