Preface
अपव्यय एक स्पष्ट अनैतिकता है ।। जो व्यक्ति अपनी स्थिति से अधिक अनुपयुक्त कार्यों में खरच कर रहा होगा उसे अविवेकी कहा जाएगा ।। कुछ अविवेकी ऐसे भी होते हैं, जो एक सनक तक सीमित रहकर मनुष्य की मनोदशा को अस्त- व्यस्त करते रहते हैं ।। कुछ अविवेक ऐसे होते हैं जो सीधे भले ही अनैतिक न हों पर उनके परिणाम अनैतिक होते हैं ।। शराब पीना यों अपनी मरजी की अपने पैसे से खरीदी हुई वस्तु पीना मात्र एक साधारण- सी क्रिया है, उसमें दलील के लिए यह भी कहा जा सकता है कि अपनी जेब का पैसा चाहे जिस काम में खरच करने का अधिकार मनुष्य को है, फिर शराब के पीने में क्या बुराई ? पर थोड़ा गंभीरतापूर्वक विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि दलील थोथी है ।। शराब पीने के जो दुष्परिणाम होते हैं, उनसे शारीरिक मानसिक और सामाजिक परिस्थितियां लड़खड़ा जाती हैं ।। मनुष्य न करने लायक काम करने लगता है, न कहने लायक बातें कहने लगता है ।। अस्तु नशेबाजी को उसके दुष्परिणामों के कारण अवांछनीय ठहराया गया और उसका उपयोग हर धर्म ने निषिद्ध ठहराया ।। विवाहों में होने वाला अपव्यय यों अपने पैसे को फूँककर मनोरंजन करने के व्यक्तिगत अधिकार की सीमा में ही दिखाई पड़ता है ।। कहा जा सकता है कि मनुष्य अपनी कमाई का चाहे जो उपयोग करे, उसमें किसी का क्या आता- जाता है ।।
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मनुष्य का प्रधान लक्षण है- स्वाभिमान ।। बल, धन, विद्या, सत्ता आदि सम्पदाओं का अहंकार करना बात दूसरी है, घमण्ड की निन्दा की गई है और उसे पतनकारी दुष्प्रवृत्ति बताया गया है स्वाभिमान इससे सर्वथा भिन्न है ।। आत्म- गौरव एवं आत्म- सम्मान आत्मा की भूख है ।। आत्मा महान् है उसकी महत्ता एवं श्रेष्ठता का वारापार नहीं इसलिए उसे अपने गौरव के अनुरूप परिस्थितियों में ही रहना चाहिए ।। तिरस्कार एवं अपमान की स्थिति उसके लिए न तो वांछनीय ही हो सकती है और न उपयुक्त ही ।। तिरस्कृत रहते हुए भी यों जिन्दगी को जिया जा सकता है ।। अन्न मिलता रहे तो साँस चलती रहेगी पर इससे आत्मिक महानता जीवित नहीं रह सकती उक्के लिए तो स्वाभिमान एवं आत्म- गौरव की रक्षा करने वाली स्थिति ही चाहिए ।। आत्म- गौरव को सबसे अधिक ठेस पहुँचाने वाली और आत्मा को तत्काल नीचा दिखाने वाली वस्तु हैं- भिक्षा ।। भिखारी तिनके से भी हत्का होता है उनका न कोई सम्मान रहता है और न मूल्य ।। हर व्यक्ति उसे ओछा, गया- गुजरा दीन- दरिद्र एवं अपाहिज असमर्थ समझता है और उसके प्रति तिरस्कार एवं घृणा के भाव रखता है ।। ऐसा सम्मान रहित व्यक्ति अपने आपकी दृष्टि में भी छोटा हो जाता है ।। हीनता एवं दीनता उसकी नस- नस में भर जाती है ।। इन परिस्थितियों में पड़ा हुआ व्यक्ति जीवित ही मृतक है ।। भिक्षा माँगने का अधिकार केवल दो प्रकार के व्यक्तियों को है एक उनको जो अपाहिज असमर्थ, अन्धे कोढ़ी अशक्त हैं ।। हाथ- पैर इस लायक नहीं कि अपना पेट भरने लायक भी कमा सके ऐसे व्यक्ति को यदि उनके स्वजन सम्बन्धी जीवित रखने लायक सुविधा नहीं देते तो जीवन धारण करने की विवशता में उन्हें भिक्षा माँगने का अधिकार है ।।
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युग तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार के स्वावलम्बन विद्यालय में जिन लघु उद्योगों का प्रशिक्षण दिया जाता है, उनमें से एक प्रमुख रोजगारोन्मुख उद्योग फोटो लेमिनेशन उद्योग है । इस उद्योग के अन्तर्गत सम्पन्न की जाने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया को कार्य की प्रकृति के आधार पर मुख्यत तीन चरणों में अथवा स्तरों में विभाजित किया जा सकता है । यह तीनों चरण क्रमश निम्नलिखित हैं ।
१. फोटो लेमिनेशन प्रक्रिया के पूर्व के कार्य ।
२. फोटो लेमिनेशन प्रक्रिया ।
३. फोटो लेमिनेशन के उपरांत के कार्य ।
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ग्रामोत्कर्ष को प्रमुखता मिले बच्चों की आवश्यकता को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि वे दुर्बल, असमर्थ और विकास के लिए आतुर होते हैं, उनके लिए साधन जुटाने में बड़ों की थोड़ी उपेक्षा भी कर दी जाती है ।। यही बात रोगियों या अपंगों के संबंध में भी है, उनकी साज- सँभाल को प्रमुखता दी जाती है, भले ही इस क्रम में बड़ों का नंबर पीछे पड़ जाता हो ।। इसमें बड़ों के प्रति द्वेष या अन्याय नहीं है, वरन उस करुणा की प्रधानता है जो पिछड़ों की सेवा- सहायता करने को प्रथम कर्तव्य मानती है और जो स्वावलंबी हैं, उन्हें अपने बलबूते अपनी साज- सँभाल स्वयं कर लेने के संबंध में अपेक्षाकृत निश्चिंतता रहती है ।। ग्राम्य जीवन के संबंध में इन दिनों यही दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए ।। वहाँ अशिक्षा का, गरीबी का, गंदगी का, मूढ़मान्यताओं का बाहुल्य है ।। देहाती क्षेत्र में ८० प्रतिशत भारतीय जनता रहती है सो भी बिखरी हुई छोटी- छोटी बसावटों में, जहाँ यातायात के, परिवहन के साधनों का भारी अभाव है ।। जिसमें वे न तो आसानी से सुविधा- संपन्न कस्बों- शहरों के साथ जुड़ पाते हैं और न सुधारक वहाँ सुविधापूर्वक पहुँच पाते हैं ।। जीवन की प्रमुख आवश्यकताएँ भी वहाँ सुविधापूर्वक उपलब्ध नहीं हैं, शिक्षा- चिकित्सा तो दूर स्वच्छ पेयजल तक का अभाव है ।। कृषि पर ही वह क्षेत्र निर्भर है, छोटी- छोटी जोतों और सिंचाई के अभाव में वह भी बारह महीनों का काम नहीं दे पाती ।।
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पशुवबलि हिंदू धर्म पर कलंक है हिंदू धर्म का मूलभूत तत्त्वज्ञान इतना महान है कि उसके प्रत्येक सिद्धांत एवं विधान में विश्व कल्याण की, मानवता के चरम उत्थान की संभावनाएँ ही सन्निहित हैं ।। देवताओं और ऋषियों ने इस महान धर्म का ढाँचा इतने उच्च कोटि के आदर्शों द्वारा विनिर्मित किया है कि उसके व्यवहार का परिणाम स्वर्गीय वातावरण का निर्माण ही हो सकता है ।। परंतु दुख की बात है कि पिछले अज्ञानांधकार युग में उसमें जहाँ- तहाँ अनैतिक और अहितकर मान्यताओं और रूढ़ियों का भी समावेश होने लगा और आज जो रूप हिंदू धर्म का हमारे सामने है, उसमें कई चीजें बहुत खटकने वाली ही नहीं, उन भावनाओं के सर्वथा प्रतिकूल भी हैं, जिनको लेकर ऋषियों ने इस महान धर्म की रचना की थी ।। ऐसी विकृतियों में पशुबलि को सर्वोपरि कलंकी प्रथा कहा जा सकता है ।। मूक पशु- पक्षियों का देवी- देवताओं के नाम पर कत्ल किया जाना उन देवताओं की महिमा को समाप्त करके सारे सभ्य समाज के सामने उन्हें गुणित, निंदित, नीच, क्रूर एवं हत्यारा सिद्ध करना है ।। जिस देवता को प्रसन्न करने के लिये बलि चढ़ाई जाती है, वस्तुत उन्हें असीम कष्ट और असीम लज्जा इस कुकृत्य से होती है ।।
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दहेज के दानव की कूरताएँ दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं ।। ऐसा कोई भी दिन नहीं बीतता जबकि समाचार पत्रों में दहेज हत्याओं की दो चार खबरें न छपी हों ।। दहेज प्रथा को रोकने के लिए आए दिन कानून बनाये जाते हैं फिर भी इस दानव की गति रुकती नहीं दिखलाई पड़ती, बढ़ती ही जाती है ।। कानून अपने स्थान पर उपयुक्त हैं, उपयोगी भी हैं ।। जरूरत पड़ने पर उन्हें बदला जा सकता है और बदला भी जाता है ।। परंतु दहेज दानव पर काबू पाने के लिए सामाजिक चेतना जाग्रत करने की आवश्यकता है ।। यह लड़ाई सामाजिक स्तर पर लड़ी जानी चाहिए और इसके लिए प्रबुद्ध नागरिकों, जाग्रत युवक- युवतियों को आगे आना चाहिए ।। ऐसे आदर्श प्रस्तुत किए जांय जिन्हें लोग देखें, प्रेरणा प्राप्त करें और अनुकरण की दिशा में कदम बढ़ा सकें ।। प्रारंभ में हम ऐसी ही कुछ घटनाओं का जिक्र कर रहे है जिनसे हम कुछ सीख सकते हैं ।। घटनाएं बीस- पच्चीस वर्ष पुरानी है, इससे भी अधिक पुरानी हो सकती हैं परंतु उनसे जो दिशा मिलती है, उसकी अभी भी सार्थकता है ।। कहना तो यह चाहिए कि इन घटनाओं से प्राप्त प्रेरणा की जितनी उस समय आवश्यकता थी, उससे कहीं अधिक आवश्यकता आज है ।।
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मनुष्यता के अनुबंध यह कहते हैं कि किसी पुरुष को बिना कोई कीमत चुकाए यदि आजीवन सेवा के लिए पत्नी मिलती है तो उसे न केवल उस महिला का वरन उसके समूचे परिवार का भी आजीवन कृतज्ञ रहना चाहिए ।। बिना वेतन के दिन- रात सेवा करने वाले सेवक किसी को कहाँ मिल सकते हैं ।। यह उदार सेवा- साधना तो मात्र नारी से ही बन पड़ती है कि वह अपने घर- परिवार को छोड़कर दूसरों के यहाँ रहे और मात्र रोटी, कपड़े पर दिन- रात आजीवन सेवा- साधना में रत रहे ।। इस प्रकार सहज ही अपना पितृगह छोड़कर अन्यत्र जाने को सहमत किसी नारी के प्रति ससुराल के प्रत्येक सदस्य को कृतज्ञ होना चाहिए ।। उपकार का बदला न चुका सकने पर भी निरंतर ऐसा अनुभव करते रहना चाहिए कि उसे बहुमूल्य उपकार अनुदान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला है ।। किंतु हिंदू समाज में होता ठीक इससे उल्टा है ।। वधू से यह आशा की जाती है कि वह अपने साथ पिता के घर का सारा असबाब भी ढोकर लाएगी ।। भले ही इसे जुटाने में उस परिवार को दर- दर का भिखारी क्यों न बनना पड़े ।। माँग- जाँच तक बात सीमित रहे तो भी एक बात है ।।
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