Thursday, 16 February 2017

जल्दी मरने की उतावली न करें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=539तनाव डर स्थिति में हानिकारक

यह तथ्य न केवल सर्वविदित है वरन् प्रत्येक का अनुभव भी है कि आज का जीवन व्यस्त और तनावपूर्ण है ।। आजकल सभी लोग तनावपूर्ण जीवन के शिकार हैं ।। युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, व्यवसायी और नौकर पेशा गरीब और अमीर हर वर्ग तथा हर स्तर का व्यक्ति तनावग्रस्त है ।। सड़कों पर भागती हुई जिंदगी आपस में बात करने और मिलने जुलने के लिए समस्या जरा सी बात पर दांत पीसना और बाहें चढ़ाना व्यापारियों का चीख चिल्लाकर बात करना गृहिणियों की बच्चों पर डांट फटकार आदि सभी इस बात के प्रतीक हैं कि चारों ओर मानसिक तनाव व्याप्त है ।। यों तनाव से सामान्य अर्थ मानसिक तनाव ही लिया जाता है पर वस्तुत: तनाव तीन प्रकार के होते हैं शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनाव ।। इन्हें आधिदैविक और आध्यात्मिक ताप भी कहा जा सकता है ।। दैविक और भौतिक चिंताओं तापों के रूप में भी इन्हीं की चर्चा की जाती है ।।

लंबे समय तक लगातार एक ही प्रकार का काम करने और अत्यधिक श्रम करने के कारण जो थकान उत्पन्न होती है उसे शारीरिक तनाव कहा जा सकता है ।। थक जाने या बहुत अधिक श्रम करने के बाद मनुष्य किस कदर लस्त- पस्त हो जाता है कि उसकी और कुछ करने की बात तो दूर रही कुछ कहने या सुनने की इच्छा भी नहीं होती ।। यहाँ आवश्यक नहीं है कि बहुत अधिक सोने दिन चढ़े तक पड़े रहने ज्यादा खाने आवश्यकता से अधिक आराम करने के कारण भी मस्कुलरटेन्सन उत्पत्र होता है ।। आहार- विहार की गड़बड़ी और अस्त- व्यस्तता भी शारीरिक तनाव उत्पत्र करती है ।। 

 

Buy online: 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=539

 


कलात्मक जीवन जियें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=965बहुत से लोग जिंदगी को विविध उपकरणों से सजाए- सँवारे रहने को ही कला समझते हैं, किंतु बाह्य प्रसाधनों द्वारा जीवन का साज- शृंगार किए रहना कला नहीं है ।। यह मनुष्य की लिप्सा है, जिसे पूरा करने में उसे एक झूठे संतोष का आभास होता है ।। फलत: यह मान बैठता है कि वह जिंदगी को ठीक से जी रहा है ।। कला तो वास्तव में वह मानसिक वृत्ति है, जिसके आधार पर साधनों की कमी में भी जिंदगी को खूबसूरती के साथ जिया जा सकता है ।।

जिंदगी को हर समय हँसी- खुशी के साथ अग्रसर करते रहना ही कला है और उसे रो- झींककर काटना ही कलाहीनता है ।। जहाँ तक जिंदगी को कलापूर्ण बनाने में साधनों की सहायता का प्रश्न है- उसके विषय में बहुत बार देखा जा सकता है कि एक ओर जहाँ प्रचुर साधन- संपन्न अनेक लोग रों- रोकर जिंदगी काट रहे हैं, उनसे बात करने पर ऐसा लगता है मानो उनका जीवनतत्त्व समाप्त हो गया है और वे ऊबे हुए शेष श्वासों की लकीर पीट रहे हैं, जीवन से उन्हें अभिरुचि नहीं रह गई है ।। इस प्रकार की जिंदगी को आकुल अथवा अकलापूर्ण कहा जाएगा ।। 

 

Buy online: 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=965

 


कठिनाइयों की कसौटी पर खरे उतरें

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1022सृष्टि-संचालन के सार्वभौम नियमों के अनुसार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन होते रहना एक स्वाभाविक बात है । दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होता है । वर्षा के बाद शरद और इसके पश्चात ग्रीष्म ऋतु का आगमन भी निश्चय ही होता है । सूर्य, चंद्र एवं अन्य ग्रह भी एक नियमबद्ध गति में चलते हैं । इसी तरह मानव जीवन भी इन सार्वभौम नियमों के अंतर्गत सदैव एकसा नहीं रहता । मनुष्य की इच्छा हो या न हो, जीवन में भी परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आती रहती हैं । आज उतार है तो कल चढ़ाव । चढ़े हुए गिरते हैं और गिरे हुए उठते हैं । आज उँगली के इशारे पर चलने वाले अनेक अनुयायी हैं तो कल सुख-दुःख की पूछने वाला एक भी नहीं रहता । रंक कहाने वाला एक दिन धनपति बन जाता है तो धनवान निर्धन बन जाता है । जीवन में इस तरह की परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आते-जाते रहना नियतिचक्र का सहज स्वाभाविक नियम है । इनसे बचा नहीं जा सकता, इन्हें टाला नहीं जा सकता ।

एकांगी विचारप्रेरित मनुष्य इस नियति के विधान को नहीं समझ पाता । वह अपनी इच्छा-कामना के अनुकूल परिस्थितियों में ही सुख का अनुभव करता है तो विपरीत परिस्थितियों में दुःखी हो जाता है । अधिकांश व्यक्ति सुख, सुविधा, संपन्नता, लाभ, उन्नति आदि में प्रसन्न और सुखी रहते हैं किंतु दुःख, कठिनाई, हानि आदि में दुःखी और उद्विग्न हो जाते हैं । किंतु यह मनुष्य के एकांगी दृष्टिकोण का परिणाम है और इसी के कारण कठिनाई, मुसीबत, कष्ट आदि शब्दों की रचना हुई । 

 

Buy online: 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1022

 


उपभोग नहीं उपयोग्

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1213जीवन उतना जटिल नहीं है जितना कि बन जाता है या बना दिया गया है ।। हँसी- खुशी की संभावनाओं से वह भरा- पूरा है ।। शरीर और मन की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह बाहर के तनिक से साधनों की सुविधा प्राप्त हो जाने पर सहज ही स्वस्थ और सुखी रह सकता है ।। अति स्वल्प साधनों से अन्य जीवधारी अपना संतोषपूर्ण व्यवस्था क्रम चलाते रहते हैं, न उन्हें रुग्णता सताती है और न खिन्नता ।। यदि उन्हें सताया न जाए, तो शरीर यात्रा की प्रचुर परिमाण में उपलब्ध साधन सामग्री से ही अपना काम चला लेते है और हँसी- खुशी के दिन काटते है ।।

मनुष्य को यह सुविधा और भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है ।। उसका अस्तित्व एवं व्यक्तित्व इतना समर्थ है कि न केवल शारीरिक सुविधा की सामग्री, वरन् मानसिक प्रसन्नता की परिस्थिति भी स्वल्प प्रयत्न से प्रचुर मात्रा में प्राप्त कर सकता है ।। इतने पर भी देखा यह जाता है कि मनुष्य खिन्नता और अतृप्ति से ही घिरा रहता है ।। आधियों और व्याधियों की घटाएँ उस पर छाई रहती हैं ।।

सौभाग्य जैसे समस्त साधन प्राप्त होने पर भी दुर्भाग्य की जलन में झुलसते रहने के पीछे एक ही कारण ढूँढ़ा जा सकता है कि सहज सरल रीति- नीति को छोड़कर हम जाल- जंजाल भरी विद्रुप विडम्बनाओं में उलझ गए और अपना मार्ग स्वयं कंटकाकीर्ण बना लिया ।। सहज स्वाभाविकता का नाम है धर्म और उसके विपरीत आचरण को अधर्म कहते हैं ।। वैयक्तिक और सामाजिक कर्तव्यों को जो सही तरह समझता है और सही तरह पालन करता है, उसे स्वल्प साधनों में भी तुष्ट- पुष्ट और प्रगतिशील देखा जा सकेगा ।। 

 

Buy online: 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1213

 


आवेशग्रसत होने से अपार हानि

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=738

आवेशग्रस्त होने से अपार हानि

बात- बात पर उद्विग्न न हों

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए तत्संबंधी योग्यता, अनुभव के साथ- साथ मानसिक संतुलन, शांत मस्तिष्क की भी अधिक आवश्यकता होती है ।। कोई व्यक्ति कितना ही योग्य, अनुभवी, गुणी क्यों न हो, यदि बात- बात पर उसका मन आँधी- तूफान की तरह उद्वेलित, अशांत हो जाता हो तो वह जीवन में कुछ भी नहीं कर पाएगा ।। उसकी शक्तियाँ व्यर्थ में ही नष्ट हो जाएँगी और भली प्रकार से वह अपने काम पूरा नहीं कर सकेगा ।। प्रत्येक छोटे से लेकर बड़े कार्यक्रम शांत और संतुलित मस्तिष्क के द्वारा ही पूरे किए जा सकते हैं ।। संसार में मनुष्य ने अब तक जो कुछ भी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, उसके मूल में धीर- गंभीर, शांत मस्तिष्क ही रहे हैं ।। कोई भी साहित्यकार, वैज्ञानिक कलाकार व शिल्पी, यहाँ तक कि बढ़ई, लुहार, सफाई करने वाला श्रमिक तक अपने कार्य तब तक भलीभाति नहीं कर सकते, जब तक उनकी मनःस्थिति शांत न हो ।। कोई भी साधना स्वस्थ, संतुलित मनोभूमि में ही फलित हो सकती है ।। जो क्षण- क्षण में उत्तेजित हो जाता हो, सामान्य- सी घटनाएँ जिसे उद्वेलित कर देती हों, जिसका मन अशांत और विक्षुब्ध बना रहता हो, ऐसा व्यक्ति कोई भी कार्य भली प्रकार से नहीं कर सकेगा और न वह अपने काम के बारे में ठीक- ठीक सोच- समझ ही सकेगा ।। 

 

Buy online: 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=738




Wednesday, 15 February 2017

आराम नहीं काम कीजिए

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=997उपनिषद्कार ने कहा है - "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।" कर्म करते हुए हम सौ वर्ष जीने की इच्छा करें ।। आराम करते हुए मौज- मजा करते हुए चैन की वंशी बजाते हुए सौ वर्ष जीने के लिए क्यों नहीं कहा उपनिषद् के ऋषि ने ? इसीलिए कि श्रम के अभाव में आराम, आनंद, यहाँ तक कि सौ वर्ष जीने का अधिकार भी छिन जाता है हम से ।। श्रम के साथ ही जीवन अपनी महानता और समृद्धियों के परदे खोलता है ।। जीवन की पूर्णता प्राप्त करनी है तो परिश्रम करना पड़ेगा ।।

स्वामी विवेकानंद ने कहा है- "श्रम ही जीवन है ।। जिस समाज में श्रम को महत्त्व नहीं मिलता वह जल्द ही नष्ट हो जाता है ।"

अमेरिका के धनकुबेर हेनरीफोर्ड ने लिखा है- "हमारा काम हमें जीने के साधन ही प्रदान नहीं करता वरन स्वयं जीवन प्रदान करता है ।" 

 

Buy online:

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=997 




आध्यात्मिक काम-विज्ञान

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=813नर और नारी के बीच पाए जाने वाले प्राण और अग्नि और सोम; स्वाहा और स्वधा तत्त्वों का महत्त्व, सामान्य नहीं असामान्य है । सृजन और उद्भव की उत्कर्ष और आह्लाद की असीम संभावनाएँ उसमें भरी पड़ी हैं, प्रजा उत्पादन तो उस का बहुत ही सूक्ष्म या स्थूल और अति तुच्छ परिणाम है । सृष्टि के मूल कारण और चेतना के आदि स्रोत, इन द्विधा संस्करण और संचरण का ठीक तरह मूल्यांकन किया जाना चाहिए और इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि, इनका सदुपयोग किस प्रकार विश्वकल्याण की सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक हो सकता है और उनका दुरुपयोग मानवजाति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को किस प्रकार क्षीण-विकृत करके, विनाश के गर्त में धकेलने के लिए दुर्दांत दैत्य की तरह सर्वग्रासी संकट उत्पत्र कर सकता है, कर रहा है। 

 Buy online: 

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=813