Tuesday, 18 April 2017
Monday, 17 April 2017
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य दर्शन एवं दृष्टि
समय के साथ बदलती परिस्थितियाँ नित नई चुनौतियां प्रस्तुत करती
हैं । जटिलताओं के मकड़जाल में छटपटाती जीवित जीवनियाँ मानसिक तनाव,
सांस्कृतिक विलम्बना और अपूर्णता से छुटकारा पाना चाहती है। सुविधाओं की ओर
अंधी दौड़ के प्रतिभागी मृग मारीचिका के चक्रव्यूह में फँस जाते हैं । ऐसे
में हताशा कुंठा और निराशा का दावानल अपना प्रभाव दिखाकर प्रतिभाओं पर
कुठाराघात करने लगते हैं । असामान्य परिस्थितियों के धरातल पर बहुआयामी
जीवन को जीने की व्यवहारिक कला सीख कर यथार्थ के समीप पहुंचना सहज नहीं है ।
अखिल विश्व गायत्री परिवार के सस्थापक पं श्रीराम शर्मा आचार्य की मानवीय
जीवन लीला वर्तमान समय में प्रेरणा पुंज बनकर विश्व के करोड़ों लोगों के
आत्म विश्वास को पुष्ट करके सतुंष्टि के मार्ग प्रशस्त कर रही है । समाज के
सभी पक्षों को एक साथ आत्मसात करना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।
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नया संसार बसायेगे, नया इन्सान बनायेगे
वसुधैव कुटंबकम का सैद्धांतिक आधार
मनुष्य को भगवान ने बहुत कुछ देकर इस पृथ्वी पर भेजा है ।। शारीरिक दृष्टि
से वह कई प्राणियों की तुलना में कमजोर जरूर ठहरता है, पर बौद्धिक दृष्टि
से उसके पास जो सामर्थ्य संचित है, परमात्मा ने बुद्धि और ज्ञान का- जो
बहुमूल्य उपहार उसे प्रदान किया है, वह अपने आप में इतना महत्त्वपूर्ण है
कि एक इसी के बल पर उसने संसार के समस्त प्राणियों को पीछे छोड़ दिया ।। कोई
व्यक्ति दूसरों से तुलना करके अपने को भले ही अभावग्रस्त और असहाय समझता
रहे, लेकिन वास्तविकता यह है कि वह न अभावग्रस्त है, न निर्बल और न निर्धन
।। यों रोना ही रोना हो तो- संपन्न से संपन्न व्यक्ति भी अपने पास किन्हीं
वस्तुओं के अभाव की बात सोचते हुए असंतोष की आग में जलते रह सकते हैं ।।
लेकिन वास्तविकता यह है कि दयनीय से दयनीय हालत में पड़ा रहने वाला मनुष्य
भी न अभावग्रस्त है और न दयनीय ।। अपनी महत्ता और सर्वोपरिता को प्रत्यक्ष
रूप से स्वीकार किए जाने के बाद भी मनुष्य की अंतरंग चेतना में श्रेष्ठता
का भाव छिपा हुआ है ।। यह इस बात से सिद्ध होता है कि दुखी से दुखी व्यक्ति
भी अपने दु:खों से छुटकारा प्राप्त करने के लिए मरना पसंद नहीं करते ।।
भावावेश में आकर कोई व्यक्ति आत्महत्या कर ले, यह बात अलग है ।। किंतु सचाई
यह है कि लोगों की अंतरंग चेतना में मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता का भाव इस
प्रकार अपनी जड़ें जमाए हुए है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में
अपने जीवन को खोना नहीं चाहता ।।
स्थिति और बाह्य उपलब्धियों की दृष्टि से कोई व्यक्ति भले ही साधनहीन दिखाई
दे, पर यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति को जन्मजात रूप से सब कुछ न सही तो
भी बहुत कुछ अवश्य मिला है ।।
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धर्म तत्व का दर्शन, मर्म-५३
धर्म शब्द सम्प्रदाय से भिन्न, बड़ी व्यापक परिभाषा लिए हुए है। जहाँ सम्प्रदाय उपासना विधि, कर्मकाण्डों और रीति-रिवाजों का समुच्चय है वहाँ धर्म एक प्रकार से जीवन जीने की शैली का ही दूसरा नाम है। सम्प्रदायपरक मान्यताएँ देश, काल, क्षेत्र, परिस्थिति के अनुसार बदलती रह सकती हैं, परन्तु धर्म शाश्वत-सनातन् होता है। धर्म की तीन भाग बताए जाते हैं, जिन्हें परस्पर संबद्ध करने पर ही वह समग्र बनता है- ये हैं तत्वदर्शन-ज्ञानमीमांस, नीतिशास्त्र एवं अध्यात्म। धर्मधारणा हरेक के लिए अनिवार्य है एवं उपयोगी भी। धर्म का अवलम्बन निज की सुरक्षा ही नहीं, समाज की अखण्डता के लिए भी जरूरी है।
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देखन मे छोटे लगें घाव करे गम्भीर भाग-३
युग शक्ति का उद्भव और युग निर्माण
किसी कार्य को करने के लिए शक्ति एवं साधनों की आवश्यकता पड़ती है। युग
निर्माण के लिए जन साधन जुटाने का कार्य ज्ञानयज्ञ के माध्यम से चल रहा है
।। शक्ति का उत्पादन आत्म- साधना के सहारे किया जा रहा है ।। युग शक्ति का,
युग चेतना का उद्भव इन्हीं दोनों शक्तियों के द्वारा संभव हो सकेगा ।। इस
संदर्भ में अधिक स्पष्ट और अधिक विस्तृत रूप से इस प्रकार समझा जा सकता है
।।
युग निर्माण अभियान का लक्ष्य है- मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर
स्वर्ग का अवतरण ।। श्रेष्ठ व्यक्ति की ही देव संज्ञा है ।। देवता स्वर्ग
में रहते हैं ।। स्वर्ग ऊपर है ऊपर ऊँचाई की स्थिति ही स्वर्ग है ।। स्वर्ग
से तात्पर्य है व्यक्तित्व ।। वह दृष्टिकोण, वह क्रिया- कलाप जो
सर्वसाधारण की तुलना में ऊँचा, उच्चस्तरीय हो ।। ऐसा वातावरण जिसमें
श्रेष्ठता, सज्जनता और शालीनता छाई रहती हो, स्वर्ग कहा जाएगा ।। जहाँ ऐसी
मनःस्थिति होगी वहाँ सहज सुख- शांति की, समृद्धि और प्रगति की परिस्थितियाँ
रहेंगी ही ।। मानवी कर्तृत्व का आधे से अधिक भाग आक्रमणों से रक्षा करने,
आशंकाओं का समाधान ढूँढने और आक्रोश- आवेगों की प्रेरणा से ध्वंस करने वाले
कृत्य करने में खरच होता रहता है ।। यदि इसे बचाकर सृजन में लगाया जा सके
तो निश्चित रूप से उनके द्वारा आंतरिक प्रसन्नता और बाह्य सुविधा की
अभिवृद्धि में भारी योगदान मिल सकता है ।। स्वर्ग के अवतरण का, धर्म- राज्य
के संस्थापन का स्वरूप यही है ।। यह सम्मिलित प्रक्रिया है ।। मनुष्यों का
समूह ही समाज है ।। सामाजिक सतवृत्तियाँ ही स्वर्ग का निर्माण करती हैं ।।
समाज निर्माण के लिए व्यक्ति का निर्माण करना होगा ।।
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देखन मे छोटे लगें घाव करे गम्भीर भाग-२
नारी का शील- राष्ट्र की संपत्ति
कैसोविया गणराज्य के एक बड़े नगर गुइनपापर में चार व्यक्तियों को एक स्त्री के साथ बलात्कार करने के मामले में मृत्युदंड की सजा दी गई ।। इस मुकदमे की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी वकील ने इस मुकदमे की पैरवी करना स्वीकार नहीं किया ।। सुनवाई कुल चार दिन हुई और पाँचवें दिन निर्णय देकर छठवें दिन चारों अपराधियों को निर्णयानुसार शूली पर चढ़ा दिया गया ।।
इस्तगासे के अनुसार ९१ वर्षीय युवती मेट्रन बाविना किसी काम से बाजार जा रही थी ।। विद्यालय और सड़क के बीच थोड़ा फासला पड़ता था, वहीं अभियुक्तों ने उसे पकड़ लिया तथा बंदूक दिखाकर उसे डराया और उसके साथ बलात्कार किया ।। तुरंत बाद ही चारों अभियुक्तों को हिरासत में ले लिया गया ।। युवती की शिनाख्त के अतिरिक्त कई अन्य प्रत्यक्ष प्रमाण थे, जिनके कारण सभी चारों बदमाशों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया ।।
जब मामला अदालत में लाया गया, उस समय सर्वप्रथम आदर्श उपस्थित किया एडवोकेट संघ ने, जिसकी तुरंत बैठक की गई ।। बैठक के अध्यक्ष की इस अपील पर कि जहाँ तक अन्य सामाजिक मामले हैं उनमें थोड़ी- बहुत असमानता हो सकती है, पर स्त्रियों की सुरक्षा और उनके शील की रक्षा सारे समाज के लिए एक- सी है ।। हम यह कभी सहन नहीं कर सकते कि जिन स्त्रियों के चरित्र के कारण हम पुरुषों का भाग्य और चरित्र निर्मित होता है, उनको लोग बंदूक से डराकर पथभ्रष्ट किया करें ।। यह प्रत्येक व्यक्ति के साथ विश्वासघात है, इसलिए ऐसे प्रत्येक दुराचरणशील व्यक्ति को कभी भी माफ नहीं किया जाना चाहिए ।।
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दुनिया नष्ट नहीं होगी श्रेष्ठतर बनेगी
युगऋषि (वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० आचार्य श्रीराम शर्मा) ने मनुष्य मात्र को उज्ज्वल भविष्य तक ले जाने वाली दैवी योजना ‘युग निर्माण योजना’ भी घोषणा तो की ही, उसे एक प्रकार प्रखर जन आन्दोलन का स्वरूप भी प्रदान किया। भारत द्वारा पुनः विश्वगुरु की भूमिका निभाने के गरिमामय स्तर तक पहुँचने की बात स्वामी विवेकानन्द एवं योगी श्री अरविन्द आदि ने अपने वक्तव्यों में बार- बार दोहराई है। युगऋषि ने उन्हीं के कथन के अनुरूप उस दिव्य योजना के अगले चरणों के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक स्वरूपों का खुलासा किया है। जन- जन को उसी ईश्वरीय योजना में भागीदारी लेने- निभाने के लिए आमंत्रित तथा प्रेरित किया है।
महापुरुषों के उक्त कथन को जानते हुए भी बड़ी संख्या में नर- नारी निकट भविष्य में किसी विनाशलीला की संभावनाओं से भयभीत देखे जाते हैं। उनका भय अकारण भी नही हैं। बिगड़ते पर्यावरण के कारण बढ़ता भूमण्डलीय तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) अनेक प्राकृतिक भीषण विपदाओं की ओर संकेत कर रहा है। मनुष्य में बढ़ते अहंकार के कारण बढ़ रहे छोटे बड़े विग्रहों से लेकर विश्वयुद्ध- अणुयुद्ध तक की संभावनाएँ कम खतरनाक नही हैं। मनुष्य की संकीर्ण स्वार्थपरता तथा अनगढ़ सुख लिप्सा के कारण बढ़ते अपराध मनुष्य जाति को कहाँ ले जाकर पटकेगें? यह चिन्ता हर समझदार के मन में उठती है, तो उसे निराधार भी तो नहीं कहा जा सकता। माया सभ्यता की कालसारिणी (मायान्स कैलेण्डर) को लेकर उभरी अनगढ़ चर्चाओं ने उक्त भय को और भी बढ़ा दिया है।
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