Saturday, 8 April 2017

धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=436धर्म और विज्ञान दोनों ही मानव जाति की अपने-अपने स्तर की आवश्यकता है। दोनों एक-दूसरे को अधिक उपयोगी बनाने में भारी योगदान दे सकते हैं। जितना सहयोग एवं आदान-प्रदान संभव हो उसके लिए द्वार खुला रखा जाए, किंतु साथ ही यह भी ध्यान रखा जाए कि दोनों का स्वरुप और कार्य-क्षेत्र एक-दूसरे से भिन्न हैं। इसलिए वे एक-दूसरे पर अवलंबित नहीं रह सकते और न ही ऐसा हो सकता है कि एक का समर्थन पाए बिना दूसरा अपनी उपयोगिता में कमी अनुभव करे।

शरीर भौतिक है, उसके सुविधा-साधन भौतिक विज्ञान के सहारे जुटाए जा सकते हैं, आत्मा चेतन है, उसकी आवश्यकता धर्म के सहारे उपलब्ध हो सकेगी। यह एक तथ्य और ध्यान रखने योग्य है कि परिष्कृत धर्म का नाम आध्यात्म भी है और आत्मा के विज्ञान-अध्यात्म का उल्लेख अनेक स्थानों पर धर्म के रूप में भी होता रहा है, अस्तु उन्हें पर्यायवाचक भी माना जा सकता है। 

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समस्याएँ आज की समाधान कल के

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=176सड़क पर चलने वाला कोई पगला, राहगीरों पर ईंट, पत्थरों की मारामार मचा सकता है और कितने ही सिर और कितने ही पंजर तोड़- फोड़ कर रख सकता है। यह सरल है। कठिनाई तब पड़ती है, जब उस टूट- फूट को नए सिरे से ठीक करना पड़ता है। पिछले दिनों लोकमानस पर दुहरा उन्माद चढ़ा है। एक वैज्ञानिक उपलब्धियों का और दूसरा प्रत्यक्ष को, तत्काल को ही सब कुछ मान बैठने का। उस गहरी खुमारी और लड़खड़ा देने वाली बदहवासी में यह सोचते भी नहीं बन पड़ा कि इस विक्षिप्तता से उन्मत्त होकर, जो कर गुजरने का आवेश चढ़ दौड़ा है, उसका क्या परिणाम होगा? अनाचारी इसी उन्मादग्रस्त स्थिति में कुछ भी कर गुजरते हैं और पछताते तब हैं, जब कुकृत्यों के दुष्परिणाम भयानक प्रतिक्रिया के साथ सामने आ खड़े होते हैं।

अगली शताब्दी में उज्ज्वल भविष्य की संरचना करने के लिए कुछ तो नया भी खरीदना पड़ेगा, पर साथ ही यह भी देखना होगा कि किन कारणों से व्रिगह हुआ और उनका सुधार बन पड़ा या नहीं। यदि इतना भर मंथन कर लिया जाए, तो समस्या का अधिकांश हल अनायास ही निकल सकता है। 

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Monday, 3 April 2017

मनस्विता प्रखरता और तेजस्विता-५७

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=380परमपूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने सदैव विधेयात्मक चिंतन -सुदृढ़ मनोबल बढाने की दिशा में प्रेरणा देने वाला साहित्य सृजन किया एवं लिखा कि आदमी की प्रखरता व तेजस्विता जो बहिरंग में दृष्टिगोचर होती है इसी मनस्विता की, दृढ़ संकल्पशक्ति की ही एक फलश्रुति है । वे लिखते हैं कि जैसे किसान बीजों को रोपता है एवं अंकुर उगने से लेकर फसल की उत्पत्ति तक एक सुनियोजित क्रमबद्ध प्रयास करता है, उसी प्रकार संकल्प भी एक प्रकार का बीजारोपण है । किसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक सुनिश्चित निर्धारण का नाम ही संकल्प है । अभीष्ट तत्परता बरती जाने पर यही संकल्प जब पूरा होता है तो उसकी चमत्कारी परिणति सामने दिखाई पड़ती है । उज्ज्वल भविष्य के प्रवक्ता परमपूज्य गुरुदेव नवयुग के उपासक के रूप में संकल्पशक्ति के अभिवर्द्धन से तेजस्वी-प्रतिभाशाली समुदाय के उभरने की चर्चा वाड्मय के इस खंड में करते हैं ।

संकल्पशीलता को व्रतशीलता भी कहा गया है । व्रतधारी ही तपस्वी और मनस्वी कहलाते हैं । मन:संस्थान का नूतन नव निर्माण कर पाना संकल्प का ही काम है । संकल्पवानों के प्राणवानों के संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते । सृजनात्मक संकल्प ही व्यवहार में सक्रियता एवं प्रवृत्तियों में प्रखरता का समावेश कर पाते हैं । परमपूज्य गुरुदेव बार-बार संकल्पशीलता के इस पक्ष को अधिक महत्ता के साथ प्रतिपादित करते हुए एक ही तथ्य लिखते हैं कि आज यदि नवयुग की आधारशिला हमें रखनी है तो वह संकल्पशीलों के प्रखर पुरुषार्थ से उनकी तेजस्विता एवं मनस्विता के आधार पर ही संभव हो सकेगी । ऐसे व्यक्ति जितनी अधिक संख्या में समाज में बढ़ेंगे, परिवर्तन का चक्र उतना ही द्रुतगति से चल सकेगा । 

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मरें तो सही पर बुद्धिमत्ता के साथ

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=50यों कहने को तो सभी कहते हैं कि जो जन्मा है सो मरेगा । इसलिए किसी की मृत्यु पर दुःख मनाते हुए भी यह नहीं कहा जाता है कि यह अनहोनी घटना घट गई । देर-सबेर मेंआगे-पीछे मरना तो सभी को है, यह मान्यता रहने के कारण रोते-धोते अंतत: संतोष कर ही लेते हैं । जब सभी को मरना है तो अपने स्वजन-संबंधी ही उस काल-चक्र से कैसे बच सकते हैं ?

लोक मान्यताओं की बात दूसरी है, पर विज्ञान के लिए यह प्रश्न काफी जटिल है । परमाणुओं की तरह जीवाणु भी अमरता के सन्निकट ही माने जाते हैं । जीवाणुओं की सरचना ऐसी है, जो अपना प्रजनन और परिवर्तन क्रम चलाते हुए मूलसत्ता को अक्षुण्ण बनाए रहती है । जब मूल इकाई अमर है तो उसका समुदाय-शरीर क्यों मर जाता है? उलट-पुलटकर वह जीवित स्थिति में ही क्यों नहीं बना रहता ? उनके बीच जब परस्पर सघनता बनाए रहनेवाली चुंबकीय क्षमता का अविरल स्रोत विद्यमान है, तो कोशाओं के विसंगठित होने और बिखरने का क्या कारण है? थकान से गहरी नींद आने और नींद पूरी होने पर फिर जग पड़ने की तरह ही मरना और मरने के बाद फिर जी उठना क्यों संभव नहीं हो सकता ?

बैक्टीरिया से लेकर अमीबा तक के दृश्यमान और अदृश्य जीवधारी अपने ही शरीर की उत्क्रांति करते हुए अपनी ही परिधिमें जन्म-मरण का चक्र चलाते हुए प्रत्यक्षत: अपने अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रहते हैं । फिर बड़े प्राणी ही क्यों मरते हैं ? मनुष्यको ही क्यों मौत के मुँह में जाने के लिए विवश होना पड़ता है? 

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बडे़ आदमी नहीं महामानव बनें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=62न जाने किस कारण लोगों के मन में यह भ्रम पैदा हो गया है कि ईमानदारी और नीति निष्ठा अपनाकर घाटा और नुकसान ही हाथ लगता है । संभवत: इसका कारण यह है कि लोग बेईमानी अपनाकर छल-बल से, धूर्तता और चालाकी द्वारा जल्दी-जल्दी धन बटोरते देखेजाते हैं । तेजी से बढ़ती संपन्नता देखकर देखने वालों के मन में भीवैसा ही वैभव अर्जित करने की आकांक्षा उत्पन्न होती है । वे देखते हैंकि वैभव संपन्न लोगों का रौब और दबदबा रहता है । किंतु ऐसा सोचते समय वे यह भूल जाते है कि बेईमानी और चालाकी से अर्जित किए गए वैभव का रौब और दबदबा बालू की दीवार हीहोता है, जो थोड़ी-सी हवा बहने पर ढह जाता है तथा यह भी कि वह प्रतिष्ठा दिखावा, छलावा मात्र होती है क्योंकि स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से कतिपय लोग उनके मुँह पर उनकी प्रशंसा अवश्य करदेते हैं, परंतु हृदय में उनके भी आदर भाव नहीं होता ।

इसके विपरीत ईमानदारी और मेहनत से काम करने वाले,नैतिक मूल्यों को अपनाकर नीति निष्ठ जीवन व्यतीत करने वाले भले ही धीमी गति से प्रगति करते हों परंतु उनकी प्रगति ठोस होती है तथा उनका सुयश देश काल की सीमाओं को लांघकर विश्वव्यापी और अमर हो जाता है । अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार जार्ज बर्नार्डशॉ को कौन नहीं जानता । उन्होंने अपना जीवन प्रापर्टी डीलर के यहाँ उसके कार्यालय में क्लर्क की नौकरी से प्रारंभ किया था ।  

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परिवर्तन के महान क्षण

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=171बीसवीं सदी का अंत आते- आते समय सचमुच बदल गया है। कभी संवेदनाएँ इतनी समर्थता प्रकट करती थीं कि मिट्टी के द्रोणाचार्य एकलव्य को धनुष विद्या में प्रवीण- पारंगत कर दिया करते थे। मीरा के कृष्ण उसके बुलाते ही साथ नृत्य करने के लिए आ पहुँचते थे। गान्धारी ने पतिव्रत भावना से प्रेरित होकर आँखों में पट्टी बाँध ली थी और आँखों में इतना प्रभाव भर लिया था कि दृष्टिपात करते ही दुर्योधन का शरीर अष्ट- धातु का हो गया था। तब शाप- वरदान भी शस्त्र प्रहारों और बहुमूल्य उपहारों जैसा काम करते थे। वह भाव- संवेदनाओं का चमत्कार था। उसे एक सच्चाई के रूप में देखा और हर कसौटी पर सही पाया जाता था।

अब भौतिक जगत ही सब कुछ रह गया है। आत्मा तिरोहित हो गई। शरीर और विलास- वैभव ही सब कुछ बनकर रह गए हैं। यह प्रत्यक्षवाद है। जो बाजीगरों की तरह हाथों में देखा और दिखाया जा सके वही सच और जिसके लिए गहराई में उतरना पड़े, परिणाम के लिए प्रतीक्षा करनी पड़े, वह झूठ। आत्मा दिखाई नहीं देती। परमात्मा को भी अमुक शरीर धारण किए, अमुक स्थान पर बैठा हुआ और अमुक हलचलें करते नहीं देखा जाता इसलिए उन दोनों की ही मान्यता समाप्त कर दी गई। 

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चेतन ,अचेतन एवं सुपर चेतन मन

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=186मानवी काया एक विलक्षणताओं का समुच्चय है । यदि इस रहस्यमय अद्भुत कायपिंजर को समझा जा सके व तदनुसार जीवन-साधना सम्पन्न करते हुए अपने जीवन की रीति-नीति बनायी जा सके तो व्यक्तित्त्व सम्पन्न, ऋद्धि-सिद्धि सम्पन्न बना जा सकता है । इसके लिए अपने स्वयं के मन को ही साधने की व्यवस्था बनानी पड़ेगी । यदि यह सम्भव हो सके कि व्यक्ति अपने चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मस्तिष्कीय परतों की एनाटॉमी समझकर तदनुसार अपना व्यक्तित्त्व विकसित करने की व्यवस्था बना ले तो उसके लिए सब कुछ हस्तगत करना सम्भव है । यह एक विज्ञान सम्मत तथ्य है, यह मानवी मनोविज्ञान को समझाते हुए पूज्यवर बडे़ विस्तार से इस गूढ़ विषय को विवेचन करते इसमें पाठकों को नजर आयेंगे । मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार रूपी अन्त: करण चतुष्टय की सत्ता से हमारा निर्माण हुआ है । यदि विचारों की व्यापकता और सशक्तता का स्वरूप समझा जा सके व तदनुसार अपने व्यक्तित्त्व के निर्माण का सूत्र समझा जा सके तो इस अन्त करण चतुष्टय को प्रखर, समर्थ और बलवान बनाया जा सकता है ।

यदि अचेतन का परिष्कार किया जा सके, आत्महीनता की महाव्याधि से मुक्त हुआ जा सके, तो हर व्यक्ति अपने विकास का पथ स्वयं प्रशस्त कर सकता है । उत्कृष्टता से ओतप्रोत मानवी सत्ता ही मनुष्य के वैचारिक विकास की अन्तिम नियति है । यदि चिन्तन उत्कृष्ट स्तर का होगा तो कार्य भी वैसे बन पड़ेंगे एवं मानव से महामानव, चेतन से सुपरचेतन के विकास की, अतिचेतन के विकास की आधारशिला रखी जा सकेगी । 

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