Monday, 7 November 2016
सेठ जमनालाल बजाज
एक और भामाशाह- श्री जमनालाल बजाज
सन १९२० में नागपुर कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था ।। वर्धा के प्रसिद्ध सेठ जमनालाल जी उस समय रायबहादुर
आनरेरी- मैजिस्ट्रेट भी थे, उसके स्वागताध्यक्ष थे ।। उस अधिवेशन में विशेष रूप से महात्मा गाँधी के असहयोग प्रस्ताव पर विचार किया गया और निश्चय किया गया कि विदेशी सरकार से समस्त प्रकार का संबंध और व्यवहार बंद करके उसे विवश किया जाय कि भारतवर्ष को स्वराज्य अधिकार देने में अधिक विलंब न करे ।। इस प्रस्ताव के पास होने पर जमनालाल जी ने सबसे पहले अपनी रायबहादुरी और आनरेरी मैजिस्ट्रेटी छोड़ने की घोषणा की ।।
इसी अवसर पर उन्होंने महात्मा गांधी से कहा कि यद्यपि आपके चार पुत्र हैं, तो भी मुझे अपने पाँचवे पुत्र के रूप में स्वीकार कर लें! दूसरे शब्दों में इसका अर्थ था कि आप मुझे गोद (दत्तक) ले लें ।। यद्यपि एक ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो आकार और वजन की दृष्टि से गांधी जी की अपेक्षा लगभग डयौढे होंगे, इस प्रकार की गोद लेने की प्रार्थना सुनने वालों को अनौखी जान पडी़ और गांधी जी भी एक बार आश्चर्य में पड़ गये पर उनका आग्रह देखकर इसकी स्वीकृति दे दी ।।
यद्यपि जमनालाल जी चार वर्ष की आयु में वर्धा के सेठ बच्छराज जी द्वारा पोते के रूप में गोद लिये गये थे पर उस समय उनको इस परिवर्तन का कोई ज्ञान न था ।। पर इस बार दत्तक पुत्र होते समय दोनों पक्षों को इस बात के महत्त्व और र्पारेणामों का अच्छी तरह ज्ञान था ।।
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सरोजिनी नायडू
मातृभूमि की सच्ची सेविका- श्रीमती सरोजिनी नायडूलगभग सौ वर्ष पूर्व की बात होगी की इंगलैड की एक निजी "गोष्ठी ने एक १५-१६
वर्ष की भारतीय बाला उस देश के दो- चार प्रसिद्ध साहित्यिकों से वार्तालाप
कर रही थी। अंग्रेजी साहित्य का प्रसिद्ध आलोचक एडमंड गोले भी उनमें से एक
था ।। कुछ सोच- विचार कर उसने अपनी कुछ काव्य- रचनाएँ गोसे के हाथ में दी
और कहा इनके विषय में अपनी सम्मति देने की कृपा करें।"
गोसे ने बड़े ध्यान से उन रचनाओं को पढ़ा, उन पर विचार किया और फिर कहने लगा- शायद मेरी बात आपको बुरी जान पड़े, पर मेरी सच्ची राय यही है कि आप इन सब रचनाओं को रद्दी की टोकरी में डाल दें। इसका आशय यह नहीं कि यह अच्छी नहीं हैं। पर तुम जैसी एक बुद्धिमती भारतीय नारी से, जिसने पश्चिमी भाषा और काव्य- रचना में दक्षता प्राप्त कर ली है, हम योरोप के वातावरण और सभ्यता को लेकर लिखे गये काव्य से तुलना की अपेक्षा नहीं करते। वरन् हम चाहते हैं कि आप हमको ऐसी रचनाएँ दे, जिनसे हम न केवल भारत के वरन् पूरे पूर्व की आत्मा के दर्शन कर सकें।
अपनी रचनाओं की यह आलोचना उस कवयित्री को बहुत हितकर जान पड़ी और उसी दिन से उसने गोसे को अपना गुरु मान लिया। उसके पश्चात् उसने जो काव्य- रचना की, उसने योरोप की नकल करने के बजाय भारत और पूर्व से अंतर्निहित विशेषताओं के दर्शन ही योरोप वालों ने किये और सर्वत्र उनका बड़ा। सम्मान होने लगा ।। यह बाला और कोई नहीं "भारत-कोकिला" के नाम से प्रसिद्ध श्रीमती सरोजिनी नायडू (सन् १८७६ से १६४६) ही थी।
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सन्त सुकरात
ईसा मसीह के जन्म से भी चार सौ वर्ष पहले एथेन्स (यूनान) के
न्यायालय में एक सत्तर वर्षीय वृद्ध मनुष्य खड़ा हुआ था। उसके ऊपर अभियोग
लगाया गया था कि वह नवयुवकों को विपरीत उपदेश देकर गलत रास्ते पर ले जाता
है। दूसरा अभियोग यह भी था कि उसने प्रजातंत्र के अधिकारियों के आदेश की
अवहेलना की है। यह अभियुक्त और कोई नहीं, पश्चिमी संसार का एक अति प्राचीन
दार्शनिक सुकरात था।
पाठक देख सकते हैं कि सुकरात ने ज्ञानी व्यक्ति का जो लक्षण बतलाया, वह हमारे ऋषि-मुनियों के सिद्धांतों से पूर्ण रूप से मिलता हुआ है। हमारे यहाँ कहा गया है कि ज्ञान की कोईसीमा नहीं। सामान्य रूप से ज्ञानी कहा जाने वाला व्यक्ति जितना जानता है, वह संपूर्ण ज्ञानराशि की तुलना में एक घड़े में एक बूंद के समान भी नहीं है। जिनको "महाज्ञानी" कहा जाता है, वे भी कभी यह नहीं कह सकते कि हमने पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लिया है। उदाहरण के लिए सांख्य और वैशेषिक जैसे जगत प्रसिद्ध दर्शनों के रचयिता भी शिल्प, संगीत, काव्य के विषय में अपने को निष्णात नहीं कह सकते। फिर अध्यातम-ईश्वर, जीव, आत्मा, परलोक जैसे सर्वथा अप्रत्यक्ष और अव्यक्त विषय में तो कोई दावे के साथ कुछ कैसे कह सकता है ? इसलिए भारतीय ऋषि-मुनियों ने सब कुछ वर्णन कर देने के बाद भी कहा है – "नेति-नेति" ? अर्थात् जितना हम जानते थे उतना हमने बतला दिया, पर यह इस विषय की अन्तिम सीमा नहीं है। इसके बाद भी जानने की बहुत सी बातें हैं, जिनका पता हमको नहीं, पर संभव है और किसी को हो, अथवा आगे चलकर जिनकी जानकारी हो सके।
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संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे
प्रेमी हृदय का मार्ग
घृणा, विद्वेष, चिड़चिड़ापन, उतावली, अधैर्य, अविश्वास यही सब उसकी संपत्ति थे ।। यों कहिए कि संपूर्ण जीवन ही नारकीय बन चुका था, उसके बौद्धिक जगत में जलन और कुढ़न के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं था ।। सारा शरीर सूखकर काँटा हो गया था ।। पड़ोसी तो क्या पीठ पीछे मित्र भी कहते- स्टीवेन्सन अब एक- दो महीने का मेहमान रहा है; पता नहीं, कब मृत्यु आए और उसे पकड़ ले जाए ?
विश्वविख्यात कवि राबर्ट लुई स्टीवेन्सन के जीवन की तरह आज सैकड़ों- लाखों व्यक्तियों के जीवन मनोविकारग्रस्त हो गए हैं पर कोई सोचता भी नहीं कि यह मनोविकार शरीर की प्रत्येक जीवनदायिनी प्रणाली पर विपरीत प्रभाव डालते हैं ।। रूखा- सूखा बिना विटमिन प्रोटीन और चरबी के भोजन से स्वास्थ्य खराब नहीं होता, यह तो चिंतन, मनन की गंदगी, ऊब और उत्तेजना ही है जो स्वास्थ्य को चौपट कर डालती है शरीर को खा जाती है ।।
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Sunday, 6 November 2016
संत तुकाराम
संसार में सभी मनुष्यों का लक्ष्य धन, संतान और यश बताया गया है।
इन्हीं को विद्वानों ने वित्तैषणा, पुत्रैषणा और लोकैषणा के नाम से पुकारा
है। इन तीनों से विरक्त व्यक्ति ढूँढ़ने से भी कहीं नहीं मिल सकता। संभव है
किसी मनुष्य को धन की लालसा कम हो, पर उसे भी परिवार और नामवरी की प्रबल
आकांक्षा हो सकती है। इसी प्रकार अन्य व्यक्ति ऐसे मिल सकते हैं कि जिनको
धन के मुकाबले में संतान या यश की अधिक चिन्ता न हो। पर इन तीनों इच्छाओं
से मुक्त हो जाने वाला व्यक्ति किसी देश अथवा काल में बहुत ही कम मिल सकता
है।
इस प्रकार विरक्त अवस्था में रहकर उन्होंने भूख, प्यास, निद्रा, आलस्य को जीत लिया। गीता के अनुसार "युक्ताहार विहार" होने से सब इन्द्रियाँ वश में आ गयीं। समय-समय पर वे तीर्थ यात्रा को भी जाते थे, पर वे तीर्थ आस-पास के ही होते थे। अपने पूर्वजों के नियमानुसार आषाढ़ और कार्तिक की पूर्णिमा को पंढरपुर तो जाते ही थे। ज्ञानेश्वर की जन्म भूमि "आलदी" तथा एकनाथ का निवास स्थान "पैठण" उनके गाँव से पास ही थे। फिर एक बार २३-२४ वर्ष की अवस्था में उन्होंने समस्त भारत के तीर्थों की यात्रा करके भारतीय समाज की अवस्था और तत्कालीन समस्यायों की जानकारी प्राप्त की। पर तीर्थों की दशा उस समय भी बहुत त्रुटिपूर्ण हो गयी थी और सब जगह धर्म-जीवियों ने उनको पेट भरने का साधन बना लिया था।
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विश्ववंद्य सन्त वसुधा जिन्हें पाकर धन्य हुई
भक्तिमार्ग के प्रवर्तक प्रसिद्ध धार्मिक संत स्वामी रामानंद
काशी से रामेश्वरम की यात्रा पर निकले थे ।। मार्ग में एक गाँव पड़ता था -
आलंदी ।। स्वामी रामानंद ने वहाँ अपना डेरा डाला और कुछ दिनों तक रुक कर
जन- साधारण को ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी में मज्जित कराते रहे ।।
स्वामी रामानंद एक मारुति मंदिर में ठहरे हुए थे, उसी मंदिर में गाँव की एक
युवती स्त्री भी प्रतिदिन दर्शन और पूजन के लिए आया करती थी ।। संयोग से
एक दिन स्वामीजी का उससे सामना हो गया ।। स्त्री ने रामानंद जी को प्रणाम
किया तो बरबस उनके मुँह से निकल गया पपुत्रवती भव । आशीर्वाद सुनकर युवती
पहले तो हँसी फिर एकाएक चुप हो गई ।। स्वामी जी को कुछ समझ में नहीं आया
उन्होंने पूछा… देवी तुम हँसी क्यों हो ? फिर एकाएक चुप क्यों हो गई ? हैं
उस युवती ने कहा - मेरी हँसी और फिर चुप्पी का कारण यह है कि आप जैसे
महात्मा का आशीर्वाद बिल्कुल निष्फल जाएगा । क्यों बेटी तुम्हारी कोई संतान
नहीं है क्या - माथे पर सिंदूर और हाथों में चूडियाँ देखकर स्वामी जी ने
उसके सधवा होने का अनुमान लगाते हुए कहा ।।
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