Saturday, 2 July 2016

हर घर बने देव मंदिर और ज्ञान मंदिर

Preface

बेटे, इस वसंत पर हमने आपको बुलाया है और एक मंदिर का रूप हमने दिखाया है, जिसका आप उद्घाटन वसंत पंचमी के दिन करेंगे। हम चाहते हैं कि ये मंदिर बिना एक सेकंड का विलंब लगे, सारे देश भर में फैल जाएँ । नहीं महाराज जी! पैसा इकट्ठा करूँगा, जमीन लूँगा । बेटे, जमीन लेगा और पैसा इकट्ठा करेगा, तब का तब देखा जाएगा । मुझे तो इतना टाइम नहीं है और फुरसत भी नहीं है । मैं तो तुझे इतनी छुट्टी भी नहीं दे सकता कि जब तू पैसा, जमीन इकट्ठी करे, नक्शा पास कराए बिल्डिंग बनवाए तब काम हो । मैं तो चाहता हूँ कि इस हाथ ले और इस हाथ दे । आपके घर में वसंत पंचमी से मंदिर बनने चाहिए । इतनी जल्दी मंदिर कैसे बन सकते हैं? इस तरीके से बनें कि आप एक पूजा की चौकी बना लीजिए । चौकी पर भगवान का चित्र स्थापित कर दीजिए और घर के हरेक सदस्य से कहिए कि न्यूनतम उपासना आप सबको करनी पड़ेगी । उनकी खुशामद कीजिए चापलूसी कीजिए मिन्नतें कीजिए। प्यार से घर में सबसे कहिए कि आप इस भगवान को रोजाना प्रणाम तो कर लिया करें ।
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हथकरघा प्रोद्योगिकी - एक परिचय

Preface

निःसंदेह परम पूज्य गुरुदेव की युग निर्माण योजना एवं ग्राम विकास की ग्रामतीर्थ अन्योन्याश्रित है, क्योकि आज भी दो तिहाई भारत गाँवो मे बसता है, जनगणना के जो प्रारम्भिक आँकडे़ प्रकाशित हुए है, वह इस बात की पुष्टि भी करते है। अतः युग परिवर्तन की प्रत्येक योजना हमे ग्राम केन्द्रित ही रख्नी होगी ।। युगऋषि पूज्य गुरुदेव का यह मानना है कि अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक विरोधाभासी पहलू यह रहा है कि भारत का विकास, भारतीय सोच एवं भारतीय मानसिकता के साथ न करके उसे यूरोप एवं अमेरिकी मॉडल पर आधारित किया गया है, जबकि इन देशों की परिस्थितियाँ भारतीय परिवेश से सर्वदा भिन्न रही ।। प्रचुर श्रमशक्ति जो कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए वरदान हो सकती थी, वह अर्थव्यवस्था के गलत मॉडल का चयन करने के कारण एक अभिशाप बनकर हमारे लिए बेरोजगारी, अशिक्षा एवं गरीबी का मूल कारण सिद्ध हो रही है ।। गाँवों से पलायन शहरों का असंतुलित विस्तार, अमीरों एवं गरीबों के बीच चौड़ी होती खाई इसी गलत अर्थव्यवस्था के चयन का दुष्परिणाम है ।। 

युग परिवर्तन के इस संक्रमण काल में हमें युगऋषि के संकेतों को समझते हुए ग्रामतीर्थ योजना के विराट कलेवर को अंगीकार करना होगा ।। जब तक भारत के गाँवों का समग्र विकास नही होगा, तब तक भारत के विकास की परिकल्पना कोरा दीवास्वप्न ही है ।। एक संस्कारयुक्त- व्यसनमुक्त, स्वच्छ- स्वस्थ शिक्षित स्वावलम्बी गाँव ही युग परिवर्तन के विशाल वट वृक्ष को बीज रूप में अपने में समाहित किये हुए है ।। हमें तो बस अपने स्तर से अनुकूल वातावरण तैयार करना है ।। गाँव में बसने वाली प्रचुर युवा श्रम शक्ति स्वयं ही अपने विकास की राह अपने संसाधनों से खोज लेगी ।। गाँवों का विकास ऋषि सूत्रों पर आधारित आध्यात्मिक अर्थ व्यवस्था से ही सम्भव है ।।
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स्वावलंबी ग्राम्य विकास

Preface

गाँव अपने में विश्व को पुष्ट करने वाली ऐसी इकाई है, जिस में किसी भी प्रकार की व्यग्रता व आतुरता न हो, अर्थात भविष्य के प्रति पूर्ण निश्चिन्तता व आश्वस्तता हो । वास्तव में हमारे गाँव इस सूत्र के अनुरूप पूर्णतया स्वावलम्बी हुआ करते थे, उन्हें अपनी आवश्यकता के लिए बाहर की ओर नहीं देखना होता था । विकास उनकी पूर्णतया विकेन्द्रीकृत सामाजिक व्यवस्था थी । परन्तु विभिन्न राज तंत्रीय व्यवस्थाओं से गुजरते हुए ग्राम्य का वह स्वरूप एवं ढाँचा धीरे धीरे कर प्राय: लोप हो गया । 

भारत ग्राम प्रधान देश है और गांवों में बसी 2 तिहाई आबादी का उत्कर्ष एवं उत्थान ही राष्ट्र का वास्तविक विकास है । परन्तु यह विडम्बना ही है कि आजादी के बाद पिछले 55 वर्षों में गांवों के विकास को वह स्वरूप व दिशा-धारा नहीं दी जा सकी जो यहाँ की परिस्थितियों व आवश्यकता के अनुकूल होती और गांवों में वह स्थिति पैदा करती जिससे गांवों से शहरों की ओर तेजी से हुए पलायन एवं गंदी बस्तियों के रूप में बढती शहरी आबादी की गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता । साथ ही शहरीकरण, औद्योगिकरण, प्रदूषण, प्राकृतिक असन्तुलन एवं प्रकोपों की मार से भी बचा जा सका होता । 
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स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना - कल्पवृक्ष का आरोपण

Preface

अज्ञानता के कारण मानव जीवन दुःखों से भरा रहता है ।। यदि ज्ञान हो तो अभावों में भी प्रसन्न रहा जा सकता है ।। युग द्रष्टा पूज्य गुरुदेव ने दिव्य दृष्टि से समझ लिया था कि सभी दुःखों का मूल कारण अज्ञान है ।। इसी अज्ञान को दूर करने हेतु उन्होंने ज्ञानयज्ञ की योजना चलाई ।। ज्ञानयज्ञ के दो माध्यम हैं- सत्संग और स्वाध्याय ।। ग्रंथ प्रकाशन की व्यवस्था आसान एवं सर्वसुलभ होने से अब स्वाध्याय ही बेहतर साधन हो सकता है ।। दुश्चिंतन को मिटाने वाले, सद्साहित्य की आवश्यकता की पूर्ति पूज्यवर ने युग साहित्य का सृजन करके की ।। युग साहित्य को जन- जन तक पहुँचाने के लिए तरह- तरह के प्रयोग किए जिनमें स्वाध्याय मंडलों की स्थापना को पूज्यवर ने कल्पवृक्ष की संज्ञा दी ।। इसके माध्यम से युग निर्माण मिशन के सभी कार्यक्रम स्वल्प साधनों से पूरा होने की योजना बनाई ।। स्वाध्याय मंडल की स्थापना पाँच प्रारंभिक सदस्यों द्वारा स्वाध्याय से प्रारंभ होती है, जो तीस सदस्यों द्वारा स्वाध्याय तक पहुँच जाती है ।। तीस सदस्यों का यह स्वाध्याय मंडल शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ आदि भवनों वाले प्रज्ञा संस्थानों के समतुल्य मिशन की गतिविधियों को चलाते हैं ।। स्वाध्याय मंडल के पास चल- अचल संपत्ति न होने के कारण वित्तैषणा- लोकैषणा से बचे रहना आसान होता है ।। पूज्यवर ने इस पुस्तक में युग साहित्य का महत्त्व, स्वाध्याय की आवश्यकता, स्वाध्याय मंडलों की स्थापना एवं उनकी गतिविधियों पर प्रकाश डाला है और हम सबसे स्वाध्याय मंडल बनाने की आशा सँजोई है ।। उनकी आकांक्षा को आदेश मानते हुए सभी को अपने क्षेत्र में स्वाध्याय मंडल की स्थापना करनी चाहिए ।।
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समाज की अभिनव रचना

Preface

विश्व मानव की आत्मा एक और अखंड है ।। समस्त जड़- चेतन उसी के अंतर्गत अवस्थित हैं ।। इस आत्मा में अपनी एक दिव्य आभा, स्वर्गीय ज्योति जगमगाती है ।। अनेक मल आवरणों ने उसे ढ़क रखा है ।। यदि वह ज्योति इन आवरणों को चीरकर अपने शुद्ध स्वरूप में जगमगाने लगे, तो उसका आलोक जहाँ भी पड़े वहीं आनंद का परम आह्लादकारी दृश्य दिखाई दे सकता है ।। इस प्रकाश की सीमा में आने वाली हर वस्तु स्वर्गीय बन सकती है ।। ऐसी बहुमूल्य ज्योति हमारे अंदर मौजूद है ।। स्वर्ग की सारी साज- सज्जा हमारे भीतर प्रस्तुत है, पर अविद्या के प्रतिरोधी तत्त्वों ने उसे भीतर ही अवरुद्ध कर रखा है ।। फलस्वरूप मानव प्राणी स्वयं नारकीय स्थिति में पड़ा हुआ है और वैसा ही नरक तुल्य वातावरण अपने चारों ओर बनाए बैठा है ।। 

आत्मा स्वार्थ की संकुचित सीमा में अवरुद्ध होकर आज खंडित हो रही है ।। हर व्यक्ति अपने को दूसरों से अलग खंडित देखता है, फलस्वरूप चारों ओर संघर्ष और कलह का वातावरण उत्पन्न होता है ।। 

वस्तुत: हम सब एक हैं, अखंड हैं, सब एक- दूसरे से जुड़े हुए हैं, एक का सुख- दुःख, दूसरे का सुख- दुःख है ।। उठना है तो सबको एक साथ उठना होगा, सुख ढूँढना है तो सबको उसे बाँटना होगा ।।

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सभ्य समाज की अभिनव संरचना में जुटें

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जिस समाज में लोग एक -दूसरे के दु:ख -दर्द में सम्मिलित रहते हैं , सुख- संपति को बाँटकर रखते हैं और परस्पर स्नेह, सौजन्य का परिचय देते हुए स्वयं कष्ट सहकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं उसे देव समाज कहते हैं। जब जहाँ जनसमूह इस प्रकार पारस्परिक संबंध बनाए रहता है तब वहाँ स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनी रहती हैं ।। पर जब कभी लोग न्याय -अन्याय का, उचित- अनुचित का , कर्त्तव्य -अकर्त्तव्य का विचार छोड़कर उपलब्ध सुविधा या सत्ता का अधिकाधिक प्रयोग स्वार्थ में करने लगते हैं तब क्लेश ,द्वेश और असंतोष की प्रबलता बढ़ ने लगती है। शोषण और उत्पीड़न का बाहुल्य होने से वैमनस्य और संघर्ष के दृश्य दिखाई पड़ने लगते हैं।
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विवाह संस्कारो मे विकृतियाँ न जोडे़ं

Preface

किसी महान प्रयोजन को लक्ष्य मानकर जाने वाले धर्मसेवी, लोकसेवी, परिव्राजक स्तर के महापूरुष तो अविवाहित जीवन में भी सुविधा अनुभव करते हैं, पर सामान्यजनों को सामान्य जीवन में विवाहित रहकर काम चलाना ही सुविधाजनक पड़ता हैं ।। इसमें प्रकृति की प्रेरणायेँ भी पूरी होती हैं ।। पेट की भूख कमाने के लिये बाधित करती हैं और वंश वृद्धि की ललक कामुकता के रुप में गृहस्थी बसाने की प्रेरणा देती हैं ।। साधारणतया इन्हीं दो कार्यों की शृंखला जीवन अवधि को व्यस्तता के बीच पूरी कर देती है। जीवन संकट इन्हीं दो प्रयासों की लोक पर घिसटता रहता है और आयुष्य की अवधि पूरी कर लेता है। यही प्रचलन भी है और यही सर्वसुलभ और सुविधाजनक भी। तरुणाई के आगमन वाले दिनों में सामान्यता ऐसी प्रकृति प्रेरणा होती है की जोड़ा बनाकर रहें।नये रक्त के साथ जुड़ी हुई उमगें इसके लिये प्रेरित भी करती है,उन्हें छोड़कर सामान्यजन विवाह की इच्छा करते और उसका सरंजाम भी जुटाते है। 

इस संदर्भ में उससे अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है, जितनी कि आमतौर से बरती जाती है। लोग सुंदर शरीर वाला साथी पाने की फिराक में रहते है। चयन प्राय: इसी आधार पर हो सका तो प्रसन्नता व्यक्त की जाती है।इसके अतिरिक्त लड़के का कमाऊ और लड़की का चुलबुलापन भी पसन्दगी का कारण माना जाता है।
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