Saturday, 18 February 2017

जीवन साधना की ऊर्जा - रश्मियाँ

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=623कौन कितना सौभाग्यशाली है ? इसके उत्तर में उसके वैभव,पद,प्रभाव आदि की नाप - जोख की जाती है ।। सुविधा -साधनों के सहारे इस प्रकार का मूल्यांकन किया जाता है, जबकि देखा यह जाना चाहिए कि गुण,कर्म,स्वभाव ,चिंतन और चरित्र की दृष्टि से कौन किस स्तर पर रह रहा है।

वस्तुत: व्यक्तित्व की पवित्रता एवं प्रखरता के आधार पर बनने वाली प्रतिभा वह सम्पदा है,, जिसके सहारे उच्चस्तरीय प्रगति के पथ पर दूर तक जा पहुँचने का अवसर किसी को भी मिल पाता है ।। आंतरिक प्रफुल्लता लोकश्रद्धा एवं दैवी अनुकम्पा को सफल जीवन की महान उपलब्धियाँ माना गया है।

इन्हें अर्जित करने में समर्थ, परिष्कृत व्यक्तित्व गढ़ने के लिए जो साधना आवश्यक है , उसके महत्त्वपूर्ण सूत्र यहाँ संकलित किए गए हैं ।सफल जीवन जीने की कला के सर्वश्रेष्ठ प्रयोक्ता ( परम पूज्य गुरुदेव ) के ये सूत्र किसी को भी जीवन लक्ष्य के चरम शिखर पर पहुँचा देने में सक्षम हैं ।। आवश्यकता है , इन्हें जीवन की प्रयोगशाला में प्रयोग करने की।। 

 

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जीवन पथ के प्रदीप

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=548जीवन पथ के प्रदीप आपको उजियारे की सौगात सौंपने के लिए आए हैं । जीवन के लिए उजियारा बहुत जरूरी है । पथ पर उजियारा न हो तो अनायास ही भय, भ्रम और भटकन घेर लेते हैं । अँधेरे में, मन में अचानक ही अवसाद, विषाद का कुहाँसा छा जाता है । खिन्नता-विपन्नता ऐसे में जीवन का जैसे अविभाज्य अंग बन जाती है ।

आज की दशा कुछ ऐसी ही हो गयी है । मनुष्य के जीवन पथ, उसकी चेतना को अंधियारी ने घेर लिया है । वह भयभीत है, भ्रमित है, विषादग्रस्त है । अपने ही भ्रम में उसने स्वयं की छाया को भूत समझ लिया है और भयक्रान्त हो गया है । इसी भय और भ्रम में फँस कर उसने अपने से, अपनों से यद्ध छेड़ दिया है । लगातार चोटिल होने के बावजूद वह लड़े जा रहा है और उसके घाव बड़े जा रहे हैं ।

अंधियारे के कारण न तो किसी को सूझ रहा है और न समझ में आ रहा है कि वह किसी और से नहीं बल्कि अपने से और अपनों से लड़े जा रहा है । चोटें बढ़ रही हैं, घाव रिस रहे, पर इन्सान का उन्माद व उसका अवसाद कम नहीं हो रहा है । इनमें कमी तभी आ सकती है, जबकि जीवन पथ का अंधियारा घटे, हटे और मिटे । 

 

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Friday, 17 February 2017

जीवन देवता की आराधना करें व्यक्तित्व सम्पन्न बनें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1018स्वर्ग एक उपलब्धि मानी गई है, जिसे प्राप्त करने की इच्छा प्राय: हर मनुष्य को रहती है ।। कई लोग उसे संसार से अलग भी मानते हैं और विश्वास करते हैं कि मरने के बाद वहाँ पहुँचा जाता है या पहुँचा जा सकता है।। इस मान्यता के अनुसार लोक स्वर्ग प्राप्त करने के लिए जप, तप, पूजा, पाठ, पुण्य, परमार्थ और साधना उपासना भी करते हैं ।। इस पृथ्वी से अलग लोक- विशेष में स्वर्ग जैसे किसी स्थान का अस्तित्व है, अथवा नहीं, यह विवाद का विषय है ।। पर उसे प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य के आगे बढ़ने की आकांक्षा का द्योतक है, जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता ।।

मनुष्य की यह इच्छा स्वाभाविक ही है कि जिस स्थान पर वह है, उससे आगे बढे़ ।। वह उन वस्तुओं को प्राप्त करे, जो उसके पास नहीं हैं ।। मनुष्य जन्म के रूप में उसे संसार तो मिल चुका, जहाँ सुख भी है और दुःख भी, अनुकूलताएँ भी हैं तथा प्रतिकूलताएँ भी।। लेकिन मनुष्य की इच्छा रहती है कि दुःख- कष्टों और प्रतिकूलताओं से उसका कोई संबंध नहीं रहे ।। वह अधिकाधिक सुखी, संतुष्ट और सुविधा- संपन्न स्थिति को प्राप्त करे ।। यह स्थिति जीते- जी प्राप्त की जाए अथवा मरने के बाद, यह अलग विषय है।। 

 

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जीवन जीने की कला

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1012बाइबिल कहती है, "मनुष्य ईश्वर की महानतम कृति है ।" किंतु इसके विपरीत हम देखते हैं कि सामान्य से असामान्य बनना तो दूर, व्यक्ति साधारण स्तर का भी नहीं रह पाता है । इसका मूल करण है अपनी सामर्थ्य का बोध न होना । हनुमान को यदि अपनी सामर्थ्य का बोध रहा होता तो जाम्बवंत के उपदेश की उन्हें आवश्यकता न पड़ती । राम का आदेश पाते ही वह चल पड़ते । जैसे ही सागर किनारे साधारण से वानर हनुमान को अपनी आत्म-गरिमा का बोध हुआ, वह एक ही छलांग में असंभव पुरुषार्थ करने में सफल हो गए । अंगारों पर रखी राख अग्नि की तीव्रता को छुपाए रहती है । जैसे ही उसे हटाया जाता है, वह अपने मूल रूप में देदीप्यमान्, तापयुक्त हो उठती है । सूर्य पर बादल छाए हों तो कुछ देर के लिए वातावरण में ठंडक छा जाती है । बादलों के छँटते ही सूर्य का प्रकाश व गर्मी उस क्षेत्र के हर भाग तक पहुँचने लगती है । अपना आपा भी ऐसा ही प्रकाशवान्, जाज्वल्यमान् है । मात्र कषाय-कल्मषों ने, विस्मृति की माया ने, जन्म-जन्मांतरों के संचित कुसंस्कारों ने उसकी इस आभा को ढँक रखा है । यदि इस मायाजाल का आवरण हटाया जा सके तो असामान्य स्थिति में पहुँच सकना संभव है । 

 

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जीवन की श्रेष्ठता और सदुपयोग्

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1. जीवन की श्रेष्ठता और उसका सदुपयोग
2. कल्याण का मार्ग तो यह एक ही है
3. दृष्टिकोण में सुधार आवश्यक
4. अपनी महानता में विश्वास रखें
5. पात्रता के अनुरूप पुरस्कार मिलेगा
6. हमारी भावी पात्रता और उसका स्पष्टीकरण
7. न किसी को कैद करें, न किसी के कैदी बनें
8. सेवा की साधना आवश्यक
9. सेवा भावना बिना मन मरघट
10. कृपणता सृष्टि परम्परा का व्यतिरेक
11. पृथकता छोड़े सामूहिकता अपनाएँ
12. आत्म तुष्टि ही नहीं परोपकार भी
13. सम्पदाएँ नहीं-विभूतियाँ कमाएँ
14. मिल जुलकर आगे बढ़िए
15. जीवन को सेवामय बनाइए
16. प्रेमयोग ही भक्ति साधना
17. निष्काम भक्ति में दुहरा लाभ
18. जीवन की रिक्तता प्रेम प्रवृत्ति से ही भरेगी
19. विरानों से प्यार-स्वयं का तिरस्कार ऐसा क्यों ?
20. हम अपने को प्यार करें, ताकि ईश्वर का प्यार पा सकें
21. रामायण की प्रेम परिभाषा
22. प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता
23. प्रेम की सृजनात्मक शक्ति
24. प्रेम रूपी अमृत और उसका रसास्वादन
25. प्रेम का प्रयोग उच्च स्तर पर


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जीवन और मृत्यु

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1231मृत्यु से डरने की कोई बात नहीं क्योंकि कपड़ा बदलने के समान यह एक स्वाभाविक एवं साधारण बात है । परन्तु मृत्यु को ध्यान में रखना आवश्यक है। मार्ग के विश्रामगृह में ठहरे हुए यात्री को जैसे रातभर ठहर कर कूच की तैयारी करनी पड़ती है और फिर दूसरी रात किसी अन्य विश्रामगृह में ठहरना पड़ता है उसी प्रकार जीव भी एक जीवन को छोड़ कर दूसरे जीवनों में प्रवेश करता रहता है ।

क्षणिक जीवन में कोई ऐसा कार्य न करना चाहिए जिससे आगे की प्रगति में बाधा पड़े । विश्रामगृह के अनावश्यक झगड़ों में उलझ कर जैसे कोई मूर्ख यात्री मुकदमा जेल में फँस जाता है और अपनी यात्रा का उद्देश्य बिगाड़ लेता है वैसे ही जो लोग वर्तमान जीवन के तुच्छ लाभों के लिए अपना परम् लक्ष्य नष्ट कर लेते हैं वे निश्चय ही अज्ञानी हैं ।

जीवन एक नाटक की तरह है । इस अभिनय को हमें इस प्रकार खेलना चाहिए कि दूसरों को प्रसन्नता हो और अपनी प्रशंसा हो । नाटक खेलते समय सुख और दुःख के अनेक प्रसंग आते हैं पर अभिनय करने वाला पात्र उस अवसर पर वस्तुत:सुखी या दुःखी नहीं होता । इसी प्रकार हम को जीवन रूपी खेल में बिना किसी उद्वेग के अभिनय का कौशल प्रदर्शित करना चाहिए । पर साथ ही अपने लक्ष्य को भूलना न चाहिए । 

 

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जिन्दगी हँसते-खेलते जियें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1014अँगरेजी में किसी विद्वान का कथन है- "मैन इज ए लाफिंग एनीमल" अर्थात मनुष्य एक हँसने वाला प्राणी है ।। मनुष्य और अन्य पशुओं के बीच भिन्नता सूचित करने वाले- बुद्धि, विवेक तथा सामाजिकता आदि जहाँ अनेक लक्षण हैं, वहाँ एक हास्य भी है ।। पशुओं को कभी हँसते नहीं देखा गया है ।। यह सौभाग्य, यह नैसर्गिक अधिकार एकमात्र मनुष्य को ही प्राप्त हुआ है ।। जिस मनुष्य में हँसने का स्वभाव नहीं, उसमें पशुओं का एक बड़ा लक्षण मौजूद है, ऐसा मानना होगा ।।

संसार में असंख्यों प्रकार के मनुष्य हैं ।। उनके रहन- सहन, आहार- विहार, विश्वास- आस्था, आचार- विचार, प्रथा- परंपरा, भाषा- भाव एवं स्वभावगत विशेषताओं में भिन्नता पाई जा सकती है, किंतु एक विशेषता में संसार के सारे मनुष्य एक हैं ।। वह विशेषता है- "हास्य" काले- गोरे, लाल- पीले, पढ़े- बेपढ़े, नाटे- लंबे, सुंदर- असुंदर का भेद होने पर भी उनकी भिन्नता के बीच हँसी की वृत्ति सबमें समभाव से विद्यमान है ।।

प्रसिद्ध विद्वान मैलकम ने एक स्थान पर दुःख प्रकट करते हुए कहा है- "संसार में आज हँसी की सबसे अधिक आवश्यकता है, किंतु दुःख है कि दुनिया में उसका अभाव होता जा रहा है ।" कहना न होगा कि श्री मैलकम का यह कथन बहुत महत्त्व रखता है और उनका हँसी के अभाव पर दुःखी होना उचित ही है ।। देखने को तो देखा जाता है कि आज भी लोग हँसते हैं, वह उनकी व्यक्तिगत हँसी होती है, किंतु सामाजिक तथा सामूहिक हँसी दुनिया से उठती चली जा रही है ।। उसके स्थान पर एक अनावश्यक एक कृत्रिम गंभीरता लोगों में बढ़ती जा रही है ।। 

 

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