Tuesday, 18 April 2017

महाकाल का संदेश जाग्रत आत्माओं के नाम

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युग परिवर्तन जैसे बड़े कार्यों के उत्तरदायित्व और भार सामर्थ्य-सम्पन्न लोग ही सँभाल सकते हैं। युग निर्माण योजना की विचारधारा और क्रियापद्धति विभूति संपन्न लोगों तक पहुँचाई जानी चाहिए। खोज-खोज कर उन्हें प्रभावित किया जाना चाहिए। तथ्यों का प्रस्तुतीकरण ठीक ढंग से किया जाए तो महाकाल का आह्वान वह भली प्रकार समझ सकते हैं और अपना समर्थ योगदान देकर कार्य की प्रगति में कई गुनी गति ला सकते हैं । इसी उद्देश्य से इस पुस्तिका में पूज्य गुरुदेव के ऐसे प्रखर और सशक्त विचार संकलित किए गये हैं, जिनका अध्ययन, चिंतन, मनन यदि एकाग्रता और पूर्ण मनोयोग से किया जाए तो युगधर्म के परिपालन के लिए एकसुनिश्चित प्रेरणा एवं क्रियापद्धति प्राप्त हो जाएगी ।

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मंदिर जन-जागरण के केंद्र बने

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=772भारतवर्ष में लगभग ६ लाख मंदिर हैं, जिनमें पुजारी नियत हैं और नियमित रूप से सेवा- पूजा की व्यवस्था होती है ।। इनमें से सैकड़ों ऐसे हैं ।। जिनमें दर्जनों कर्मचारी विभिन्न प्रयोजनों के लिए रहते हैं, पर हम न्यूनतम औसत निकालने के लिए यह मान लेते हैं कि हर मंदिर के पीछे केवल एक कर्मचारी नियुक्त है ।। यद्यपि हजारों ही मंदिर ऐसे हैं जिनका भोग- प्रसाद, उत्कृष्ट श्रृंगार, सफाई, रोशनी, मरम्मत आदि का खर्च लाखों रुपया मासिक है, न्यूनतम औसत भोगप्रसाद, दीपक, मरम्मत तथा पुजारी का वेतन आदि पर कुल मिलाकर १०० रुपया मासिक मान लिया जाए तो अधिक नहीं वरन् कम से कम ही समझना चाहिए ।। यह अनुमान तो लगा ही लेना चाहिए कि ६ लाख मंदिरों का खर्च १०० रुपया प्रतिमास के हिसाब से ६ करोड़ रुपया मासिक अर्थात् ७२ करोड़ रुपए वार्षिक है ।।

विशाल जन- शक्ति और विपुल धन- शक्ति

भारतवर्ष में ५६७१६९ गाँव और २६९० शहर हैं ।। कुल मिलाकर इनकी संख्या ६ लाख होती है इनमें हर जगह एक मंदिर का हिसाब तो मानना ही चाहिए ।। मामूली गाँवों और कस्बों में कई- कई संप्रदाय के कई देवताओं के कई- कई मंदिर होते हैं ।। बड़े शहरों में तो उनकी संख्या सैकड़ों होती है, फिर भी औसतन हर गाँव के पीछे एक का औसत मान लिया जाए तो इनकी संख्या भी ६ लाख हो जाती है ।।

हर मंदिर के पीछे कई- कई कर्मचारी होते हैं पुजारी, महंत, मुनीम, चौकीदार माली आदि ।। कितने ही बड़े मंदिरों में तो सैकड़ों कर्मचारी काम करते हैं ।। दो- दो तीन- तीन तो हजारों में होंगे फिर भी न्यूनतम एक पुजारी हर मंदिर के पीछे मानना ही होगा ।। इस प्रकार ६ लाख मंदिरों में ६ लाख पुजारी हो गए ।। यह सब गहस्थ होते हैं ।। अन्य उद्योगों में लगे हुए व्यक्तियों के घर वाले भी अपने काम- धंधों में सहायक होते हैं ।। 

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प्रतिगमिता का कुचक्र ऐसे टुटेगा-५९

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=371किसी भी समाज अथवा देश की प्रगति में, स्वस्थ रीति- रिवाजों एवं सत्परम्पराओं का विवेक की कसौटी पर उचित ठहरायी जा सकें, विशेष योगदान होता है।। कई परम्परागत प्रचलन ऐसे हैं जो व्यक्ति व समाज दोनों की प्रगति में आज भी सहायक हैं ।। ऐसे विवेकपूर्ण उपयोगी रीति- रिवाजों या प्रथा- परम्पराओं का अनुकरण तो उचित है किंतु जिनकी न कोई उपयोगिता है, न कोई औचित्य एवं फिर भी वे समाज में जड़ जमाए बैठे हैं -ऐसे प्रचलनों को उखाड़ फेंका जाना चाहिए, यह परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी आग उगलने वाली लेखनी से इतने तर्कों व प्रमाणों के साथ लिखा है कि कहीं भी कोई गुंजाइश उनका समर्थन करने की रह नहीं जाती ।।

युग निर्माण योजना की धुरी निश्चित ही व्यक्ति निर्माण पर टिकी है परंतु वही इकाई तो समूह रूप में मिलकर समाज का निर्माण करती है ।। समाज का नवनिर्माण तब तक संभव नहीं, जब तक कि मान्यताओं, रीति- रिवाजों, परम्पराओं, प्रथाओं- प्रचलनों के क्षेत्र में आमूलचूल क्रान्ति नहीं की जाती ।। राष्ट्र का समग्र विकास तभी संभव है जब वह इन पिछड़ेपन की ओर ले जाने वाली अवैज्ञानिक एवं नितान्त अप्रासंगिक समझी जाने वाली रूढ़िवादी मान्यताओं, अंधविश्वासों से मुक्ति पा सके ।। शिक्षा विस्तार कें साथ बहुसंख्य भारत में छिटपुट स्थानों पर इनका विरोध तो हुआ है पर एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में यह प्रक्रिया उभर कर नहीं आयी ।। यह एक ज्वलन्त मुद्दा बने एवं प्रतिगामिता के कुचक्र से हम सभी मुक्त हों, यही युग- ऋषि ने वाड्मय के इस खण्ड में कूट- कूट कर भरा है ।। 

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पतन निवारण

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मनुष्य जीवन की गरिमा को समझा नहीं जा सका तो उसे सबसे बड़ा दुर्भाग्य कहना चाहिए । सृष्टि के समस्त प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य को जो मिला है उसे अतुलनीय ही कह सकते हैं । परम प्रभु ने अपने बड़े बेटे को जो उत्तराधिकार सौंपा है, उसका प्रत्येक पक्ष अद्भुत है । सामान्य दृष्टि से तो हम भी पेट और प्रजनन में निरंतर व्यस्त अगणित समस्याओं से उलझे और संकटों के दल-दल में फँसे नगण्य जीवधारी भर हैं । अन्य प्राणी निर्वाह और सुरक्षा भर की समस्याएँ अपने पुरुषार्थ से हल करते और चैन से दिन गुजारते हैं । मनुष्य आंतरिक उलझनों, महत्त्वाकांक्षाओं, मनोविकारों और प्रतिकूल परिस्थितियों से इतना उद्विग्न रहता है कि दिन गुजारने भारी पड़ते हैं । जिंदगी की लाश बड़ी कठिनाई से ही ढोना संभव हो पाता है । 

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Monday, 17 April 2017

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य दर्शन एवं दृष्टि

http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=1282समय के साथ बदलती परिस्थितियाँ नित नई चुनौतियां प्रस्तुत करती हैं । जटिलताओं के मकड़जाल में छटपटाती जीवित जीवनियाँ मानसिक तनाव, सांस्कृतिक विलम्बना और अपूर्णता से छुटकारा पाना चाहती है। सुविधाओं की ओर अंधी दौड़ के प्रतिभागी मृग मारीचिका के चक्रव्यूह में फँस जाते हैं । ऐसे में हताशा कुंठा और निराशा का दावानल अपना प्रभाव दिखाकर प्रतिभाओं पर कुठाराघात करने लगते हैं । असामान्य परिस्थितियों के धरातल पर बहुआयामी जीवन को जीने की व्यवहारिक कला सीख कर यथार्थ के समीप पहुंचना सहज नहीं है । अखिल विश्व गायत्री परिवार के सस्थापक पं श्रीराम शर्मा आचार्य की मानवीय जीवन लीला वर्तमान समय में प्रेरणा पुंज बनकर विश्व के करोड़ों लोगों के आत्म विश्वास को पुष्ट करके सतुंष्टि के मार्ग प्रशस्त कर रही है । समाज के सभी पक्षों को एक साथ आत्मसात करना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। 

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नया संसार बसायेगे, नया इन्सान बनायेगे

वसुधैव कुटंबकम का सैद्धांतिक आधार


http://www.awgpstore.com/gallery/product/init?id=571मनुष्य को भगवान ने बहुत कुछ देकर इस पृथ्वी पर भेजा है ।। शारीरिक दृष्टि से वह कई प्राणियों की तुलना में कमजोर जरूर ठहरता है, पर बौद्धिक दृष्टि से उसके पास जो सामर्थ्य संचित है, परमात्मा ने बुद्धि और ज्ञान का- जो बहुमूल्य उपहार उसे प्रदान किया है, वह अपने आप में इतना महत्त्वपूर्ण है कि एक इसी के बल पर उसने संसार के समस्त प्राणियों को पीछे छोड़ दिया ।। कोई व्यक्ति दूसरों से तुलना करके अपने को भले ही अभावग्रस्त और असहाय समझता रहे, लेकिन वास्तविकता यह है कि वह न अभावग्रस्त है, न निर्बल और न निर्धन ।। यों रोना ही रोना हो तो- संपन्न से संपन्न व्यक्ति भी अपने पास किन्हीं वस्तुओं के अभाव की बात सोचते हुए असंतोष की आग में जलते रह सकते हैं ।। लेकिन वास्तविकता यह है कि दयनीय से दयनीय हालत में पड़ा रहने वाला मनुष्य भी न अभावग्रस्त है और न दयनीय ।। अपनी महत्ता और सर्वोपरिता को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किए जाने के बाद भी मनुष्य की अंतरंग चेतना में श्रेष्ठता का भाव छिपा हुआ है ।। यह इस बात से सिद्ध होता है कि दुखी से दुखी व्यक्ति भी अपने दु:खों से छुटकारा प्राप्त करने के लिए मरना पसंद नहीं करते ।। भावावेश में आकर कोई व्यक्ति आत्महत्या कर ले, यह बात अलग है ।। किंतु सचाई यह है कि लोगों की अंतरंग चेतना में मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता का भाव इस प्रकार अपनी जड़ें जमाए हुए है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में अपने जीवन को खोना नहीं चाहता ।।

स्थिति और बाह्य उपलब्धियों की दृष्टि से कोई व्यक्ति भले ही साधनहीन दिखाई दे, पर यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति को जन्मजात रूप से सब कुछ न सही तो भी बहुत कुछ अवश्य मिला है ।।

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धर्म तत्व का दर्शन, मर्म-५३

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धर्म शब्द सम्प्रदाय से भिन्न, बड़ी व्यापक परिभाषा लिए हुए है। जहाँ सम्प्रदाय उपासना विधि, कर्मकाण्डों और रीति-रिवाजों का समुच्चय है वहाँ धर्म एक प्रकार से जीवन जीने की शैली का ही दूसरा नाम है। सम्प्रदायपरक मान्यताएँ देश, काल, क्षेत्र, परिस्थिति के अनुसार बदलती रह सकती हैं, परन्तु धर्म शाश्वत-सनातन् होता है। धर्म की तीन भाग बताए जाते हैं, जिन्हें परस्पर संबद्ध करने पर ही वह समग्र बनता है- ये हैं तत्वदर्शन-ज्ञानमीमांस, नीतिशास्त्र एवं अध्यात्म। धर्मधारणा हरेक के लिए अनिवार्य है एवं उपयोगी भी। धर्म का अवलम्बन निज की सुरक्षा ही नहीं, समाज की अखण्डता के लिए भी जरूरी है। 

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